
तुम्हें गैरों से कब फुरसत, हम अपने ग़म से कब ख़ाली,
चलो बस हो चुका मिलना, न हम ख़ाली न तुम ख़ाली।
भरी महफ़िल में भी दोनों, मुकम्मल तौर पर तन्हा,
तिरे हिस्से में मगरूरी, मिरे हिस्से है पामाली।
तबीबों से मैं अपने ज़ख़्म, की अब क्या शिफ़ा माँगूँ,
मैं ख़ुद अपनी तबाही का, खड़ा हूँ बन के सवाली।
अजब सा दौर है जिस में, वफ़ा भी इक तिज़ारत है,
हक़ीक़त में वफ़ा की हर, कहानी है ख़याली।
कोई पूछे जो 'हश्रु' से, सबब इस की तबाही का,
तो कह देना कि इस के 'हर्फ़' ने, इक आग है पाली।