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Twinflam and soulmate's epi 2

ट्वीनफ्लेम और सोलमेट्स कहानी का दुसरा भाग मेरे नाना-नानी मेरे दादा-दादी मेरे मामा-मामी मोसा-मोसी मेरे चाचा-चाची और मेरे माता-पिता के जीवन के बारे में लिख रहा हूं। मेरे नाना-नानी सत्य के मार्ग पर चलकर धर्म का पालन करते हुए प्रभु कि भक्ती करते हुए अपने जीवन को व्यतित कर रहे थे। लेकिन अशिक्षित होने लोगों कि नकारात्मकता और अपने डर और शक के चलते मेरे नाना-नानी अपने जीवन में कोई सकारात्मक परिवर्तन ला नहीं पाएं। लेकिन नाना-नानी ने सत्य के मार्ग और धर्म का पालन करना नही छोड़ा जिससे उन पर परमात्मा कि कृपा हमेशा बनी रहती थी। फिर मेरे नाना-नानी के घर मेरे मामा मोसी और मेरी मां का जन्म हुआ। छः भाई-बहन थें। फिर नाना-नानी को दो बड़े मामा और दो मोसी का काम कमाई करने में सहयोग मिलने लगा। जिससे नाना-नानी कि आर्थिक स्थिति थोड़ी और ज्यादा अच्छी होने लगी। मेरी मां और एक छोटे मामा अभी छोटे थे। तो नाना-नानी के लाडले बच्चे थे। तो नाना-नानी मेरी मां और मामा से मेहनत मजदूरी नहीं करवातें थें। जब नाना-नानी को दो बड़े मामा और मोसी का सहयोग मिलने लगा तो नाना-नानी के घर खाने पीने पहनने ओढ़ने कि समस्या नहीं थी। और नाना कि ईमानदारी को देखकर कुछ जमींदार नाना से ही अपने घर के सारे काम करवातें थें। जिससे नाना कि आमदनी अच्छी हो जाती थी। मेरी मां और छोटे मामा ने नाना-नानी के समय कोई भी मेहनत मजदूरी नहीं कि थी। सब लोग उन्हें लाड़ प्यार से रखते थे। लेकिन अब मेरी मां और मामा भी धीरे-धीरे बड़े होते जा रहे थे। और दो बड़े मामा और मोसीयों कि उम्र भी बढ़ती जा रही थी। तो नाना-नानी ने दो मामा और दो मोसीयों के लिए अच्छे रिश्ते देखकर उनका विवाह तय कर दिया। और तय समय आने पर दोनों मोसी को उनके ससुराल विदा कर दिया।मोसीयों कि विदाई के बाद दो मामीयों का आगमन हो गया। दोनों मामी भी मेहनत मजदूरी करने में निपुण थी। तो मामीयों के आने के बाद भी नाना-नानी ने मेरी मां से कभी कोई मेहनत मजदूरी नहीं करवाई। लेकिन मां कि उम्र बढ़ने के साथ नाना-नानी को मां के विवाह कि चिंता फिकर भी सताने लगी। कि दो बेटियों को तो अच्छा ससूराल मिला है। लेकिन अब इस लड़की के भाग्य में भगवान ने क्या लिखा है। पता नहीं इस लड़की को ससुराल कैसा मिलता है। इधर मेरे दादा-दादी का जीवन गरीबी भुखमरी लाचारी में गुजर रहा था। उस समय अंग्रेजी हुकूमत और जमींदारों कि गुलामी अशिक्षा के चलते परिस्थितियों के सामने अपने घुटने टेक दिए थे। और सिर्फ अपना पेट भर रहें थे। अनाज और रुपया पैसा के आभाव में जैसे-तैसे अपना पेट भर रहें थे। पेट भरने के लिए किसानों के घर जमींदारों के घर मेहनत मजदुरी करने के बाद किसान जमींदार जो आनाज देते थे। उसी अनाज से अपना और अपने बच्चों का पेट भरते थे। मगर उतने आनाज से इतने लोगो का पेट भरता नहीं था। तो पेट कि भुख मिटाने के लिए फिर आनाज के लिए किसानो के जमींदारों के खेतों से आनाज कि चोरी करते या फिर किसानों के जमींदारों के मरे हुए पशुओं का मांस खाकर अपना गुजर-बसर करते थे। दादा-दादी कि ग़रीबी भुखमरी इतनी ज्यादा थी कि ना तो खाने को ना पीने को ना पहनने ओढ़ने कि व्यवस्था सही से हो पातीं थीं। विवाह के समय दादी को उनकी मां ने जो कपड़े खरीद कर दिए थे। उन्हीं कपड़ों को पहनते रहो। मेरे दादा-दादी कि स्थिति परिस्थिति बहुत दयनिय थीं। मेरे दादाजी बहुत सीधे-सादे भोले-भाले और ईमानदार व्यक्ती थे। लेकिन जमाने में सीधे साधे भोले भाले लोगों का कोई काम नहीं है। अगर आप सीधे साधे बनकर रहोगे तो लोग आपको परेशान करेंगे आपको दुःख तकलीफ देंगे। लेकिन मेरी दादी बहुत चंट चालाक थी। लेकिन सिर्फ दादी का चंट चालाक होने से दादा-दादी कि ग़रीबी भुखमरी खतम नहीं हो पाएगी। मेरी दादी को मेरे दादाजी के ऐसे स्वभाव पर बहुत गुस्सा आता था। और दादी फिर मेरे दादाजी को बहुत भला बुरा सुना दिया करतीं थीं। लेकिन मेरे दादाजी भगवान कि मर्जी कहकर दादी कि डांट-फटकार को नजरंदाज कर दिया करते थे। लेकिन जब दादाजी दादी को भगवान कि मर्जी का बोलते थे तो मेरी दादी को और भी ज्यादा गुस्सा आता था। और दादी भगवान को भी भला बुरा सुना दिया करतीं थीं। कि अगर भगवान होता तो क्या भगवान को हमारी गरीबी भूखमरी नज़र नहीं आती है। कि हम किस तरह से ग़रीबी में जीवन यापन कर रहे हैं। दुःख तकलीफ परेशानी उठा रहे हैं। मुख से मर रहे हैं। यह सबकुछ भगवान को नज़र नहीं आता है। मेरी दादी का भगवान पर से विश्वास खतम हो गया था। और मेरी दादी का भगवान पर विश्वास बनाने के लिए मेरी मां का विवाह इसी घर में होना लिख दिया। भगवान ने मेरी मां को इस घर में इसलिए भेजा क्योंकि मेरी मां सीधी-सादी भोली-भाली मासुम डरपोक कमजोर और भावनात्मक थीं। और भगवान ऐसे बच्चों कि परछाई बनकर उनके साथ रहते हैं। क्योंकि ऐसे बच्चों का ह्रदय बहुत कोमल होता है। जिसमें हर किसी के लिए दया करुणा ममता प्रेम स्नेह भरा होता है। ऐसे बच्चे बीना स्वार्थ के लोगों कि पशु पक्षियों कि जीव-जंतुओं कि मदद कर देते हैं। फिर चाहे वह दुश्मन ही क्युं ना हो। क्योंकि ऐसे बच्चों से किसी का दुःख दर्द देखा नहीं जाता है। और दुसरो को दुःख तकलीफ में देखकर उसकी सहायता करने के लिए तैयार हो जाएंगे। फिर चाहे खुद कितनी ही बड़ी तकलिफ से क्युं ना गुजर रहे हों। अपना दुःख दर्द भुलकर दुसरे के दुःख दर्द के लिए परमात्मा से प्रार्थना करना। और निस्वार्थ प्रेम सहायता केवल परमात्मा ही कर सकते हैं। मनुष्य कि हेसियत ही नहीं है कि वह दुसरों कि निस्वार्थ रुप से सहायता कर दें। लेकिन अगर धरती पर ऐसा मनुष्य विद्यमान है जो दुसरो कि निस्वार्थ सहायता करने में विश्वास रखता है तो। वह फिर मनुष्य नहीं है। वह स्वयं परमात्मा का अंश है। और अब मेरी मां का ह्रदय ऐसा ही था। तो भगवान ने मेरी मां को मेरे दादा-दादी कि ग़रीबी भुखमरी लाचारी को मिटाने और परमात्मा पर विश्वास बनाने के लिए मेरी मां के भाग्य में मेरे पिताजी का साथ लिख दिया। और अब इधर मेरे दादा-दादी के घर मेरे पिता और उनके भाई-बहनों कि उम्र विवाह लायक हो गई थी। लेकिन दादा-दादी कि ग़रीबी भुखमरी लाचारी आर्थिक स्थिति के कमजोर होने और दादी के गुस्सेल स्वभाव के चलते। गांव का कोई भी व्यक्ति मेरे पिता और बड़ी बुआ के लिए रिश्ते देखने से मना करते थे। दादी को गुस्सा इसलिए आता था। क्योंकि मेरे दादाजी बहुत सीधे-सादे भोले-भाले ईमानदार और धीमी गति से काम करने वाले थे। और उस समय अनाज पिसने वाली चक्की नहीं थीं। उस समय आनाज पिसने के लिए घट्टीया होती थी। जिसको हाथ से चलाकर आनाज पिसा जाता था। तो अगर मेरी दादी दादाजी को किसान के घर आनाज लेने भेजती थीं तो दादाजी जल्दी आनाज लेकर नहीं आतें थे। और घर पर सबका भुख से हाल-बेहाल होता था। और गांव के दुसरे पुरुष किसान को झुट बोलकर बेवकुफ बनाकर आनाज घर जल्दी लेकर आ जाते थे। और वै जल्दी खाकर काम करने निकल जाते थे। लेकिन दादाजी देरी से घर आते थे तो दादी फिर उस आनाज को घट्टी में पिसती फिर उसका खाना बनाती फिर खेतों में काम करने जाती। मेरी दादी सात बच्चों और दो पति-पत्नी का खाना पिसना भी और पकाना भी और फिर काम पर भी जाना दादी कि मदद करने वाला कोई नहीं था। इसलिए दादी इतने सारे लोगों का काम करके चिड़चिड़ापन आ जाता था। और इस चिड़चिड़ेपन कि वजह से दादी फिर हर किसी को डांट फटकार लगा दिया करतीं थीं। और दादी कि इस डांट फटकार को मोहल्ले वाले भी सुन लिया करते थे। मेरे पिता के पांच भाई और दो बहनें थीं। सबसे बड़ी एक बहन और दुसरे नंबर पर मेरे पिता थे। दादी कि गरीबी भूखमरी और गुस्सेल स्वभाव के कारण बुआ और मेरे पिता के विवाह के लिए कोई भी व्यक्ति रिश्ता बताने के लिए तैयार नहीं होता था। लेकिन भगवान को तो मेरी मां को इस घर में भेजना ही था। क्योंकि मेरी मां के आने से ही मेरे दादा-दादी कि ग़रीबी दरिद्रता और भुखमरी दुर होगी। तो अब अगर मेरी मां को भगवान ने इस परिवार कि दरिद्रता और भुखमरी को खतम करने के लिए चुना है। तो फिर मेरी मां को इस घर में भेजने के लिए मार्ग भी भगवान ही बनाएंगे। कि मेरी मां को इस परिवार में कैसे भेजा जाय। इसी परिवार में मेरे दादाजी के भईया-भाभी थें। जिनकी कोई संतान नहीं थी। लेकिन दोनों के पास रुपया पैसा धन दौलत कि कोई कमी नहीं थीं। लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। तो वें दोनों पति-पत्नी मेरे पिता और पिता के भाई-बहनों को ही अपनी संतान समझते थे। तो लोगों ने इस बात को हवा दे दी। कि मेरे पिता इकलोते है। और मेरे पिता के माता-पिता के पास रुपया पैसा धन दौलत कि कोई कमी नहीं है। और इसी बात को मेरी नानी के भाईयों ने सुना तो। मेरे नाना-नानी को यह बात बताई कि सामेड़ा गांव में एक लड़का है। और वह इकलौता ही है। और उसके माता-पिता के पास रुपया पैसा धन दौलत की कोई कमी नहीं है। तो तुम अपनी लड़की का विवाह उस लड़के से कर दो। तो नाना-नानी ऐसे रिश्ते कि बात सुनकर खुश हो गए। और नाना ने अपने सालों को कहा कि रिश्ता तो अच्छा है। बात चलाओ शादी कि नाना ने अच्छे रिश्ते कि तारीफ सुनी तो नाना-नानी ने मेरे पिता और पिता के घर बार को देखना जरूरी नहीं समझा। और बिना देखे मेरे दादाजी को मार्केट (बाजार) में बुलाकर एक दुसरे कि शराब पीकर रिश्ता तय कर दिया पक्का कर दिया। उस समय बात का मान रखा जाता था। जबान दें दीं तो दें दीं फिर जुबान का मान रखना पड़ता था। और नाना भी खुशी-खुशी अपने घर लोट गये। और ईधर दादाजी भी खुशी-खुशी अपने घर लौट आए। ना पिताजी ने मां को देखा ना मां ने पिताजी को देखा। बस रिश्ता तय कर दिया गया। नानाजी ने दादाजी को जुबान दे दी। और दादाजी ने नानाजी को जुबान दे दी। और बारात लाने के लिए दिन तय कर दिया। अब जिस दिन मेरे दादाजी मेरे पिताजी कि बारात लेकर नानाजी के घर गये। उस दिन मेरे पिताजी को मेरे नाना-नानी मामा-मामी मोसा-मोसी सब लोगों ने देखा। मेरे नाना-नानी मामा-मामी ने मेरी मां को अपने घर में फुल कि तरह रखा था। मेहनत मजदूरी करवाते नहीं थें। तो मेरी मां बहुत सुंदर दिखती थी। लेकिन मेरे पिताजी बचपन से ही मेहनत मजदूरी करने लगे थे। तो वै उतने सुंदर नहीं थें। और उस समय आज जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। कि जेन्ट्स पार्लर गये। और चेहरा क्लीन करवा कर आ गये। पेट ही बड़ी मुश्किल से भरता था। और उसके लिए भी बहुत संघर्ष करने के बाद मिलता था। और जितना मिल जाए उसी में संतोष कर लों। पर अब कर भी क्या सकते थे। नानाजी दादाजी को अपनी जुबान दे चुके थे। पर नानाजी ने खुद में संतोष कर लिया कि सुंदरता नहीं भी हैं तो क्या हुआ। कम से कम लड़का अपने माता-पिता का इकलौता लड़का है। मेरी लड़की खुश रहेगी। सुख शांति से रहेगी। यही बात सोचकर नानाजी ने खुद को संतुष्ट कर लिया और मेरी मां का विवाह मेरे पिताजी के साथ सम्पन्न कर दिया। फिर विवाह के बाद मेरी मां कि विदाई कर दी गई। जब अगले दिन नानाजी मेरी मां को लेने के लिए मेरे दादाजी के घर आएं तो गांव में आते ही गांव वालों से मेरे दादाजी के भाई का नाम पुछते-पुछते चले आएं। मेरे नानाजी ने अपने सालों के मुंह से मेरे दादाजी के भाई का नाम सुना था कि मेरे पिता उनके बेटे हैं। तो नाना को लगा कि मेरे दादाजी ही वह आदमी है। इसलिए नानाजी ने दादाजी से कभी उनका नाम नहीं पुछा। और मेरी मां का रिश्ता तय कर दिया। और अब जब मेरे नानाजी विवाह के दुसरे दिन मेरी मां को लेने के लिए ससुराल आए तो तो नानाजी दादाजी के भाई का नाम लोगों से पुछते-पुछते चलें आए। और लोगों ने भी नानाजी को दादाजी के भाई के घर का पता बता दिया। और नानाजी फाइनली दादाजी के भाई के घर पहुंच गए। राम-रामी करते हुए नानाजी को दादाजी के भाई ने घर में बुलाया और पंलग पर बिठाया। पानी पिलाया चाय नाश्ता करवाया तो नानाजी भी खुश हो गए। और घर के ठाठ-बाट देखकर नानाजी और भी ज्यादा खुश हो रहें थे। लेकिन फिर दादाजी ने कहा कि समधी जी अब अपने घर चलों। तो नानाजी सोच में पड़ गये और दादाजी से पुछने लगे कि तुम्हारा घर और अलग है। तो फिर यह घर किसका है। तो दादाजी ने कहा कि वह घर मेरे भाई का है। हमारा घर उधर है। फिर दादाजी नानाजी को अपने घर लेकर गए। और जब नानाजी ने दादाजी के घर को देखा तो। दादाजी के घर को देखकर नानाजी कि आत्मा कलप गई। और दिल पर बहुत बड़ा पत्थर रखकर चुपचाप बैठे रहे। जब तक मां नाना-नानी के घर जाने के लिए तैयार नहीं हो गई। फिर नानाजी मां को अपने साथ लेकर अपने घर के लिए निकल पड़े। मेरे नानाजी ने मेरे दादाजी का घर-बार घर कि स्थिति परिस्थिति देखकर अपने दिल पर पत्थर रखकर अपने घर के लिए चलते रहे। लेकिन जैसे ही घर पहुंचे तो नानी और घर के दुसरे लोगो ने नानाजी से मेरी मां के ससुराल वालों के बारे में पुछताछ करना शुरू कर दिया। कि बेटी का घर कितना बड़ा है। और घर में क्या-क्या सुख-सुविधाएं उपलब्ध है। और बेटी के परिवार में कितने लोगों है। बेटी कि सांस कैसी है। नानाजी ने मां के ससुराल में जो कुछ देखा था। उस परिस्थिति को देखकर नानाजी ने अपने दिल पर पत्थर रखा हुआ था। पर नानाजी नानी के सामने टुट गये। और नानी के सामने फफक-फफक कर रो पड़े। और कहने लगें कि हमने हमारी बेटी को डुबो दिया। उस घर में हमारी बेटी कि जिंदगी नरक से कम नहीं है। ना तो घर कि स्थिति अच्छी है ना खाने पीने पहनने ओढ़ने कि व्यवस्था है। सात भाई-बहन और सांस-ससुर है। और जब नानी ने नानाजी के मुंह से मां के ससुराल कि बातें सुनीं तो नानी ने भी अपना माथा पकड़ लिया। और रोने लगी। कि हमने क्या कर दिया बीना देखें भाले भाईयों कि बातों पर भरोसा करके लड़की को ऐसे घर में भेज दिया। विवाह कर दिया। लेकिन अब क्या कर सकते हैं। नानाजी सत्य और धर्म का पालन करते थे और दादाजी को अपनी जुबान दे चुके थे। अपनी जुबान से पलटते हैं तो अपने धर्म के पथ से बेईमानी कर बेठेगें। और धर्म से बेईमानी मतलब पुरी जिंदगी बदनामी होना था। लोगों को मुंह दिखा नहीं पाएंगे। और नानाजी कि बात का मान हर कोई रखता था। लेकिन अगर बेटी के दुःख को देखकर अपनी जुबान से पलट नहीं सकते थे। एक लंबी सांस भरते हुए परमात्मा को याद करते हुए कहा कि अब आप ही मेरी बेटी का सहारा है। मेरी मां कि विवाह के समय उम्र तेरह साल थी तो नाना-नानी ने मां को ससुराल भेजने से मना कर दिया और कुछ समय घर पर रखने कि बात दादाजी के सामने रख दी। तो दादाजी ने कहा कि ठीक है। जब लड़की कि सही उम्र हो जाए तब उसे ससुराल भेज दिजियेगा। नाना-नानी मां को केवल त्योहार महोत्सव पर ही ससुराल भेजते थे। और वापस घर बुलवा लेते थे। नाना-नानी ने अपने भाईयों को भी डांट फटकार लगाई कि तुम लोगों ने लड़के और लड़के के घर-बार को बीना देखें भाले हमारी लड़की कि शादी उस घर में करवा दीं। जहां ना तो रहने कि जगह है ना खाने कि ना पीने कि ना पहनने ओढ़ने कि व्यवस्था है। और घर में आठ-नौ लोग हैं। मेरी बेटी काम कर-करके मर जाएगी। तो मां के मामाओं ने नाना-नानी से माफी मांगते हुए कहा कि हमें भी क्या पता था कि लड़के कि स्थिति परिस्थिति इतनी खराब है। और यह लड़का वह लड़का नहीं है। जिसके बारे में हमने सुना था। लेकिन अब हम क्या ही कर सकते हैं। अब तो विवाह हो गया है। और जीजाजी अपनी जुबान दे चुके हैं। अपनी जुबान का मान तो रखना पड़ेगा। और अब नानाजी ने मेरी मां से माफी मांगते हुए मेरी मां के सामने अपनी पगड़ी उतारते हुए कहा कि बेटी मेरी बात का मान रख लेना। मेरी इज्जत रख लेना। अब मां नानाजी कि बातों का कोई जवाब नहीं दे सकी और चुपचाप उनकी बातें सुनतीं रहीं। लेकिन अब नाना-नानी मामा-मामी और मोसा-मोसी ने फेसला किया कि गलती हमने कि हे तो अब उसके घर को हम ही चलाएंगे। तो जब भी मेरी मां त्योहार महोत्सव पर अपने ससुराल जाती तो नाना-नानी मेरी मां को खाने-पीने पहनने-ओढ़ने के बहुत सारे उपहार देकर विदा करते थे। क्योंकि बड़ी बुआ कि ससुराल विदाई होने के बाद भी दादा-दादी के छः बच्चे थे। लेकिन दादा-दादी कि गरीबी भूखमरी ज्यों कि त्यों थीं। और मां त्योहार महोत्सव पर अपने ससुराल आतीं थी तो मां अपने ससुराल में एक दो दिन के लिए रुकतीं थीं। तो नाना-नानी मां को घर से बहुत सारे उपहार देकर विदा करते थे। ताकि मां और मां के ससुराल वालों को एक दो दिन के लिए अच्छा खाने पीने पहनने ओढ़ने के लिए मिल जाए और मेरे दादा-दादी मेरी मां से खुश रहें। फिर एक दो दिन रहने के बाद मां वापस अपने घर चली जाती थी। मेरी मां ने कभी धुप में काम नहीं किया था तों मेरी मां बहुत सुंदर थी। तो ससुराल में रहने वाली महिलाएं मेरी मां को भड़काती थी कि तुम इतनी सुन्दर हो अच्छे घर से हों। और तुम्हारा पति गरीब कमजोर और तुम्हारे जितना सुन्दर भी नहीं है। तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हारे बारे में कुछ भी नहीं सोचा और तुम्हारा विवाह ऐसे घर में कर दिया या फिर इन लोगों ने तेरे माता-पिता के ऊपर कोई तंत्र मंत्र टोने टोटके करके तेरे माता-पिता को अपने वश में कर लिया होगा। और वश में आने के बाद तेरे माता-पिता ने तेरा विवाह इस घर में कर दिया है। वरना तेरे ससुराल वाले इतने गरीब कमजोर है। और तेरी सांस भी बहुत खराब है। गुस्से वाली है। उनके बच्चों से विवाह करने के लिए कोई भी तैयार नहीं होता था। लेकिन तेरे माता-पिता कैसे तैयार हो गए। जरुर तेरी सांस-ससुर ने तेरे माता-पिता के ऊपर कोई तंत्र मंत्र टोने टोटके करवाकर तेरे माता-पिता को वश में कर लिया होगा। और तेरे माता-पिता तंत्र मंत्र के वश में आकर उन्होंने तेरी शादी कर दी है। लेकिन मेरी मां ने मोहल्ले कि बातों को नजरंदाज करते हुए। ससुराल में एक दो दिन रहने के बाद वापस अपने घर चली जाती थी। लेकिन अब मां कि उम्र भी ससुराल में रहने के लायक हो चुकी थी। तो अब दादाजी ने नानाजी के पास संदेश भिजवाया कि समधी जी अब अपनी लड़की को ससुराल में विदाई करवा दिजिए। तो नाना-नानी ने भी मेरी मां का भाग्य समझकर मां को ससुराल भेजने में अपनी भलाई समझी। और दादाजी के साथ मां को ससुराल भेज दिया। लेकिन अब चूंकि मेरी मां को रसोईघर का काम आता नहीं था। और मां ने सोलह साल तक कि उम्र तक कभी ग़रीबी भुखमरी देखीं नहीं थी। लेकिन अब तो मां को देखना ही था। क्योंकि मेरी मां अब अपने ससुराल में थीं। और ससुराल वालों कि परिस्थितियां नाना-नानी कि परिस्थितियों से भिन्न थीं। जिसकी आदत मेरी मां को नहीं थी। लेकिन अब तो इन्हीं परिस्थितियों को अपनाना पड़ेगा। इन परिस्थितियों से भाग भी नहीं सकतीं थीं। अगर भाग कर जाती तो ऊधर लोग नानाजी कि पगड़ी उछालते। झुटा धोखेबाज बोलकर इज्जत उछालते। इसलिए मां ने अपनी कमर कस ली।साथ ही नाना-नानी मामा-मामी मोसा-मोसी ने हिम्मत देते हुए कहा कि हम तेरे घर को चलाएंगे। लेकिन मेरी मां अपने पिता कि तरह ही बहुत खुद्दार थीं। मां को रसोईघर का काम आता नहीं था। और दादी मां से कोई काम करने के लिए कहते तो मां से वह काम होता नहीं था। हो भी जाएं लेकिन मां कि उम्र सत्रह-अठारह साल ही थी। शरीर इतना मजबूत नहीं था। कि आठ-नौ लोगों का आनाज घट्टी में फुर्ती से पिस ले। मेरी मां ने नाना-नानी के घर कभी ऐसा काम किया ही नहीं था। लेकिन दादी मां से काम करवाती थी। और फुर्ती से करने के लिए कहती थी। लेकिन मां से तो हो ही नहीं। और घट्टी घुमाते-घुमाते निंद आने लगें। तो दादी जोर से डांट फटकार लगाती थीं। और गालियां देने लग जाती थीं। मेरी मां सीधी-सादी भोली-भाली मासुम डरपोक कमजोर थीं। तो मां दादी कि आवाज से डर जाती थी। और रोने लग जाती थी। तो मेरे दादाजी और पिता मेरी मां का पक्ष लेने लगते तो दादी दादाजी और पिता जी को भी डांट-फटकार लगा दिया करतीं थी। और जब दादी पिताजी और दादाजी को डांट फटकार लगातीं थी। तो उनका बोलना लोगों को दिख जाता था। जिससे लोग दादी को बहुत खराब और गुस्से वाली समझते थे। लेकिन अगर दादी फुर्ती से काम ना करें। तो सबको भुखा ही सोना पड़े। और मेरी मां दादाजी पिताजी बहुत ठंडे लहज़े में काम करते थे। इसलिए दादी को बहुत गुस्सा आता था। और बहु लेकर आएं वह भी बहुत धीमी गति से काम करें। तो दादी को और भी ज्यादा गुस्सा आये। फिर दादी मेरी मां से काम छींनकर खुद ही करतीं थीं। बस ऐसे ही दिन कटते गए। मेरी मां से काम नहीं हो तो दादी सुबह शाम मां को डांट फटकार लगातीं। और अगर दादाजी और पिताजी मां का सहयोग करने जाते तो दादी उनको भी कुछ ना कुछ सुना दिया करतीं थीं। मेरी मां मेरे नाना-नानी से मेरी दादी कि शिकायत करतीं तों नानाजी दादी को बोलते कि समधन जी मेरी बेटी ने कभी घर का काम किया नहीं है। धीरे-धीरे सीख जाएंगी। तो मेरी दादी मेरे नानाजी को भी फटकार लगा दिया करतीं थीं। कि बेटी कि इतनी ही फिकर है तो बेटी को बहुत सारे उपहार देकर ससुराल भेजते। तो तुम्हारी बेटी को ऐसे काम नहीं करने पड़ते। या फिर अपनी बेटी को किसी लखपति करोड़पति के घर ब्याह देते। तो तुम्हारी बेटी सोने के पलंग पर बैठी रहती। नानाजी दादी कि बातों का कोई जवाब नहीं देते और मेरी मां को उसी परिस्थिति में छोड़कर अपने घर वापस लौट जाते। और अपने घर जाने के बाद अपने लिए हुए फेसले पर पछताते रहते। इधर मेरे पिताजी से छोटे भाई-बहन भी धीरे-धीरे बड़े होते जा रहे थे। और उनकी भी उम्र विवाह लायक हो रही थी। तो दादा-दादी ने मेरे पिता से छोटे दो भाई और एक बहन का विवाह कर दिया। तो घर में दो बहुएं और आ गई। लेकिन दोनों बहुओं के माता-पिता कि आर्थिक स्थिति कमजोर थीं। लेकिन अब घर में तीन बहुएं हों गई थी। तो घर में काम बट गया था। लेकिन मेरी मां अच्छे घर से थीं। तो मेरे नाना-नानी मेरी मां को अपने घर से अच्छा खाने पीने पहनने ओढ़ने के लिए कुछ ना कुछ भीजवाते रहते थे। तो मेरी मां उन चीजों को ससुराल में सबको बांट दिया करतीं थीं। जिससे दादी और मेरे चाचा खुश होते थे। और मेरी मां कि तारीफ भी करते थे। लेकिन मेरी मां भी मेरे नाना-नानी कि तरह ही ईमानदार थीं। मेरी दादी और मोहल्ले के लोगों को अपनी भुख शांत करने के लिए खाने-पीने कि चीजों कि किसानों के खेतों में चोरी करनी पड़ती थी। लेकिन मेरी मां को मेरे नाना-नानी चोरी करने से मना करते थे। और सारी चीज़ें भीजवा दिया करते थे। और मेरी मां भी नाना-नानी का नाम खराब ना हो इसके लिए कभी चोरी चकारी नहीं करतीं थीं। क्योंकि मां को नाना-नानी ने बोल दिया था कि तुझे जिस किसी भी चीज कि जरुरत हो यहां से ले जाना लेकिन कभी मेरे नाम को बदनाम मत करना। और मेरी मां भी नानाजी कि बात मानकर ऐसा काम नहीं करतीं थीं। तो मेरी दादी मेरी मां को चोरी करने के लिए नहीं बोलतीं थी। लेकिन दो चाचीयां जो घर में अभी-अभी आई थी। उनके माता-पिता कि आर्थिक स्थिति खराब थी। तो उन्हें दादी कि बातें माननी पड़ती थी। और अगर वै मना करती तो दादी मेरी मां का उदाहरण देती थी। कि वह ऐसा काम नहीं करेंगी। क्योंकि उसके माता-पिता उसको खाने-पीने कि पोटली बांधकर दें देंगे। और अगर तुम दोनों को ऐसा काम नहीं करना है तो तुम दोनों भी अपने माता-पिता के घर से खाने पीने कि पोटली बांधकर लाया करों। मेरी एक बहन का जन्म हो गया था। जिसका नाम जीवन रखा गया था। तो मेरी दादी दोनों चाचीयों को बोल दिया करतीं थीं कि जीवन कि मां अपने माता-पिता के घर से अपने पति बच्चों सांस-ससुर देवरों के लिए कितना कुछ लेकर आतीं है। तुम भी अपने पति और सांस ससुर के लिए कुछ लेकर आया करों। लेकिन दोनों चाचीयों के माता-पिता कि आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी तो दोनों चाचीयों को दादी और अपने पतियों कि बातें और डांट-फटकार सुननी पड़ती थी। और दोनों चाचीयों को दादी और चाचाओं कि डांट-फटकार मेरी मां कि वजह से सुननी पड़ती थी। लेकिन अब इसमें मेरी मां कि क्या गलती थीं। उनको मेरे नाना ने कह दिया था कि बेटी तुझे जो कुछ भी चाहिए वह यहां से ले जाना लेकिन चौरी चकारी करके मेरा नाम मत खराब करना। इसलिए मां घर पर ही रहती थी। और घर के काम भी बहुत कम करतीं थीं। क्योंकि मेरी नानी मामी और मोसीयों को मेरी मां के ससुराल के बारे में सबकुछ पता था। कि मेरी बेटी हमारी ननद हमारी बहन ग़रीब परिवार में ब्याही गई है। तो नानी मामीयां और मोसीयां मेरी मां पिताजी और मेरी बहन के हफ्तेभर कि खाने पीने पहनने ओढ़ने कि सारी चीजों को भीजवा दिया करते थे। अब दादी और चाचा मेरी मां को पिताजी को बहन को अच्छा खाते पीते पहनते ओढ़ते देखते तो दादी और चाचा दोनों चाचीयों को भला बुरा सुनाने लग जाते थे। लेकिन दोनों चाचीयों के माता-पिता कि आर्थिक स्थिति अच्छी ना होने के कारण दादी और अपने पतियों कि बातें सुननी पड़ती थी। और दादी और अपने पतियों कि नजरों में अच्छा बनने के चक्कर में उन्हें किसानों के खेतों में खाने पीने कि चीजों कि चौरी चकारी करनी पड़ती थी। लेकिन दोनों चाचीयां दादी और अपने पतियों कि रोज़-रोज कि डांट-फटकार अपने माता-पिता कि बुराई भलाई तानों से तंग आ चुकी थी। लेकिन अपने और अपने माता-पिता के हालातों के आगे मजबूर थीं। इसलिए सबकुछ चुपचाप सहन कर लिया करतीं थीं। मेरे पिताजी से चौथे नंबर के चाचा और सबसे आखिरी वाले चाचा दोनों पढ़ाई लिखाई करते थे। तो चौथे और छठे नंबर वाले दोनों चाचाओं ने विवाह करने से मना कर दिया। तो दादा-दादी ने फिर पांचवें नंबर के चाचा का विवाह कर दिया। फिर घर में चार बहुएं हो गई। जो नई बहू आई थी। उसके माता-पिता कि आर्थिक स्थिति भी मेरे नाना नानी कि तरह ही अच्छी थी। खेती-बाड़ी वाले लोग थे। लेकिन मेरी चाची बहुत हेल्दी थी। और मेरे चाचा बहुत दुबले पतले थे। तो चाची के माता-पिता ने चाची कि सगाई करने के बाद बहुत दिनों तक बात को घुमाते रहे। लेकिन फिर चाचा से विवाह कर दिया। लेकिन अब जब चाची दादी के घर में आई तो चाची को पता चला कि इस घर में बहुत काम करना पड़ेगा। और घर में मेरी मां कि बातें सभी लोग मानते हैं। तो चाची बहुत चालाक थी। और अपने घर पर उन्होंने भी कभी काम नहीं किया था। और साथ ही उनके माता-पिता कि आर्थिक स्थिति भी अच्छी थी। तो उन्होंने अपने पति को सीखाना पढ़ाना और नखरे दिखाना शुरू कर दिया। कि में इतने लोगो का काम नहीं करुंगी। अभी तो मैं इतने लोगो के साथ नहीं रहुंगी। अलग से मकान बनाओं में तो उसी में रहुंगी। नहीं तो मैं अपने घर जा रही हुं। दादी और दुसरे भाई चाची कि धमकियों से डर गये। कि यह सच में ना चाचा को छोड़कर चलीं जाएं। और अगर यह चलीं गईं तो हमारा भाई हमारी मां और भाइयों को गालियां देने लग जाएगा। कि तुम लोगों कि वज़ह से मेरी पत्नी मुझे छोड़कर चलीं गईं। तो सब लोगों ने फैसला किया कि अगर चाची को इस घर में रहने से परेशानी हो रही है तो चाचा चाची को दादाजी के भईया-भाभी के घर रहने भेज देते हैं। तो दादा-दादी ने दोनों को दादाजी के भाई के घर रहने भेज दिया। लेकिन चाचा -चाची दोनों ही बहुत खर्चीले थे। साथ ही घर में नुकसान भी करें। और दादाजी के भाई-भाभी का भी काम नहीं करें मान नहीं रखें। तो दादाजी के भईया-भाभी ने दोनों को अपने घर से निकाल दिया। अब घर से निकाल दिया तो फिर दोनों फिर से दादा-दादी के पास ही वापस आएं। और तीन भाईयों के हिस्से में अपना हिस्सा मांगने लगे। लेकिन तीनों भाइयों ने मना कर दिया कि हम तुम्हें हिस्सा क्युं दे। लेकिन चाचा-चाची दोनों ने तीनों भईयां-भाभीयों को गंदी-गंदी गालियां देना शुरू कर दिया। मेरी मां और दुसरे दोनों चाचा-चाची ने इन दोनों पति-पत्नी कि गंदी-गंदी गालियां सुनकर हिस्सा छोड़ दिया। क्योंकि मेरी चाची बहुत चालाक थी। उसे पता था कि मेरी तीनों जेठानियां सीधी-सादी भोली-भाली और डरपोक है। अगर हम दोनों पति-पत्नी तीनों जेठानियां को गंदी गंदी गालियां देंगे। या मारधाड़ भी कर देंगे। या इन्हें लड़ाई झगड़े का डर भी दिखा देंगे तो यह तीनों आसानी से डर जाएंगी। और हमें जमीन का हिस्सा दे देंगी। क्योंकि तीनों लड़ाई झगड़ों से डरती है। और हम दोनों इस बात का फायदा उठा सकते हैं। साथ ही मेरी चाची ने देखा कि घर में मेरी मां कि तारीफ ज्यादा होती है। और घर में बड़प्पन उन्हीं को मिला हुआ है। मतलब मेरी मां का मान दादी से ज्यादा था। क्योंकि मेरी मां ने अपने ससुराल को ससुराल नहीं अपना घर मानकर सबके लिए अपने घर से कुछ ना कुछ लाया करतीं थीं। और सभी भाई-बहनों में बांट दिया करतीं थीं। और जब मेरी मां ऐसा करतीं थीं। तो मेरे दादा-दादी और सभी भाई-बहन मेरी मां का मान सम्मान करते थे। साथ ही सभी भाई-बहन और दादी भी मां कि राय के बीना कोई काम नहीं करतीं थीं। लेकिन अब घर में दुसरी बहुएं भी आ गई थी। और दुसरी बहुएं भी चाहतीं थीं कि घर में जो मान सम्मान इज्जत कदर मेरी मां का हैं। वह मान सम्मान इज्जत कदर उन्हें भी मिलना चाहिए। लेकिन मेरी मां अपने ससुराल को और ससुराल में रहने वालों को अपना समझकर उनके लिए अपने माता-पिता के घर से कुछ ना कुछ लाया करतीं थीं। लेकिन ऐसा दुसरी बहुएं नहीं करतीं थीं। लेकिन फिर भी उन्हें घर में मेरी मां कि तरह ही मान सम्मान इज्जत कदर चाहिए थी। लेकिन यह तो नामुमकिन था। कि ससुराल में बीना सहयोग किए घर में सबसे मान सम्मान इज्जत कदर मिल जाए। तो जो पांचवें नंबर कि चाची थी। वह बहुत होशियार और चंट चालाक थी। साथ ही तंत्र मंत्र टोने टोटके करने में विश्वास रखतीं थी। तो पांचवें नंबर कि चाची ने एक प्लान बनाया और दोनों चाचीयों को अपने खेल में शामिल किया। और कहा कि अगर हम तीनों अपनी सांस और पतियों को हमारी जेठानी के बारे में झुटी बातें बोल दें कि तुम्हारी बड़ी बहु बड़ी भाभी अपने घर से जो खाने पीने कि वस्तुएं लातीं है। उसमें तंत्र मंत्र टोने टोटके करवाकर लातीं है। और फिर तुम लोगों को खिलाती है। जिससे तुम सब उसके वश में हो गये हों। इसलिए तुम सब उसकी ही बातें मानते हों और उसी को घर कि और दुसरो कि जिंदगी का फेसला लेने का अधिकार दें दिया है। और वह ऐसा इसलिए करतीं हैं ताकि तुम सब उसकी मुट्ठी में कैद रहो। और वह तुम पर अपना हुकुम चला सकें। दोनों चाचीयों ने पांचवें नंबर वाली चाची को कहा कि तुम्हारी बात तो सही है। क्योंकि इस जेठानी कि वजह से हमने हमारे पतियों और सांस कि बहुत गालियां खाई है। बहुत डांट-फटकार सुनीं है। लेकिन हमारे पति और सांस हमारी बात पर विश्वास करेंगे। तो चाची ने कहा कि बिलकुल करेंगे। क्योंकि अब हम अपने पतियों और सांस पर तंत्र मंत्र टोने टोटके करवाकर अपने वश में कर लेंगे जिससे वे हमारे वश में आ जाएंगे और हमारी बातों पर विश्वास कर लेंगे। और फिर जेठानी का खेल खत्म फिर घर में सब लोग हमारी बातें मानेंगे हमारी इज्जत कदर मान सम्मान करेंगे। और हमारी जेठानी को हमारे पति सांस और मोहल्ले वाले शक भरी नजरों से देखेंगे। उस पर नजर रखेंगे। और उससे दुरी बनाएंगे। उसे कहीं पर भी नहीं बुलाएंगे। और फिर सब जगह हमें ही बुलाएंगे हमारी ही इज्जत कदर मान सम्मान होगा। लेकिन अब इन तीनों चाचीयों के प्लान को ऊपर से भगवान देख रहे थे। कि यह तीनों मेरी मां को बदनाम करने के लिए मेरी मां कि ईमानदारी पर दाग़ लगाने के लिए करता षड़यंत्र रच रही थी। भगवान ने कहा कि ठीक है षड़यंत्र रच लो। परिणाम तो मैं ही बनाउंगा।

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