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कानून फैसला देगा...

कानून फैसला देगा...

कानून एक दिन

अपना फैसला सुना देगा...

दोषी को सज़ा भी मिल जाएगी...

पर क्या कोई अदालत

उस माँ की गोद फिर से भर पाएगी?

क्या कोई फैसला

उस पिता के काँपते हाथों में

अपने बेटे का हाथ फिर रख पाएगा?

क्या कोई सज़ा

बहन की सूनी राखी में

फिर से मुस्कान लौटा पाएगी?

पत्थर दिल इंसान

शायद यह भूल जाते हैं...

कि एक जान जाती है,

तो केवल एक शरीर नहीं खोता,

पूरा परिवार

उम्रभर के लिए बिखर जाता है।

रिश्ते अगर निभ नहीं सकते,

तो सम्मान से अलग हो जाइए...

लेकिन किसी माँ की कोख उजाड़ने का

हक़ किसी को नहीं।

आज समाज से बस यही प्रार्थना है—

अपने दिल को

इतना कठोर मत बनने दो

कि इंसानियत ही मर जाए।

क्योंकि...

कानून दोषी को सज़ा दे सकता है,

लेकिन जिस माँ ने अपना बेटा खो दिया,

उसे उसका बेटा कभी वापस नहीं मिल सकता।

यही सबसे बड़ी सज़ा है—

जो हर दिन

उस परिवार की साँसों में जीती रहती है। :::

यह कविता किसी स्त्री, पुरुष या किसी भी समुदाय को दोषी ठहराने के लिए नहीं लिखी गई है। यह एक दुखद वास्तविक घटना से प्रेरित है और केवल उस परिवार के दर्द, मानव जीवन के मूल्य तथा रिश्तों में विश्वास, सम्मान और जिम्मेदारी का संदेश देने का प्रयास है। यदि इससे किसी की भावनाएँ आहत हों, तो वह मेरी मंशा नहीं है। :::

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