ट्वीनफ्लेम और सोलमेट्स कहानी में। जब मेरी तीनों चाचीयां अपने पतियों और मेरी दादी को मेरी मां के खिलाफ भड़काने के लिए मेरी मां कि झुटी बातें बोलने लगी तो मेरे चाचाओं ने मेरी तीनों चाचीयां कि बातों पर भरोसा नहीं किया और बातों को नजरंदाज करते हुए मेहनत मजदूरी करने में व्यस्त हो गए। लेकिन मेरी तीनों चाचीयां हार मानने वालीं नहीं थी। क्योंकि मेरी पांचवें नंबर वाली चाची को अपने ससुराल में सबका भगवान बनकर रहना था। और भगवान बनने के लिए सच्चाई और अच्छाई दिखानी पड़ती थी। साथ ही सबको इज्जत कदर मान सम्मान भी देना पड़ता है। लेकिन मेरी चाची कि सोच अलग ही थीं। मेरी चाची मेरी मां के साथ छल कपट करके चालाकियां दिखाकर झुटे इल्जाम लगाकर बदनाम करके सबकी नजरों में अपना ओहदा बनाना चाहतीं थीं। और इस काम में चाची ने दुसरे और तीसरे नंबर कि चाचीयों को मां के खिलाफ भड़काकर अपने जाल में फंसाया और दोनों चाचीयां पाचवें नंबर वाली चाची के जाल में फस भी गई। और जाल में इसलिए भी फस गई। क्योंकि दोनों चाचीयां भी मेरी मां से चीढ़ी हुई थी। क्योंकि मेरी मां कि वजह से दादी और अपने पतियों कि डांट-फटकार खानी पड़ती थी। क्योंकि उनके माता-पिता कि आर्थिक स्थिति कमजोर थीं तो वै दोनों चाचीयां अपने माता-पिता के घर से अपने पतियों और सांस-ससुर के लिए कोई भी वस्तुएं लेकर नहीं आतीं थी। जिससे उन्हें दादी और अपने पतियों कि डांट-फटकार खानी पड़ती थी। इसलिए वै दोनों चाचीयां भी मेरी मां को बदनाम करके सबकी नजरों से उतारना चाहती थी। लेकिन अब तीनों चाचीयों के बनाएं हुए प्लान को ऊपर से देख रहे थे। कि तीनों चाचीयां कोनसे खेल को अंजाम देने कि फिराक में बेठी है। लेकिन मेरी मां बहुत सीधी-सादी भोली-भाली डरपोक थीं। तो मेरी मां तीनों चाचीयों के खेल को समझ नहीं पायी। कि तीनों के मन में अब मां के लिए जहर भरा हुआ है। अब तीनों चाचीयों ने मेरी मां के खिलाफ दादी और चाचाओं के कान भरने शुरू कर दिए। लेकिन शुरुआत में तो मेरे चाचा और दादा-दादी चाचीयों कि बातों पर भरोसा नहीं करते थे। लेकिन चाचीयों ने अपने पतियों और दादी को मेरी मां के खिलाफ भड़काना जारी रखा। और अब जब चार भाईयों कि शादी हो गई और चारों भाइयों के घर दो-दो तीन-तीन बच्चे हो गये तो फिर चारों भाइयों को दादी का घर छोटा पड़ने लगा। तो दादी ने चारों भाइयों को अलग-अलग रहने के लिए जगह दें दि। तीन भाईयों को दादी ने अपने घर के पास वाली जमीन दी। लेकिन मेरे माता-पिता को अपने घर से दूर रहने की जमीन दी। तो मेरी मां ने दादी से इस बात के लिए लड़ाई झगड़े किए तो दादी ने कहा कि तेरे लिए यहां जगह नहीं है। तेरे लिए उधर गांव से बाहर जमीन है। तो मेरी मां ने कहा कि मैं पेट से हुं। और उधर रहने पर मुझे और मेरे बच्चे को कुछ हो गया तो। तो दादी ने कहा कि अगर तेरे बच्चे को कुछ हो जाए तो उसे भी घर कि नींव में ही रख देना लेकिन तुझे यहां जमीन नहीं मिलेगी। तो मेरी मां ने संदेशा मेरे नाना और मामाओं को भेजा। तो मेरे नाना मेरी दादी कि आदतों से वाकिफ थे। इसलिए वै अपनी इज्जत खराब करवाने के लिए और मेरी दादी को समझाने के लिए मां के पास नहीं आएं। और मेरे बड़े मामा को मेरी दादी को समझाने के लिए भेज दिया। जब मेरे बड़े मामा मेरी दादी को समझाने लगे कि समधन जी आप मेरी बहन को ऐसी जगह रहने कि जगह क्युं दे रही है। एक तो वह घर बना हुआ भी नहीं है। और दुसरी बात यह है कि मेरी बहन पेट से भी है। वह अकेली सबकुछ कैसे करेंगी। लेकिन मेरी दादी तो मेरी तीनों चाचीयों और चाचाओ कि बातें सुनने लगीं थीं। तो मेरी दादी ने मेरे मामा को कहा कि मैं तो तेरी बहन को वहीं रहने के लिए जमीन दुंगी। और अगर तुझे तेरी बहन पर इतना ही तरस आ रहा है तो फिर अपनी बहन के लिए महल बनवा दें। मेरी तीनों चाचीयां जानती थी कि अगर मेरी दादी मेरी मां को रहने के लिए जमीन नहीं देंगी तो हमारी जेठानी अपने भाईयों के पास भागकर जाएगी। और दादी कि शिकायत करेंगी। और अपने पिता और भाइयों को बुलाकर लाएगी। और जब हमारी जेठानी के पिता और भाई घर आएंगे तो हम अपने पतियों को भड़काकर अपनी सांस को जेठानी के पिता और भाइयों कि बेइज्जती और गालियां दिलवाएंगे। और मेरी दादी वैसा ही व्यवहार करतीं थीं। जैसा मेरी चाचीयां दादी को सीखाती पढ़ाती थी। लेकिन फिर जब मेरे बड़े मामा ने देखा कि मेरी दादी अपनी बातों से जरा भी टस से मस नहीं हो रही है तो फिर मेरे बड़े मामा मेरी दादी से अपनी बेइज्जती करवाकर अपने घर वापस लौट गए। और नाना नानी को सबकुछ बता दिया। फिर मेरे दुसरे नंबर के मामा ने नाना-नानी और बड़े मामा कि बातें सुन ली। तो उन्होंने अपने गांव के एक जमींदार कि बेलगाड़ी लेकर मेरे माता-पिता के पास आ गये। और मेरे माता-पिता को बेलगाड़ी में बिठाकर अपने घर ले आए। और फिर माता-पिता के लिए मेरे नाना नानी और गांव के दुसरे नाना-नानी ने मिलकर मेरे माता-पिता का घर बना दिया। फिर माता-पिता उस घर में रहते और अपनी दिनचर्या पुरी करते माता-पिता दोनों काम करने जातें। और शाम को खाना खा पीकर आराम करते। मेरे नाना-नानी मेरी मां कि हालत देखकर बोलते कि बेटी तु इस हालत में काम करने मत जाया कर अगर तुझे रास्ते में कुछ हो गया तो लोग मुझे हंसेंगे। कि इसका बाप इसका पेट भी नहीं भर सकता है। जो उसे इस हालत में काम करने जाना पड़ रहा है। तो मां ने कहा कि फिर में क्या करु और अगर आपको मेरी फिकर होती है तो फिर आपने मुझे ऐसे घर में क्युं ब्याही भले कुछ भी हो मेरा नसीब जो होगा देखा जायेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ और बच्चा स्वस्थ पैदा हुआ। लेकिन अब मेरे दादाजी कि तबियत खराब होने लगी। और उधर मेरे छोटे मामा को शराब पीने कि लत थीं। तो वै मेरे माता-पिता से शराब के पैसे मांगते रहते थे। और पैसे ना देने पर घर से बाहर निकालने कि धमकियां देते थे। मां गर्भवती थीं। और पहले ही अपनी सांस और देवर देवरानीयों कि वजह से परेशान रहती थी। और अभी ऐसी हालत में वै और परेशान या बेघर नहीं होना चाहती थी। इसलिए मामा कि धमकियों से डरकर उन्हें शराब के पैसे दे दिया करतीं थीं। इसलिए भी पैसे दे दिया करतीं थीं। क्योंकि मामा ही थें जो माता-पिता को दुःख तकलीफ से निकालकर अपने गांव लेकर आएं थे। लेकिन मामा यह भी जानते थे कि मेरे माता-पिता सीधे साधे भोले भाले डरपोक है। और अपने हालातों के सामने मजबुर है। इसलिए बहन-बहनोई मेरी धमकियों का विरोध नहीं करेंगे और चुपचाप मुझे पैसे दे दिया करेंगे। लेकिन अब मां भी मामा कि हरकतों से परेशान होने लगी थी। और और बच्चा भी हो गया था। तो मेरी मां ने मेरे मामा कि हरकतों के बारे में मेरे नाना को बता दिया। तो नाना ने फिर मेरे मामा को बहुत गालियां दी। और अब मेरी माता पिता को परेशान ना करने कि धमकियां दी। पर मेरे माता-पिता भी डर गये कि मेरे मामा शराबी आदमी ठहरा उसका क्या भरोसा। रात में ही लड़ाई झगड़े करने लग जाएं। इसलिए फिर मेरे माता पिता ने वापस अपने घर आने के बारे में सोच बना ली और वापस अपने घर लोट आएं लेकिन अब मेरे दादाजी और नानाजी कि तबियत ठीक नहीं रहतीं थीं। और थोड़े ही दिनों बाद मेरे दादाजी चल बसे। फिर मेरे माता पिता ने नाना-नानी के घर रहकर जो पैसे कमाए थे। उन पैसों से अच्छी जगह पर जमीन खरीदी। और इधर दादाजी कि मृत्यु के बाद मेरे चौथे नंबर के चाचा जो कि पढ़ाई लिखाई करते थे। उनकी सरकारी नौकरी लग गई। और वै नोकरी करने के लिए उस गांव में रहने के लिए चले गए। और वहां रहकर अपनी नोकरी करने लगे। और चाचा ऐसे डिपार्टमेंट में लगे हुए थे कि उन्हें खाने पीने की वस्तुएं भी मिलती थी। तो चाचा खाने पीने कि वस्तुएं घर भीजवा दिया करते थे। लेकिन जब खाने पीने कि वस्तुएं दादी के पास आतीं थी तो खाने पीने कि वस्तुएं सिर्फ तीन भाईयों के घर जाती थी। मेरे घर मेरी चाचीयां दादी को देने से मना कर दिया करतीं थीं। लेकिन जब चाचा को तनख्वाह मिलती थी तो चाचा अपनी नौकरी कि तनख्वाह दादी को ना देकर मेरी मां को दिया करते थे। क्योंकि मेरी दादी मेरी पांचवें नंबर वाली चाची के साथ रहतीं थीं। और चाचा मेरे पांचवें नंबर के चाचा चाची कि आदतों हरकतों से वाकिफ थे। कि दोनों बहुत चोटोरे और बेइमान है। अगर मैं अपनी तनख्वाह दादी को दुंगा तो यह दोनों दादी को बेवकुफ बनाकर उससे सारे पैसे छीन लेंगे। और मेरी मेहनत बेकार चली जायेगी। लेकिन अगर मैं अपनी तनख्वाह के पैसे बड़े भाई भाभी के पास रखता हूं तो भईया-भाभी से जब मागुगां तब मुझे उतने ही पैसे मिलेंगे जितने में उन्हें रखने के लिए दुंगा। लेकिन मेरी पांचवें नंबर कि चाची ने देखा कि मेरे चाचा अपनी तनख्वाह के पैसे मेरे माता-पिता के पास रख रहे हैं। तो मेरी चाची ने फिर से तीकड़म लगाई और मेरी दादी को मेरे माता-पिता के खिलाफ भड़काने लगीं कि चाचा अपनी तनख्वाह के पैसे जीवन बेन के माता-पिता के पास रख रहे हैं। तो क्या जीवन बेन के माता-पिता क्या चाचा के माता-पिता है। जो अपनी नोकरी कि तनख्वाह आप को ना देकर जीवन बेन के माता-पिता को दें रहें हैं। चाचा को क्या जीवन बेन के माता-पिता ने पैदा किया है। जो नोकरी कि तनख्वाह अपनी पैदा करने वाली को ना देकर भाई-भाभी को रखने के लिए दे रहे हैं। चाचा को आप पर भरोसा नहीं है क्या। और अपने भाई-भाभी पर इतना भरोसा है कि वै चाचा के पैसों को सम्भालकर ही रखेंगे। और मां पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं है। चाची ने मेरी दादी को भड़काते हुए कहा कि अब आप होशियार बनकर रहो। और चाचा से कहो कि वै अपनी तनख्वाह आपको लाकर दे। जीवन बेन के माता-पिता को देते रहें तो जीवन बेन के माता-पिता अपना घर बनाते रहेंगे। और आखिर में चाचा को बेवकुफ बना देंगे कि यहां खर्च हो गए न वहां खर्च हो गए। आप चाचा को बोलकर पैसे अपने हाथ में रखो। और मेरी दादी मेरी चाची के बीछाए जाल में फस गई। और चाचा से बोलने लगी कि अब तेरी तनख्वाह के पैसे मेरे हाथ में लाकर रखा कर बड़े भईया-भाभी को देने कि कोई जरुरत नहीं है। लेकिन मेरे चाचा बहुत होशियार थें। कि अगर मेने अपनी तनख्वाह अपनी मां को दें दि तो फिर पांचवें नंबर के भाई और उसकी पत्नी मेरी मां को बेवकुफ बना बनाकर मेरी सारी तनख्वाह को चट कर जाएंगे। इसलिए फिर चाचा ने छठवें नंबर के चाचा को अपने साथ लेकर चले गए। ताकि दादी के सामने बहाना बना सकें कि जो तनख्वाह बचती है। वह तनख्वाह छोटे भाई कि पढ़ाई लिखाई में खर्च हो जाती है। और अब पैसे बचते ही नहीं है। और जब चाचा ने यह चाल चली तो पांचवें नंबर कि चाची खिसियानी बिल्ली कि तरह खंबा नोचते हुए रह गई। चाची ने सोचा था कि चाचा अपनी तनख्वाह दादी को देते रहेंगे और हम दोनों उस तनख्वाह से अपना घर बनाते रहेंगे। मेरी चाची मेरी मां के लिए जीतनी भी चालाकियां करतीं जाल बिछाती आखिर में उस जाल में वह खुद ही फस कर रह जाती। मेरी पांचवें नंबर कि चाची कि सोच यह थी कि घर में मेरी मां कि जैसी इज्जत कदर मान सम्मान है। वह इज्जत कदर मान सम्मान मेरी मां से छीनकर मेरी चाची को दें दिया जाय और घर के सभी कार्यों के निर्णय मेरी चाची से लेने के लिए बोला जाएं। और फिर मेरी चाची बड़े मान सम्मान के साथ सबके जीवन के निर्णय लेती। लेकिन अफ़सोस ऐसा हो नहीं पाता था। फिर धीरे से चाचा दादी को भी अपने साथ लेकर चलें गये। और अपने साथ ही रखने लगे। ताकि अगर चाचा दादी को अपनी तनख्वाह रखने के लिए दे भी तो दादी पैसों को कहा खर्च करती चाचा को पता चलता रहता। उधर मेरे नाना भी चल बसे। फिर रह गई मेरी नानी लेकिन नाना के जाने के बाद नानी भी बिमार रहने लगीं। लेकिन तब तक मेरी तीनों मामीयां आ चुकी थी। लेकिन अब मामीयों में भी भेदभाव होने शुरू हो गए थे। लेकिन तीनों मामाओं ने मामीयो को बोल दिया कि अगर हमारी मां कि सेवा तुम तीनों से नहीं होती है तो फिर उनकी बातें भी हम तुम्हारे मुंह से सुनना नहीं चाहते हैं। और अगर हमें किसी ने कह दिया कि तुम्हारी बीवीयां तुम्हारी मां के बारे में ऐसा-वैसा बोलतीं है तो तीनों को तुम्हारे घर वापस भेज देंगे। तो मामीयों ने भी इस बात कि गांठ बांध ली और जब तक मेरी नानी इस दुनिया से विदा नहीं हो गई। तब तक मेरी मामीयां किसी को कुछ भी नहीं बोलतीं थी।