मेरी चाचीयों को मेरी मां कि तारीफों से तो जलन होती ही थीं। लेकिन अब मेरी दोनो बहनों कि अच्छे परिवारों में रिश्ते भी। होने जा रहें थे। तो मेरी तीनों चाचियों को और भी ज्यादा जलन होने लगी। कि अगर मेरी दोनों बहनों का विवाह अच्छे परिवार में हुआ तो हमारी जेठानी और भी ज्यादा मोहल्ले में बातें बनाएगी। लेकिन हम दोनों भतीजियों के रिश्ते तुड़वा देंगे। और मेरी बहनों के रिश्ते तुड़वाने के लिए तीनों चाचीयों ने मेरी दादी और मेरे चाचाओं को मेरी बहनों के ससुराल वालों कि झुटी सच्ची बातें बताकर शक उत्पन्न करवा दिया। मेरी चाचीयों को पता था कि मेरे माता-पिता मेरे चाचाओं और दादी कि बातों को नजरंदाज नहीं करेंगे। और दादी और चाचाओं कि बातों पर भरोसा करके मेरी बहनों के रिश्ते तोड़ देंगे। लेकिन जब चाचाओं ने और मेरी दादी ने मेरे माता-पिता को मेरी बहनों के ससुराल वालों बारे में पता करने के बारे में बोला तो एक पल को मेरे माता-पिता भी मेरी बहनों के ससुराल वालों पर शक करने लगें। लेकिन फिर पिता के दोस्तों ने कहा कि अरे ऐसा कुछ नहीं है। अच्छे लोग हैं कर दो लड़कियों का विवाह फिर जब मेरी चाचीयों ने देखा कि मेरे माता-पिता मेरी बहनों कि शादी कि तैयारी कर रही है। तो चाचीयों ने मेरी दादी और अपने पतियों को मेरी मां के खिलाफ भड़काया कि देख लो तुम्हारी भाभी ने बड़ी बहु ने तुम्हारी बात का मान रखा। उसके घर में तुम लोगों कि कोई इज्जत कदर नहीं है। और अब चाचीयों कि इन बातों से मेरी दादी और तीनों चाचा मेरे माता-पिता पर भड़क गए। लेकिन इस बात का चाचाओं और दादी ने बतंगड़ नहीं बनाया लेकिन मेरी चाचीयां तो चाहती थी कि पांचों चाचा और दादी मेरे माता-पिता से लड़ाई-झगड़े करें। और मेरी बहनों के रिश्ते टुट जाएं या फिर मेरी मां लड़ाई झगड़े करने में टेंशन में रहें। जिससे मुझे भी नुकसान हो जाएं। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं पर मेरी तीनों चाचीयां हार मानने वालों में से नहीं थीं। वै तीनों किसी भी तरह से मेरी बहनों के रिश्ते तुड़वाना चाहतीं थीं। या तो मेरी बहनों के रिश्ते टुटे या फिर पेट में मुझे नुकसान हो लेकिन सबकुछ नार्मल रहा। तब चाचियों ने मेरे घर के आस-पास रहने वाले लोगों को भड़का दिया कि जब हमारी भतीजियों कि बारात आएं तभी तुम लड़ाई झगड़े करना। इससे हमारी जेठ-जेठानी अकेले पड़ जाएंगे और तुम्हें तुम्हारी जमीन मिल जाएगी। और हां हमारी तरफ से बे फिकर रहना हम कोई भी लड़ाई-झगड़े में हमारे जेठ-जेठानी का साथ नहीं देंगे। लेकिन अब जब मेरे माता-पिता के दुश्मन जब शादी वाले दिन लड़ाई झगडे करने कि प्लांनिंग बना रहे थे। तो मेरे पिता के दोस्तों ने उनकी प्लानिंग को सुन लिया और फिर मेरे पिता के दोस्तों ने भी एक प्लान बनाया कि जिस दिन मेरी बहनों कि बारात आयेगी। उस दिन हम सब चोकन्ने रहेंगे। और किसी भी दुश्मन को शादी बिगाड़ने नहीं देंगे। हम सब पहरा देंगे। जिससे हमारे दोस्त कि बेटियों कि शादी धुमधाम से हो सकें। और वैसा ही हुआ। मेरी बहनों कि शादी धुमधाम से हुई और उनकी विदाई करवा दी गई। और मेरी तीनों चाचीयां मुंह ताकती रह गई। लेकिन मेरी तीनों चाचीयां हार मनना नहीं चाहतीं थीं। लेकिन फिर घर में मेरा जन्म हुआ। और मेरे जन्म से मेरी मां बहुत खुश थी। क्योंकि मेरी मां कि चाहत थी कि उनके घर एक और लड़का हो जाएं। और भगवान ने मेरा चेहरा इतना भोला मासुम और आकर्षक बनाया था कि गांव कि महिलाएं मेरी और ऐसे आकर्षित हो जैसे में कोई साधारण बच्चा ना होकर स्वयं भगवान का ही रूप हो। मेरे चेहरे को देखकर मोहल्ले कि महिलाएं तारीफ करने से थकती नहीं थीं। जिससे मेरी मां कि भी तारीफ होती थी। और यह सबकुछ देखकर मेरी तीनों चाचियों कि आत्मा कलप जाती थी। कि पुरे मोहल्ले कि महिलाएं हमारी जेठानी और उसके बच्चों कि ही तारीफ करतीं हैं। ऐसा क्या है। हमारी जेठानी और उसके बच्चों में। जो सबके सब उनकी तरफ ही खिंचे चले जाते हैं। और यह आकर्षण सच्चाई और ईमानदारी का था। क्योंकि मेरे माता-पिता सच्चाई कि राह पर चलकर धर्म का पालन करते थे। इसलिए भगवान ने मेरी मां और हमें ऐसा आकर्षक चेहरा और शरीर दिया था। क्योंकि मेरी मां और हमारे भीतर भगवान के जैसे गुण विद्यमान थे। हम लोगों के चेहरे देखकर मदद नहीं करते थे। हम लोगों कि परिस्थितियों और भावों को देखकर मदद करते थे। फिर चाहे वह व्यक्ति हमसे झुट ही क्युं ना बोल रहा हो हमारे घर के दरवाजे पर जो भी व्यक्ति मदद कि उम्मीद से आया हो हम उसकी मदद कर देते थे। फिर चाहे वह व्यक्ति हमारा दुश्मन ही क्युं ना हो या फिर वह व्यक्ति हमसे झुट ही क्युं ना बोल रहा हो। और हमारी यह आदत हमें नुकसान पहुंचा रहीं थीं। क्योंकि हम दोस्त और दुश्मन में फरक नहीं कर पा रहे थे। और इसी कि वजह से मेरे दादा-दादी कभी अमीर नहीं बन पाएं लेकिन अब मेरे माता-पिता भी सीधे साधे भोले भाले डरपोक कमजोर और भावनात्मक थें। मेरी मां के सामने कोई झुट मुट का रोने लग जाएं और अपनी परेशानी बताने लग जाएं तो मेरी मां भावनाओं में बहकर उस व्यक्ति कि मदद कर दिया करतीं थीं। और जो भी व्यक्ति मेरी मां के पास मदद के लिए आता था/थीं उन्हें हमारे घर भेजने वाली मेरी तीनों चाचीयां ही रहती थी। क्योंकि मेरी चाचीयों को पता था कि मेरी मां भावनात्मक रूप से कमजोर है। इसलिए मेरी चाची ताई जिस किसी को भी हमारे घर भेजती थी। उस महिला/पुरूष को बोल दिया करते थे कि अगर तुम्हें मदद चाहिए तो हमारी जेठानी के सामने खूब रोना धोना झुटी बातें बताना तो हमारी जेठानी तुम्हारी बातों पर भरोसा कर लेंगी और तुम लोगों कि मदद करने के लिए तैयार हो जाएगी। और ऐसा ही था भी। मेरी तीनों चाचीयां नहीं चाहतीं थीं कि मेरे माता-पिता के पास बहुत रुपया पैसा हो बहुत अच्छे रिश्तेदार हो। बहुत अच्छे बच्चे हों। बहुत अच्छा पति हो। मेरी चाचीयां हमेशा भगवान से मेरी मां को दुःख तकलीफ दिलवाने कि प्रार्थनाएं किया करतीं थीं। कि मेरे माता-पिता और मेरे भाई-बहनो का नुक़सान हो जाएं। मेरी बहनों के रिश्ते टुट जाएं। और मेरी बहनों कि वजह से फिर मेरी मां परेशान रहें। टेंशन डिप्रेशन में रहें। और टेंशन डिप्रेशन में फिर हमारे पैरों में आकर हमसे मदद कि उम्मीद करें हमारे हाथ पैर जोड़े। लेकिन भगवान भी सबकुछ देखते जा रहें थे। कि मेरी तीनों चाचीयां मेरी मां को परेशान करने के लिए उन्हें दुःख तकलीफ देने के लिए उनके रास्ते में कितने कांटे बिछा रही है। और कांटे बिछवाने का काम मेरी दादी और मोहल्ले कि महिलाओं से करवा रही हैं। लेकिन अब भगवान भी क्या कर सकते थे। अगर दादी और मोहल्ले कि महिलाएं मेरी तीनों चाचियों कि बातों पर भरोसा कर रही थी। तो क्योंकि सजा का भी नियम है। जो कर्म करता है। उसी को फल और सजा मिलती है। मेरी दादी और मोहल्ले कि महिलाएं मेरी तीनों चाचियों कि बातों में फसकर मेरी मां को और हम भाई-बहनों के लिए कांटे बिछा रही थी तो फिर भगवान सजा भी मेरी दादी और मोहल्ले कि महिलाओं को ही देगा। चलिए हम कहानी कि ओर चलतें है। अब मेरे पिता के दोस्तों कि वजह से मेरी दोनों बहनों का विवाह सम्पन्न हो चुका था। और वै दोनों बहनें अपने ससुराल में रहने लगीं थीं। और इधर मेरा जन्म हो चुका था। तो अब मुझे सम्भालने कि जिम्मेदारी मेरे भाई और एक बहन के ऊपर थीं। और मेरी मां ने मेरे दोनों भाई बहन को पढ़ाई लिखाई करने के लिए स्कुल में भर्ती करवा दिया था। यह सोचकर कि मेरे बच्चे भी मेरे देवरों कि तरह सरकारी नौकरी से लग जाएंगे। लेकिन अब मेरे पिता के पांचों भाई खाने कमाने लग चुके थे तो सभी भाई अपना अपना घर बनाने में लगे हुए थे। और इधर मेरे माता-पिता भी अपनी मेहनत मजदूरी करते थे। सभी भाईयों के बंटवारे हो चुके थे। और मेरी दादी छोटे चाचा के साथ रहतीं थीं। क्योंकि छोटे चाचा कि अभी शादी होना बाकी था। इसलिए दादी छोटे चाचा के साथ रहतीं थीं। मेरी मां ईमानदार और मेहनती थी। तो किसान मेरी मां कि ईमानदारी देखकर किसान अपनी फसल काटने के बाद खेत में जो आखिर में बचता था वह मेरी मां को ही ले जाने के लिए बोल दिया करते थे। साथ ही मेरी मां ईमानदार थी तो किसान मेरे माता-पिता को ही मजदुरी करवाने के लिए बोलते थे। जिससे माता-पिता कि आमदनी में वृद्धि होती चली गई और माता-पिता ने इतना पैसा इकट्ठा कर लिया कि मेरे माता-पिता ने एक किसान से खेत खरीदने कि बात रख दीं। तो किसान ने खेत कि किमत बताकर बात फाइनल कर दीं। लेकिन मेरे माता-पिता भोले भाले थें। इसलिए किसान से खेत लेने के पहले अपने पढ़ें लिखे नोकरी करने वाले चाचाओं से और गांव में रहने वाले चाचाओ से बात कि कि हम खेत ले रहे हैं। तो जैसे ही मेरी चाचीयों को पता चला कि मेरे माता-पिता खेत लेने कि सोच रहें हैं। तो चाचीयों ने सोचा कि अगर मेरे माता-पिता खेत खरीद लेंगे तब तो मेरे माता-पिता सभी भाईयों में ज्यादा पैसे वाले बन जाएंगे। और हम पीछे रह जाएंगे। तब तीनों चाचीयों ने तीकड़म लगाई और गांव के ही एक किसान को ही भड़काकर कहा कि हमारे जेठ जेठानी ने खेत कि किमत इतनी लगाई है। तो तुम ज्यादा किमत देकर किसान से खरीद लो। और ऐसा ही हुआ उस किसान ने ज्यादा पैसे देकर किसान से खेत खरीद लिया और मेरे माता पिता को पता भी नहीं चलने दिया। कि खेत खरीद लिया गया। मेरे माता-पिता ऐसे थे। कुछ भी खरीदने बेचने से पहले अपने भाईयों से और दादी से पुछते थे। या फिर लोगों से पुछते थे। मतलब सबको बताकर कोई भी वस्तु खरीदते बेचते थे। और माता-पिता कि इसी आदत का लोग फायदा उठा लिया करते थे। और मेरे माता-पिता आखिर में मुंह ताकते रह जाते थे। लेकिन अब भगवान भी क्या कर सकता था। क्योंकि मेरे माता-पिता मेरे चाचा-चाची पर आंख बंद करके भरोसा किया करते थे। लेकिन मेरी तीनों चाचियों के मन में मेरे माता-पिता और भाई-बहनों के लिए केवल जहर ही भरा रहता था। मेरी चाचीयों का बस एक ही मकसद रहता था कि मेरी मां सुख शांति से जीवन ना जी पाएं और सिर्फ दुःख तकलीफ उठाती रहें। लेकिन भगवान ऐसा होने नहीं देते थे। अगर चाची मां मेरे माता-पिता के एक मार्ग को बंद कर देते तो भगवान मेरे माता-पिता के जीवन यापन के लिए दुसरा मार्ग खोल देते थे। ताकि मेरे माता-पिता को किसी भी वस्तु कि कोई कमी ना रहे। लेकिन अब क्या अब तो दुसरे किसान ने खेत खरीद लिया था। अब क्या कर सकते हैं। लेकिन फिर मां ने सोचा कि अब जो पैसे बचे हैं। हम इन पैसों को हमारे बच्चों कि पढ़ाई लिखाई पर खर्च कर देंगे। लेकिन मेरी चाचीयों कि नज़र में मेरे माता-पिता के बचे हुए पैसे खटक रहे थे। क्योंकि भले ही खेत नहीं खरीद पाएं लेकिन खेत के पैसे तो सही सलामत ही थें। और जब तक पैसे हाथ में है। तब तक तो मेरे माता-पिता मेरी तीनों चाचियों से आगे ही थें। तो तीनों चाचीयां चाहतीं थीं कि हमारी जेठानी का ऐसा क्या नुकसान करवाया जाएं कि खेत के बचे हुए पैसे उस नुकसान में खर्च हो जाएं। मेरे माता-पिता के पैसे खर्च करवाने के लिए मेरी तीनों चाचियों ने अपनी अपनी लड़कियों को सीखा पढ़ा दिया। कि तुम सभी मिलकर मेरी छोटी बहन को उसके पति के नाम से चीढ़ाना क्योंकि मेरी बहन सीधी-सादी भोली-भाली थीं। और मेरी तीनों चाचियों को मेरी बहन के सीधेपन और भोलेपन के बारे में पता था कि हमारी जेठानी कि लड़की सीधी-सादी भोली-भाली है। अगर हमारी लड़कियां उसे उसके पति कि झुटी बातें बोलकर चिढ़ाएंगी तो वह हमारी लड़कियों कि झुटी बातों पर भरोसा कर लेंगी। और रिश्ता तुड़वाने कि जीद करेंगी। और अब मेरी तीनों चाचियों ने अपनी अपनी लड़कियों को मेरी बहन को उसके पति के नाम से चिढ़ाने के लिए बाते सिखाई और कहां कि एक दो और लड़कियों को साथ में ले लेना और फिर दीपक कि बहन का मजाक उड़ाना। दीपक कि बहन है सीधी-सादी भोली-भाली वह तुम्हारी बातों पर भरोसा कर लेंगी और ससुराल जाने से मना कर देगी। और फिर हमारी जेठानी का बनेगा तमाशा। और अब चाचीयों कि लड़कियों ने वैसा ही किया। और मेरी बहन को उसके पति के नाम से चिढ़ाने और मजाक उड़ानें लगी कि तेरा पति ऐसा दिखता है वैसा दिखता है। तेरे माता-पिता ने तेरे लिए ऐसा क्या पति ढुंढा यह तो तेरे साथ में बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता है। तेरे माता-पिता ने तो तेरी शादी इस लड़के से करवाकर तेरी जिंदगी खराब कर दी है। देख तो हमारे पतियों को हमारे माता-पिता ने हमारे लिए कैसे पति ढुंढे है। और इतनी सारी बातें मेरी बहन ने सुनी तो मेरी बहन सच में भी चाचीयों कि बातों पर विश्वास कर लिया और मेरे माता-पिता पर गुस्सा करने लगीं। और गुस्से में घर आकर रोने लगी। तो माता-पिता ने रोने का कारण पूछा तो दीदी ने कहा कि मैं अब ससुराल नहीं जाऊंगी। तो माता-पिता ने पुछा कि क्युं क्या हुआ तो दीदी ने कहा कि तुम लोगों ने मेरे लिए कैसा पति ढुंढा है। मेरी सहेलियां मुझे हसती है मेरा मजाक उड़ाती है। तो में तो अब ससुराल में नहीं जाऊंगी। बस यह जीद लेकर मेरी दीदी बैठ गई। और ससुराल जाने से साफ इंकार कर दिया। सभी लोग समझा समझा कर थक गए लेकिन मेरी दीदी अपनी जीद से टस से मस नहीं हुई। और आखिर में फिर रिश्ता तोड़ना पड़ा। और अब दीदी का रिश्ता टुटने के बाद दीदी के लिए दुसरा रिश्ता ढुंढना था। अब दुसरा रिश्ता कोई पेड़ पर तो लगा नहीं था। जो उचकर तोड़ लेते। बेटी का रिश्ता टुटने से माता-पिता कि इज्जत भी खराब होती है। लेकिन अब बहन कि ऐसी हरकतों के आगे माता-पिता बेबस थें। और मेरी बहन ही नहीं हम सभी भाई बहन ऐसे ही थें। हमें झुट बात बिल्कुल भी पसंद नहीं है। और मेरी चाचीयां हमारी इसी बात का फायदा उठाकर हमारे नुकसान करवा दिया करते थे। अपनी लड़कियों को लड़कों को हमें झुटी बातें बताकर उकसाते थे और भड़काते थें। चाचीयों को पता था कि अगर इन्हें झुटी बातें बोलकर भड़काया जाएगा या उकसाया जाएं तो यह आसानी से भड़क जाएंगे। और अपना ही नुकसान कर बेठेगें।