Personal Story
Harf -e- HaShru
तुम्हें गैरों से कब फुरसत, हम अपने ग़म से कब ख़ाली,चलो बस हो चुका मिलना, न हम ख़ाली न तुम ख़ाली।भरी महफ़िल में भी दोनों, मुकम्मल तौर पर तन्हा,तिरे हिस्से में मगरूरी, मिरे हिस्से है पामाली।तबीबों से मैं अपने ज़ख़्म, की अब क्या शिफ़ा माँगूँ,मैं ख़ुद...
Hashru