
अपना घर समझा
अपना घर समझा था जिसे,
वो घर बनाना भूल गए,
हमने रिश्ते दिल से जोड़े,
वो रिश्ते निभाना भूल गए।
एक वादा था, एक सपना था,
एक छोटी-सी उम्मीद थी,
हमने अपनी दुनिया सौंप दी,
उन्हें शायद उसकी कीमत ही नहीं थी।
हमने आँधी में भी हाथ थामा,
उन्होंने हाथ छुड़ाना सीख लिया,
हमने टूटकर भी रिश्ता बचाया,
उन्होंने कागज़ों में रिश्ता मिटा दिया।
जिसे अपना हमसफ़र माना,
वही सफ़र में अकेला छोड़ गए,
जिसे घर समझकर जीवन सौंपा,
वहीं से घर छोड़ने के कागज़ मिल गए।
एक वादा था, एक सपना था,
एक उम्मीद थी—जो कागज़ों में बिखर गई,
कुछ अधूरे ख़्वाब पीछे रह गए,
कुछ साँसें ख़ामोशी में ठहर गईं।
घर तो ईंटों से बन जाता है,
मगर अपनापन कहाँ से लाएँ?
जिसे दिल ने घर मान लिया हो,
उसे अजनबी कैसे बनाएँ?
तब समझ आया—
घर सिर्फ़ साथ रहने की जगह नहीं होता,
घर वह एहसास है
जहाँ किसी को छोड़ने से पहले
उसके टूटने का दर्द समझा जाए।
क्योंकि सच्चा घर वह नहीं
जहाँ साथ रहने का वादा किया जाए,
सच्चा घर वह है
जहाँ उस वादे को निभाने की नीयत भी हो।
और अगर कभी कोई रिश्ता टूट भी जाए,
तो इंसानियत मत टूटने देना—
क्योंकि रिश्ते खत्म हो सकते हैं,
मगर किसी इंसान को
अपना घर समझने का विश्वास
दोबारा पाना बहुत मुश्किल होता है।
— डॉ. सुरक सेल्वी चिन्नप्पन