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Twinflam and soulmates ep 10

जब मोहल्ले वाले मेरी तैराकी कि तारीफें कर रहे थे तब मेरे चाचा-चाची भी खड़े रहकर सुन रहें थे। तो अब चाचा के लड़कों के लिए एक नया टास्क करने के लिए सामने आ गया। और चाचा के लड़के सोचने लगे कि दीपक मर क्युं नहीं जाता है। इसकी वजह से घरवाले हमें परेशान करने लग जाते हैं। लेकिन मेरी मां मुझे लेकर बहुत डरती थी। कि यह सीधा-साधा भोला-भाला है। इसको लोग जैसा करने के लिए बोलते हैं। यह वैसा करने लग जाता है। यह ना तो कुछ सोचता है। और ना कुछ समझता है कि उस काम को करने का परिणाम क्या बनेगा। बस करना है तो करना है। अगर इसको कुछ हो गया तों में क्या करुंगी। खैर अब मैं और मेरे चाचा चाची के लड़के हम सब आठवीं कक्षा पास करके नोवीं कक्षा में चले गए थें। तो अब हमारे माता-पिता ने हम सभी बच्चों का एडमिशन गांव से दस किलोमीटर दूर शहर कि स्कूल में करवा दिया था। क्योंकि गांव में सिर्फ आठवीं कक्षा तक ही स्कूल थीं। फिर नोवीं कक्षा के लिए गांव से शहर जाना था। इसलिए हमारे माता-पिता ने हम सबका एडमिशन शहर के ही छात्रावास में करवा दिया था। क्योंकि स्कूल सुबह सात बजे से शुरू होती थीं। और सुबह सात बजे तक स्कूल पहुंचने के लिए हम सबको सुबह पांच बजे उठना पड़ता इसलिए सभी बच्चों के माता-पिता ने हम सबको छात्रावास में भर्ती करवा दिया था। ताकि रोज रोज सुबह से उठना ना पड़ें। लेकिन में और मेरे चाचा-चाची के बच्चे हम पहले कभी भी गांव से बाहर नहीं निकले थें। लेकिन स्कूल के लिए हम सबको गांव से बाहर निकलना पड़ा। चाचा चाची के बच्चे आठवीं कक्षा के बाद आगे कि पढ़ाई करना नहीं चाहते थे। लेकिन मेरी वजह से चाचा-चाची ने उनका भी नोवीं में एडमिशन करवा दिया चाचा चाची के बच्चों को मुझपर बहुत गुस्सा आता था। क्योंकि वै आगे पढ़ना नहीं चाहते थे। लेकिन मेरे माता-पिता मुझे आगे पढ़ाना लिखाना चाहते थे। और अगर में पढ़ाई करुंगा तो चाचा चाची के बच्चों को भी पढ़ाई लिखाई करना पड़ेगी। लेकिन फिर चाचा चाची के बच्चों ने एक तरीका निकाला कि हम भी पढ़ाई नहीं करेंगे और दीपक को भी पढ़ाई नहीं करने देंगे। जब दीपक फेल हो जायेगा। तो फिर उसके माता-पिता उसे पढ़ाना लिखाना बंद करवा देंगे। फिर हम जैसा करेंगे वैसा ही काम दीपक भी करेगा। मेरे माता-पिता और चाचा-चाचीयों कि लड़ाई-झगड़े थें। वै आपस में बातचीत नहीं करतें थे। क्योंकि मेरे माता-पिता ईमानदार थे। ईमानदारी से अपना काम करतें थे। लेकिन मेरे चाचा-चाची बेईमानी से चालाकियों से और छल कपट से काम करते थे। तो मेरे चाचा-चाची चाहते थे कि मेरे माता-पिता भी काम करते वक्त बेईमानी और चालाकी से काम करें। लेकिन मेरे माता-पिता ईमानदारी से काम करते थे। और नम्रता पुर्वक व्यवहार करते थे। अपने से उम्र में बड़े को भी आप ही कहकर संबोधित करते थे। और अपने से उम्र में छोटे व्यक्तियों को भी आप कहकर ही सम्बोधित करते थे। जब मेरे माता-पिता का ऐसा व्यवहार रहता था। तो गांव के किसान मेरे माता-पिता को ही काम करने के लिए बोलते थें। लेकिन मेरे चाचा-चाची का व्यवहार इस तरह का नहीं था। ना तो वै लोग नम्रता से रहते थे। ना ही किसी को इज्जत मान सम्मान देते थें। और ना ही ईमानदारी से काम करते थे। तों गांव के किसान फिर उन्हें अपने किसी भी कार्य को करवाने के लिए बोलते नहीं थें। और अब चाचा -चाची के ऐसे व्यवहार से कोई भी किसान उन्हें काम का नहीं बोलते थे। तों उनका नुकसान होता था। और मेरे माता-पिता के अच्छे व्यवहार कि वजह से गांव का हर किसान उन्हें काम के लिए बोलता था। और माता-पिता को ही बोलते थे। मोहल्ले में किसी को भी नहीं बोलते थे। जिससे मेरे माता-पिता के पास ज्यादा अबंडस थीं। तरक्की हो रही थी। और अब अगर हमारे बीच रहने वाले व्यक्ति कि तरक्की हो रही हो और दुसरे लोगो को कोई पुछता तक नहीं है तो फिर दुसरो को हमारी तरक्की और समृद्धि देखकर जलन होती है। मेरे माता-पिता किसानों के घर काम करके अपना 100% दे रहे थे। इस वजह से गांव के किसान मेरे माता-पिता को ही काम के लिए बोलते थे। लेकिन चाचा चाची और मोहल्ले के दुसरे लोग किसानों के घर काम करते वक्त मक्कारी छल कपट और बेईमानी करते थे। इससे किसानों को पता चल जाता था। और फिर वै मेरे माता-पिता के पास आते थें। लेकिन चाचा चाची और मोहल्ले के लोगों का कहना था कि जैसा काम हम करते हैं। वैसा ही काम तुम भी करों। जिससे किसी का भी नुकसान नहीं होगा। लेकिन मेरे माता-पिता का कहना था कि किसान आपको मजदूरी के पैसे देता है। तो फिर उसको पुरी ईमानदारी से काम करके दो। किसान तो पैसे देने में बेईमानी नहीं करता है। तो फिर तुम उसके साथ बेईमानी क्यु करते हों। तुम भी किसान को मजदूरी जितना काम करके क्युं नहीं देते हों। लेकिन चाचा चाची और मोहल्ले के लोग मक्कारी और बेईमानी करने में विश्वास करते थे। और मेरे माता-पिता से भी मक्कारी और बेईमानी से काम करने के लिए बोलते थे। लेकिन मेरे माता-पिता चाचा चाची और मोहल्ले वालों कि बातों को नजरंदाज करते हुए अपनी ईमानदारी से ही करते थे। और जब मेरे माता-पिता मेरे चाचा-चाची और मोहल्ले वालों कि बातें नहीं सुनते थें तो मेरे चाचा-चाची मोहल्ले में अपने चमचों को शराब पीलाकर या पैसों का लालच देकर मेरे माता-पिता कि गांव में किसानों के बीच झुटी अफवाह फेलाने के लिए बोलते थे। और शराब के लालची पैसों के लालची लोगों को क्या लेना देना रहता था। कि उनके झुट फेलाने से कोई बदनाम हों जायेगा। उन्हें इन सबसे कुछ लेना-देना नहीं होता था। उन्हें तो बस शराब पीने के पैसे दे दो और उन्हें बता दों कि गांव मोहल्ले में किसके बारे में क्या अफवाह उड़ानी हैं। और मोहल्ले के शराबी और पैसों के लालची लोग किसानों के घर जाकर उन्हें मेरे माता-पिता कि झुटी बातें बताकर भड़काते थें। कि मेरी मां के पास तो तंत्र मंत्र टोने-टोटके हें। और उसने तों तुम लोगों पर तंत्र मंत्र टोने-टोटके करके तुम लोगों को अपने वश में कर लिया है। और अब वह तुम लोगों को लुट लुटकर खा रहीं हैं। तो सालों सम्भल जाओ नहीं तो वह ओरत तुम्हें पुरा लुटकर खा जायेगी। लेकिन जिन किसानों को मेरे माता-पिता कि ईमानदारी के बारे में पता था। वै लोग भड़काने वाले को उसी समय मुंह पर बोल देते थें कि हमें मत सिखाओ कि कोन ईमानदार है और कोन बेईमान है और कोन लुटेरा है। ऐसे ही खेती नहीं कर रहे हैं हम लोग बेईमान वै लोग हैं कि तुम लोग हों। क्या समझ रहे हो कि तुम हमे उन लोगों कि झुटी बातें बताओगे तो हम तुम्हारी बातों पर भरोसा कर लेंगे। जाओ घर जाओ और किसी और को बेवकूफ बनाना। और भड़काना हम लोगों को तो दोनों पति-पत्नी और उनके बच्चों पर भरोसा है। और जब किसान लोग चाचा-चाची के भेजे हुए चमचों कि झुटी बातों में फंसते नहीं थें तो फिर चाचा-चाची अपने चमचों को किसानों कि पत्नी बच्चों को भड़कानें के लिए बोलते थे। कि अब तुम किसानों के पत्नी बच्चों को मेरे जेठ जेठानी के बारे में झुटी बातें बताकर भड़काओ और चाचा चाची के चमचे फिर किसानों के पत्नी बच्चों को मेरे माता-पिता के खिलाफ भड़काते थें। तो जिन किसानों कि पत्नीयों ने मेरे माता-पिता कि ईमानदारी को देखा था। वै महिलाएं और उनके बच्चे भी चाचा चाची के चमचों कि बातों को नजरंदाज कर देते थे। तों चाचा-चाची और उनके चमचे परेशान हो गए थे। कि दीपक के माता-पिता कि ईमानदारी इतनी प्रबल है कि उनकी ईमानदारी पर कोई भी सवाल नहीं करता है। फिर चाचा चाची और उनके चमचों ने किसानों कि पत्नीयों और बच्चों के देखने सोचने के नजरिए को बदलना जरूरी समझा। और किसानों कि पत्नी बच्चों को बताया कि मेरी मां ने उनके पतियों पर तंत्र मंत्र टोने-टोटके करके अपने वश में कर लिया है। तभी तो तुम्हारे पति सिर्फ उस औरत को ही काम करने के लिए बुलाते हैं। मोहल्ले कि दुसरी महिलाओं को तो नहीं बुलाते हैं। क्योंकि उस औरत ने तुम्हारे पतियों पर तंत्र मंत्र टोने-टोटके करके उनको अपने वश में कर लिया है। और तुम्हारे पतियों को लुट लुटकर खा रहीं हैं। तों तुम्हारे पति तो उस महिला के वश में है। और वै तो कुछ कर नहीं सकते हैं। पर तुम लोगों पर तो तंत्र मंत्र टोने-टोटके नहीं हुए हैं। तो तुम लोग तों समझदारी दिखाओ और उस औरत को अपने खेत से बाहर निकालों अपनी जिंदगी से बाहर निकालों नहीं तो वह औरत तुम लोगों को पुरा लुटकर खा जायेगी। और ऐसी बातें सुनकर किसानों कि पत्नी बच्चे चाचा चाची के चमचों कि बातों पर विश्वास कर लेते और मेरे माता-पिता को किसानों के पत्नी बच्चे अपने घर काम पर लाना बंद करने लगे। और चाचा चाची और उनके चमचों को काम पर ले जाने लगें। और अब मेरे चाचा-चाची और उनके चमचे तो काम में मक्कारी बैईमानी और छल कपट करने कि आदत थीं। तो खेत में काम भी वैसा ही करके आयेंगे। और काम बेईमानी से करके आयेंगे तो नुकसान किसका होगा किसान का किसान कि पत्नी बच्चों का क्योंकि किसान कि पत्नी बच्चों ने मेरे चाचा चाची के चमचों के द्वारा फेलाए झुट पर विश्वास करके ईमानदार पति-पत्नी पर इल्ज़ाम लगाया और उन्हें गांव मोहल्ले में बदनाम भी किया। तो फिर इस बात को भगवान कतई बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। कि लोग उसके सच्चे भक्त कि ईमानदारी पर शक करके उसे लोगों में बदनाम कर रहे हैं। उसे दुःख लकलीफ दें रहें हैं। उसे परेशान कर रहे हैं। क्योंकि ईमानदार व्यक्ति जब परेशान होता है तो वह सीधा भगवान कि शरण में जाता है। और अगर भगवान उसकी पुकार नहीं सुनते हैं तो फिर वह भगवान को भी दोष देने लगता है। कि क्या मतलब निकला खुब भी ईमानदारी से काम करते हैं। खुब भी सच्चाई के रास्ते पर चलने से हमको मिला क्या दुःख लकलीफ और बदनामी। इससे अच्छा होता कि जैसे सब बेईमानी और चालाकी करके रह रहे हैं। वैसे ही हम भी रहते। ईमानदार होते हुए भी लोग तो हमें बेईमान ही बोल रहे हैं। तो फिर हम ईमानदारी दिखाकर क्युं परेशान हों दुःख लकलीफ उठाएं। ईमानदार होते हुए भी लोग हमें बदनाम कर रहे हैं। और भगवान ने क्या किया कुछ भी नहीं जब लोग हमारी बदनामी कर रहे थे हमारी हंसी उड़ा रहे थे हमारा मज़ाक़ बना रहे थे। तों भगवान ने किसी भी व्यक्ति को रोका नहीं इसका मतलब यह है कि भगवान है ही नहीं सिर्फ पत्थर कि मुर्तीया है। जिनको हम भगवान समझ कर पुजते रहते हैं। जब ईमानदार व्यक्ति कि झुटी बातें बताकर उसे लोगों मे बदनाम करते हैं तो ईमानदार व्यक्ति को बहुत गुस्सा आता है। और वह गुस्से में आकर बदनाम करने वालों से लड़ाई-झगड़े करता/करतीं हैं। क्योंकि वह अपनी झुटी बातें सुन नहीं सकता है। और मेरे चाचा-चाची अपने चमचों को शराब का पैसों का लालच देकर माता-पिता कि झुटी बातें फेलाने के लिए बोलते थे। और माता-पिता जब लोगों से लड़ाई-झगड़े करने जाते थे। तो लोग मेरे माता-पिता को बेवकूफ बनाकर सीधे निकल जाते थे कि हमने तो तुम्हारी बातें लोगों से सुनी लोग तुम्हारे बारे में बोल रहे थे। तो हमने भी सुनकर बोलना शुरू कर दिया। और मेरी मां थीं सीधी साधी भोली-भाली और वै अपनी झुटी बातें किसी से सुनती थी तो उन्हें बहुत गुस्सा आता था। और गुस्से में वह अपनी जुबान का संतुलन बिगाड़ लेती थी। और लोगों को बातें सुनाने लग जातीं थीं। और लोग सिर्फ उन्हें बच्चा समझकर उनकी गालियां सुनते रहते थे। फिर मेरे चाचा-चाची आकर लड़ाई-झगड़े खतम करवा देते थे। मतलब लड़ाई-झगड़े करवाने वाले भी चाचा चाची ही थें। और लड़ाई-झगड़े खतम करने भी वही आतें थें। और लोगों में हमारे रिश्तेदारों में वाहवाही भी बटोरते थें कि हमारे लड़ाई-झगड़े हमारे चाचा-चाचीयों ने खतम करवाएं। मेरी चाचीयां चाहती थीं कि मोहल्ले के लोग और मेरे माता-पिता मेरी चाचीयों के कहें अनुसार चलें। लेकिन मेरी मां चाचीयों के कहें अनुसार चलतें नहीं थें। तो मेरी चाचीयां गुस्से में आकर फिर अपने चमचों को शराब का और पैसों का लालच देकर मेरे माता-पिता कि झुटी अफवाह उड़वा देते थें। और फिर आखिर में मेरे माता-पिता को पता चल जाता था कि उनकी झुटी अफवाहें मेरी चाचीयों ने ही उड़वाई है। जिससे माता-पिता गुस्सा होकर फिर चाचा चाची से बातचीत बंद कर देते थे। और अभी मेरे चाचा-चाची ने मेरे माता-पिता को मेरी दादी कि अंतिम यात्रा में शामिल होने से रोक दिया। और इस बात के लिए मेरे चाचा-चाची ने उनके चमचों को शराब पीलाकर पैसों का लालच देकर मेरे माता-पिता कि झुटी बातें मोहल्ले में फेलाकर पुरे गांव वालों को अपने पक्ष में कर लिया था। जिससे गांव वालों ने फेसला लिया कि मेरे माता-पिता को दादी कि अंतिम संस्कार से दुर रखा जाएं। तो इस बात के लिए मेरी मां ने मेरे चाचा चाचीयों से लड़ाई-झगड़े किए क्योंकि मेरे माता-पिता छः भाई-बहनों में सबसे बड़े थें। तो मेरी मां को इस बात का गुस्सा आया कि मेरे पिता को उनके छोटे भाई और उनकी पत्नीयां दादी कि अंतिम संस्कार से वंचित रख रहे हैं। तो मेरी मां ने इस तरह के व्यवहार के लिए मेरे चाचा-चाची का विरोध किया। लेकिन मेरे चाचा-चाची के पास हराम कि और बेईमानी कि कमाई बहुत थीं। तों वै उस बेईमानी कि कमाई का फायदा उठाते थें। उस कमाई से वै मोहल्ले वालों को खरीद कर मेरे माता-पिता कि झुटी बातें फेलाने या माता-पिता को भला बुरा बोलने गांव मोहल्ले वालों के सामने जलील करने बदनाम करने में इस्तेमाल कर लेते थे। और मेरे माता-पिता अकेले रह जातें थें। क्योंकि लोगों को मोहल्ले वालों को पैसों कि जरुरत रहती थी। तों चाचा चाची मोहल्ले वालों को पैसे देकर अपना गुलाम बना लेते थे। और फिर अपने खिलाफ खड़े होने वाले के लिए उनकी ताक़त और उनके दिमाग का इस्तेमाल करते थे। और छल में बल जरुर होता है। लेकिन सत्य के सामने वह बहुत छोटा लगता है। बस सत्य को कुछ समय के लिए मोन रहना पड़ता है।

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