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मन के भीतर का रावण

मन के भीतर का रावण

तन के भीतर बैठा ये मन,

जाने कैसे स्वाँग रचाए।

खुद ही दीन बनकर बैठे कभी,

दाता कभी खुद बन जाए।

संकल्पों में यदि जीत ये जाए,

तो निश्चय ही जीत कराए।

हार यदि माने पहले से तो,

ये बहरूपिया अंत में हार कराए।

खुद के भीतर के इस रावण पर,

ज्ञानी जन तीर चलाए।

कभी मोह के जाल बिछाकर,

अपनों से ही दूर भगाए।

कभी लोभ का दीप जलाकर,

सत्य-धर्म से विमुख कराए।

क्रोध की ज्वाला भड़काकर,

विवेक को पल में जलाए।

अहंकार के मद में डूबा,

निज अस्तित्व भी भूल जाए।

जो मन को अपने वश कर ले,

वह जीवन का मर्म भी पाए।

कभी निराशा बनकर आए,

कभी आशा के फूल खिलाए।

कभी कल्पना के पंख लगाकर,

नभ में ऊँचा उड़ता जाए।

कभी बहाने गढ़ता रहता,

कभी लक्ष्य के पास पहुँचाए।

दृढ़ निश्चय का साथ मिले तो,

पत्थर में भी राह बनाए।

मन को जिसने जीत लिया हो,

जग में कौन उसे हराए।

बाहर के रावण को मारें,

भीतर का रावण भी जलाएँ।

मन-मंदिर में सत्य जगाकर,

प्रेम की ज्योति सदा जलाएँ।

काम, क्रोध, मद, लोभ त्यागकर,

मानवता का धर्म निभाएँ।

अपने कर्मों से जग में हम,

नई मिसालें छोड़कर जाएँ।

मन पर विजय वही पाता है,

जो खुद को खुद से ही जिताए।।

✍️ इंजीनियर राजन सोनी ‘निर्मय’

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