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पृथ्वी का रक्षक राजा भोरमदेव

“पृथ्वी का रक्षक - भोरमदेव “

(कहानी)

आज दुनिया भर के वैज्ञानिक बरसों से इस खोज में लगे हैं कि पृथ्वी के अलावा किसी अन्य ग्रह पर जीवन है या नहीं । अभी तक कोई भी इस बात को पूर्ण तौर पर सिद्ध नहीं कर पाया है । संभावनाएँ जताई जा रही हैं कि जल्दी ही मानव इस बात की पुष्टि कर पाएगा कि कौन से ग्रह पर पृथ्वी जैसा जीवन है या अगर जीवन है तो पृथ्वी से कैसे भिन्न है । 

हमारे ऋषियों मुनियों ने अपनी योग शक्ति से पूरे ब्रह्मांड को जान लिया था । लेकिन वैज्ञानिक आज तक ब्रह्मांड के एक छोटे से हिस्से को ही जान पाए हैं । जिस हिसाब से खोज चल रही है, अभी उनको सदियाँ लग जायेंगी इस रहस्य को सुलझाने में । 

यह कथा नौवीं शताब्दी में मनुष्य के द्वारा किये जाने वाले इस प्रकार के प्रयत्नों ने अनायास ही किसी ग्रह पर रह रहे कुछ जीवों का ध्यान पृथ्वी की तरफ खींच लिया । ‘तमस’ नाम के उस ग्रह पर ड्रैगन जाति का साम्राज्य था । ये जाति अंधकार से शक्ति प्राप्त करने और प्रकाश को अंधकार में परिवर्तित करने में सक्षम थी । इनके माथे पे लगी मणि प्रकाश को सोख कर अंधकार में परिवर्तित कर देती थी और प्रकाश के बिना सभी जीव अक्षम होकर दम तोड़ देते थे । एक के बाद एक ग्रह पर ये धीरे धीरे अपना अधिकार जमाते जा रहे थे । फिर एक दिन इनकी दृष्टि पृथ्वी नाम के ग्रह पर पड़ी । सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित, आध्यात्म और योग के तेज से सुशोभित ये ग्रह इतना कांतिमय था कि ‘तमस’ ग्रह के निवासी ड्रैगन जाति का मन इसे अंधकार में डुबोने के लिए मचल उठा । 

तब पृथ्वी पर आर्यावर्त के भारत भूखंड के दक्षिण पूर्व में  स्थित कुरु नगर राज्य में राजा प्रताप राय का शासन था । प्रताप राय न सिर्फ एक कुशल प्रशासक था बल्कि एक उच्च कोटि का वीर योद्धा भी था । उसके शासन में सभी लोग निर्भय पूर्वक अपना गुजर बसर कर रहे थे । राजा बहुत ही न्यायप्रिय और दयालु किस्म का इंसान था । अपनी प्रजा की रक्षा और भलाई के लिए वो दिल खोल कर काम किया करता था । 

उसके राज्य के राजगुरु भद्रदेव बैगा, जो आध्यात्म और प्रकृति के संतुलन को समझने के साथ साथ विज्ञान की भी बहुत जानकारी रखते थे । उनके नेतृत्व में कुछ लोगों का एक समूह हमेशा राज्य की भलाई हेतु निरंतर नए आविष्कार करता रहता था ताकि प्रजा को जीवन यापन में सुख सुविधाएँ मिलती रहें ।    

फिर एक दिन बिना बताए एक विपत्ति भारत के पर्वतीय क्षेत्र के भू भाग पर आ गिरी । आकाश से एक विशाल धूमकेतु पृथ्वी पर आ गिरा । जैसा कि प्रत्याशित था, इस धूमकेतु के गिरने से पूरी पृथ्वी कंपायमान हो गई । सभी राज्यों को काफी नुकसान उठाना पड़ा । फिर जैसा होता है कि कुछ दिन तक ये सदमा सहने के बाद सब लोग अपने अपने काम काज में व्यस्त होने लगे । 

लेकिन किसी को नहीं पता था कि ये धूमकेतु प्राकृतिक धूमकेतु नहीं था बल्कि तमस ग्रह की ड्रैगन जाति के ड्रैगनो की सेना का विमान था । जो अपने साथ अंधकार से ऊर्जा लेने वाले ड्रैगन जैसे परग्रही जीवों को पृथ्वी पर लेकर आया था और बहुत जल्दी वे अपनी विनाश लीला आरंभ करने वाले थे । 

ड्रैगन दिखने में बहुत ही भयंकर थे । प्रत्येक ड्रैगन दस हाथियों जितना बाद था । चेहरे शेर जैसे, पैर घोड़े जैसे, पूंछ मगरमच्छ जैसी, त्वचा किसी चट्टान की भांति कठोर और माथे पर धड़कता हुआ नीली मणि ।  ड्रैगनों के माथे पर चमकता नीला चिह्न कोई आभूषण नहीं, बल्कि अंधकार से ऊर्जा खींचने वाला यंत्र था जो जैसे-जैसे अंधकार बढ़ता जाता, वो ड्रैगनों को उतना ही अजेय बनाता जाता । 

धूमकेतु के पृथ्वी से टकराने के कुछ ही दिनों बाद ड्रैगनों की विनाश लीला आरंभ हो गई । इनका हमला रात को ही होता था जब पूरा विश्व अंधेरे की ओढ़ कर सो रहा होता । अंधेरे में ये इतने शक्तिशाली हो जाते थे कि इनका सामना कर पाना किसी के बस का नहीं था । इनके स्पर्श से ही हर प्रकार की धातु मोम की तरह पिघल जाति थी । इंसान हो या जानवर, अपने माथे पर लगी नील मणि से सबका रक्त चूस कर उसको राख का ढेर बनाने में इनको केवल कुछ सेकंड ही लगते थे । 

एक एक करके इन्होंने भारत भूमि के राज्यों को वीरान करना शुरू कर दिया । शाम तक सब ठीक ठाक होता लेकिन जैसे ही रात गुजरती, अगले दिन वो गाँव वीरान हुआ होता । ऐसे हर हमले के बाद ड्रैगन और अधिक ताकतवर होते चले गए । 

किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि इस मुसीबत से छुटकारा कैसे पाया जाए । राजा के आदेश पर सेनाओं को राज्य की सीमाओं पर तैनात तो कर दिया गया लेकिन ड्रैगन सेना को रोक पान किसी के बस नहीं था । 

मंत्री जय सिंह, आचार्य वरुण, राज्य के विद्वान और सेनापति राघव, सब मंत्रणा कर रहे थे कि कैसे इनका खात्मा किया जाए । किसी को कोई उपाय नजर नहीं आ रहा था । तभी राजगुरु भद्रदेव बैगा अपने शिष्यों के साथ कक्ष में प्रविष्ट हुए । सबने उन्हें प्रणाम किया । राजगुरु ने आसान ग्रहण किया और बोले कि इन ड्रैगनों के माथे पर चमकने वाली मणि कोई रत्न नहीं है बल्कि अंधकार से ऊर्जा खींचने वाला स्रोत है । जब तक इसे निष्क्रिय नहीं किया जाएगा , इनका खात्मा असंभव है । हमें एक ऐसा यंत्र बनाना होगा जो इनके यंत्र को निष्क्रिय कर दे । 

मंत्री ने गुहार लगाई “लेकिन गुरुदेव, गाँव के गाँव जल रहे हैं, प्रजा में भय का वातावरण बन चुका है । यंत्र बनने में तो समय लगेगा । तब तक प्रजा और राज्य की रक्षा कैसे की जाए ?”

गुरुदेव ने कहा कि अंधकार कितना भी गहरा हो, प्रकाश की एक किरण उस अंधकार को चीर देती है । जब तक यंत्र न बन जाए हमें सम्पूर्ण राज्य को 24 घंटे प्रकाशमय रखना होगा । हमारे वैज्ञानिकों को दुर्लभ धातुएँ प्रदान की जाएँ ताकि ड्रैगन के माथे पर चमकने वाली मणि को निष्क्रिय करने का यंत्र बनाया जा सके । और हाँ किसी भी तरह से हमें ड्रैगन के रक्त का नमूना चाहिए ताकि उनकी संरचना को समझा जा सके और उनको समाप्त करने की प्रक्रिया आरंभ की जा सके । 

सेनापति राघव ने चिंता जताई कि जैसी कठोर उनकी त्वचा है उसको भेद कर उनके रक्त का नमूना ले पाना असंभव सा लगता है । “दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं होता अगर योजना बना कर काम किया जाए” राजगुरु ने कहा । मैंने भैरव नाग को बुलवाया है । ये काम वो और उसके साथी ही कर सकते हैं । तभी कक्ष का द्वार खुला और भैरव नीग के साथ उसके दो साथी प्रविष्ट हुए । उनके हाथों में कुछ पांडुलिपियाँ और कुछ चमकीली धातुएँ हैं । आकर उन्होंने राजगुरु को प्रणाम किया । 

“भैरव नाग ! अब तक तुमने इन ड्रैगनों पर जो अध्ययन किया है उसका क्या परिणाम है, ज़रा विस्तार से बताओ” । राजगुरु ने कहा । 

“गुरुदेव ! ये जीव किसी दूसरे ग्रह के प्राणी हैं और इनके शरीर की हर कोशिका अंधकार से ऊर्जा खींचने में सक्षम है । हर जीव दस हाथियों से बड़ा है और इनके जबड़े 180 डिग्री तक फैल सकते हैं । एक ही बार में चार पाँच हाथियों को निगल सकते हैं । इनके जबड़ों में बेहद धारदार दांतों की कतारें है और बीच के दो दांत तो ऐसे हैं कि किसी भी सख्त से सख्त धातु को चबा सकते हैं । उनके अंग विशाल हैं और जांघें किसी वृक्ष के तने से भी मोटी हैं । त्वचा गैंडे से भी कठोर है और दोनों पंखों की सहायता से इतनी तीव्रता से उड़ते हैं कि एक आंधी सी उमड़ पड़ती है । आँखें विशाल और नजर बहुत तेज है । मीलों दूर से छोटी से छोटी हलचल को भी पकड़ लेते हैं । कान इतने शक्तिशाली कि सुई के गिरने की आवाज भी सुन पाने  में सक्षम । और उनके माथे पे नीले रंग की मणि, कोई रत्न नहीं है बल्कि अंधकार से ऊर्जा खींचने का यंत्र है जो पूरे शरीर में अंधकार से प्राप्त ऊर्जा को प्रवाहित करता है । जितना अधिक अंधकार होता है, उतने ही अधिक वो शक्ति शाली होते जाते हैं । एक सीमा तक शक्ति अर्जित करने के बाद इनके शरीर में संवर्धन-विघटन होता है और उससे एक नया ड्रैगन तैयार हो जाता है । अगर इन पर समय रहते काबू नहीं पाया गया तो एक दिन ये ड्रैगन पृथ्वी को जीव विहीन कर देंगे” । भैरव नाग ने उत्तर दिया ।

“तुम्हारी खोज अमूल्य है । उन्हें हराने के लिए हमें उनकी अंधकार से प्राप्त होने वाली ऊर्जा को हराना यानि खत्म करना होगा । इसके लिए हमें उन ड्रैगनों के रक्त का एक नमूना चाहिए होगा । तभी हम कुछ कर पाएंगे । भैरव नाग ! तुम पाने साथियों के साथ उनके रक्त के नमूने लेने की कोशिश करो । अगर तुम इस में सफल हो गए तो ये राज्य के प्रति तुम्हारी बहुत बड़ी सेवा होगी । लेकिन ध्यान रहे ये काम इतना आसान नहीं है । इसमें जान भी जा सकती है । इसलिए जो भी करना सोच समझ कर करना” । राजगुरु ने कहा । 

भैरव और उसके साथी सिर झुक कर कक्ष से निकल गए ।

अगली रात ड्रैगनों ने फिर से एक गाँव पर आक्रमण किया और पूरे गाँव के लोगों को राख में बदल दिया । जो लोग बच गए वो राजा प्रताप राय के पास गुहार लगाने जा पहुंचे । राजा प्रताप राय ने उन्हें आश्वासन दिया की इस समस्या के समाधान के लिए युद्ध स्तर पर काम किया जा रहा है । स्वयं राजगुरु , सेनापति राघव, आचार्य और भैरव नाग इसी कार्य में लगे हुए हैं । बहुत जल्द हम इन ड्रैगनों से पृथ्वी को सुरक्षित कर पाएंगे । जब तक ये ड्रैगन नष्ट नहीं किया जाते, तब तक अंधकार में रहने से हर व्यक्ति को बचना होगा । 

एक प्रयोगशाला में राजगुरु और अन्य सभी विद्वान किन्ही प्रयोगों में व्यस्त हैं । कांच के बर्तनों में कुछ रंग बिरंगे तरल पदार्थ पड़े हैं । एक टेबल पर आचार्य और साथी एक धातु के बने जीव को आकार दे रहे हैं । लगभग एक फुट लंबा ये जीव किसी जोंक की भांति दिखाई दे रहा है । जिसका आगे का भाग दो नुकीले ड्रिल जैसे दांतों से जुड़ा हुआ है । ये दांत कठोर से कठोर धातु में छेद करने में सक्षम हैं । इन दांतों के अंदर तो पाइप भी लगी हैं जो किसी भी धातु से किसी भी तरल पदार्थ को सोख सकती है । दूसरी मेज पर एक टीम एक यांत्रिक बगुला बना रही है । दोनों का काम लगभग पूरा हो चुका है ।  

तभी भैरव नाग और उनके साथी प्रयोगशाला में आते हैं । भैरव नाग बताते हैं कि ड्रैगनों के रक्त के नमूने लेने में वे लोग असफल रहे हैं क्योंकि ड्रैगन अंधेरे में आक्रमण करते हैं और हमारे यंत्र अंधेरे में उन पर सही वार नहीं कर पाते । तब राजगुरु भैरव नाग को बताते हैं कि हमें पहले ही अंदेशा था कि इन ड्रैगनों  के रक्त का नमूना लेना इतना आसान नहीं होगा । इसलिए हमने इस पर काम करना शुरू कर दिया था । हमने दुर्लभ धातु से एक यांत्रिक बगुला और एक यांत्रिक जोंक का निर्माण किया है । ये दोनों रीमोट के जरिए कंट्रोल होते हैं । हमने इन में कुछ छुपे हुए कैमरे भी लगा दिए हैं । ताकि इनको बाहर से नियंत्रित किया जा सके । अब आपको करना ये है कि पर्वत की जिस कन्दरा में वो ड्रैगन दिन के उजाले में छुपे रहते हैं, वहाँ जाकर इस यांत्रिक बगुले के द्वारा इस यांत्रिक जोंक को किसी ड्रैगन की पीठ पर पहुंचा देना है । रात होने से पहले पहले ये जोंक उसकी पीठ में छेद करके रक्त के नमूने अपनी नलिकाओं में भर लेगा । फिर उसी बगुले के जरिए आपको इस जोंक को वापिस बुला लेना है । अगर हम इस मकसद में कामयाब हो गए तो हम इन ड्रैगनों का मुकाबला बेहतर तरीके से कर पाएंगे । 

भैरव नाग और उसके साथी दोनों यंत्रों को लेकर प्रयोगशाला से निकल जाते हैं । वे सब उस पर्वत के पास पहुंचते हैं जिस की कन्दरा में ड्रैगनों ने अपना विश्राम स्थल बना रखा है । वहाँ वो ठीक उसी प्रकार करते हैं जैसे राजगुरु ने बताया था । एक दो बार असफल होने के बाद वो जोंक को ड्रैगन की पीठ तक पहुंचा पाने में सफल हो जाते हैं । जोंक ने ड्रैगन की पीठ पर पहुंचते ही अपना काम शुरू कर दिया । भैरव नाग और उसके साथी दूर दृष्टि यंत्र से सब देख रहे हैं । जैसे ही जोंक ने ड्रैगन के रक्त को अपनी नलिकाओं में भरा, भैरव ने बगुले को वहाँ भेज दिया । बगुले ने जोंक को उठाया और कन्दरा से बाहर की तरफ उड़ चला ।

थोड़ी देर बाद सभी लोग प्रयोगशाला कक्ष में इकट्ठे हुए । राजगुरु ने भैरव नाग के द्वारा लाए गए रक्त नमूने को देखा और संतुष्टि के स्वर में कहा कि अब इन ड्रैगनों के बारे में ज्यादा विस्तार से जान पाएंगे और इन्हें खत्म करने की युक्ति ढूंढ पाएंगे । राजगुरु ने नमूने की वो ट्यूब आचार्य को सौंप दी और जल्दी से जल्दी परिणाम निकालने को कह कर सभी वहाँ से चले गए । पीछे आचार्य और उनके शिष्य काम में व्यस्त हो गए । 

राजगुरु ने जाकर यह समाचार राजा प्रताप राय को सुनाया और यकीन दिलाया कि बहुत जल्दी हमारे विद्वान और वैज्ञानिक इन ड्रैगनों के खात्मे के लिए हथियार बनाने में सक्षम हो जाएंगे । 

उधर ड्रैगनों ने गांवों के गाँव खाली करने जारी रखे । क्योंकि प्रताप राय उस क्षेत्र का सबसे शक्तिशाली राजा था इसलिए पड़ोस के राज्यों से भी दूत राजा प्रताप राय के पास निवेदन लेकर आए कि इन दानवों से हमारे राज्य और प्रजा की भी रक्षा की जाए । राजा ने उन्हें समझाया कि हमारे विद्वान और वैज्ञानिक काम पर लगे हुए हैं और बहुत जल्द हम इन ड्रैगनों को यहाँ से मार भगाएंगे । 

तीन दिनों के अथक परिश्रम और अनुसंधान के बाद आचार्य, भैरव नाग और राज्य के वैज्ञानिकों ने सफलता की घोषणा कर दी । ड्रैगनों की समाप्ति के सब ने मिल कर जो हथियार बनाए थे सब उनको देख कर बहुत प्रसन्न हो रहे थे । राजगुरु ने पहले तो उन सभी लोगों को धन्यवाद दिया जिन्होंने मेहनत से उस यंत्र का निर्माण किया था । फिर बताया कि वर्तमान समय में पृथ्वी पर मौजूद सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिकों ने इसे तैयार किया है । ड्रैगनों के रक्त के नमूने के गहन अध्ययन के बाद उनके खात्मे का काम सिर्फ यही यंत्र कर सकता है । कल हमारे विद्वान और वैज्ञानिक इसका प्रयोग उन ड्रैगनों पर करेंगे और मुझे पूरी उम्मीद है कि हम इसमें सफल होंगे । सबने सहर्ष ध्वनि की और कल का इंतजार करने लगे । 

अगली शाम सभी लोग पर्वत की उस कन्दरा के बाहर यंत्र की तैनाती करके ड्रैगनों के बाहर आने का इंतजार कर रहे थे । जैसे ही सूरज डूबा, एक एक करके ड्रैगन कन्दरा से बाहर आने लगे । भैरव नाग और सेनापति राघव ने यंत्र से उन पर हमला किया । इस अचानक हमले से ड्रैगन पहले तो चौंके लेकिन फिर उन्होंने सभी यंत्रों को मसल कर रख दिया । भैरव नाग और सभी साथी बड़ी मुश्किल से ड्रैगनों की नजर से बच कर वहाँ से जान बचा कर भाग आए । 

प्रयोगशाला के उसी कक्ष में राजगुरु, आचार्य, सेनापति राघव, भैरव नाग और सभी विद्वान व वैज्ञानिक लोग चिंतित भाव में मंत्रणा कर रहे थे । राजगुरु कह रहे थे कि जरूर हमसे यंत्र बनाने में कोई भूल हुई है । वरना ये असफल नहीं होता । क्या आप लोगों ने रक्त के नमूने का अध्ययन भली भांति किया भी था ? वैज्ञानिकों ने विश्वास दिलाया कि अध्ययन में कोई असावधानी नहीं बरती गई थी । राजगुरु उसे नमूना दिखाने को कहते हैं । एक शिष्य कक्ष में राखी एक अलमारी से रक्त नमूने की शीशी निकाल कर लाता है । जैसे ही आचार्य और वैज्ञानिकों की नजर नमूने पर पड़ती है तो सब चौंक पड़ते हैं क्योंकि रक्त के नमूने का रंग बदल चुका है । एक वैज्ञानिक उसको टेस्ट करता है तो हैरान रह जाता है । वो सबको बताता है कि ड्रैगनों के रक्त की विशेषताएँ बदल चुकी हैं । इसका मतलब ये परिवर्तनशील प्राणी हैं । कुछ देर या कुछ दिनों के बाद इनका पूरा सिस्टम बदल जाता है । तभी हमारे यंत्रों ने इन पर काम नहीं किया । राजगुरु के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आती हैं । वो चुपचाप प्रयोगशाला के कक्ष से बाहर निकाल जाते हैं । 

ड्रैगनों का उत्पात जारी है । इस बार तो उन्होंने मनुष्यों के साथ साथ उस क्षेत्र में बहने वाली नदी और खेतों में खड़ी फसलों को ही सुखा दिया । पूरा क्षेत्र बंजर बना दिया । जहां कल तक हरे भरे वृक्ष खड़े थे वहाँ अब जले हुए ठूंठ दिखाई पड़ रहे थे । 

राजगुरु एक पुस्तकालय जैसे कक्ष में किसी ग्रंथ का अध्ययन कर रहे थे । काफी देर अध्ययन करने के बाद उन्होंने ग्रंथ को लेकर वहाँ से प्रस्थान किया । 

राज दरबार में राजा प्रताप राय, सेनापति राघव, राजगुरु, भैरव नाग, आचार्य, भैरव नाग के साथी, सेना के सिपाही और कुछ विद्वान व वैज्ञानिक उपस्थित हैं । राजगुरु बोलना आरंभ करते है । 

“आज मैं वो सत्य सबको बताने जा रहा हूँ, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं । इस राज्य के राजाओं के पूर्वज राजा चंद्रभानु प्रताप देव ने अपने तपोबल और बाहुबल से देवताओं से एक अद्भुत रत्न प्राप्त किया जिसे “पारस” मणि कहा जाता है” । 

“पारसमणि ! ये तो वही रत्न है ना गुरुदेव जो लोहे को सोने में बदल देता है” ? भाभा ने पूछा । 

“ये सिर्फ लोहे को सोने में ही नहीं बदलता बल्कि ये तो किसी भी पदार्थ को इच्छित रूप, गुण और तत्व में बदल सकता है । यह सूर्य की किरणों को समेटता है और धारक की इच्छानुसार रूपांतरित करता है । ये जीवित शरीर की कोशिकाओं को परिवर्तित भी कर सकता है । ये अमरत्व भी दे सकता है और विनाश भी ला सकता है । इसको शून्य से तीन सौ साठ डिग्री तक नियंत्रित किया जा सकता है । शून्य पर ये निष्क्रिय है और 360 डिग्री पर ये ब्रह्मांडीय विनाश का कारण बन सकता है । सिर्फ ये ही एक यंत्र है जो इन दानवों को समाप्त कर सकता है” । राजगुरु ने कहा । 

“ये यंत्र इस वक्त कहाँ है गुरुदेव ? राजा प्रताप राय ने पूछा । 

“ये राजा भव्य राज के खजाने में सुरक्षित है । लेकिन इसका संचालन सिर्फ राजा पारसधर ही कर सकते हैं क्योंकि ये उनकी ही मानसिक तरंगों के द्वारा नियंत्रित होता है” । राजगुरु ने बताया । 

“वो इस वक़्त कहाँ हैं” ? आचार्य ने पूछा ।   

राजा पारसधर इस वक़्त एक गहन तपस्या में लीन हैं । अब उनको जगाने का वक़्त आ गया है । लेकिन हमारे पौराणिक ग्रंथों के अनुसार सिर्फ पारस मणि से इन राक्षसों का अंत नहीं हो पाएगा । क्योंकि ये प्राणी हर पल अपनी संरचना को बदल लेते हैं । हर उजाले को अंधकार में बदल कर और अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं । इसके लिए हमें “नाग मणि को हासिल करना भी जरूरी होगा” । राजगुरु भद्रदेव ने कहा । 

“अब ये नाग मणि कहाँ से प्राप्त होगी: ? सेनापति राघव ने पूछा । 

“इसके लिए हमें पंचफनी नागवंशी नागराज नीलकंठ की बेटी “नागमती’ के पास जाना पड़ेगा । नागमती न सिर्फ सौन्दर्य की जीती जागती एक मिसाल है बल्कि एक कुशल वीरांगना भी है । ये वो शक्ति है जो भूले हुए युगों के प्राचीन रहस्यों को उजागर कर सकती है । वो हर प्रकार के हथियार चलाने में माहिर है भले ही वो आधुनिक हो या प्राचीन । पालक झपकते ही वो बिना हथियार सौ योद्धाओं को परास्त कर सकती है । उसकी वीरता से प्रभावित होकर उसके दादा नागराज त्रिलोकफ़नी ने उसको राज्य का सबसे दुर्लभ यंत्र पुरुस्कार के तौर पर दिया था “नाग मणि यंत्र” । 

“नाग मणि यंत्र क्या कर सकता है ?” भैरव नाग ने पूछा । 

“ये एक दिव्य यंत्र है । इसकी ऊर्जा किसी भी पदार्थ को पल भर में चकनाचूर कर सकती है और सबसे घातक विष को भी तुरंत निष्प्रभावी कर सकती है” । गुरुदेव ने बताया । 

“अब हमारे लिए क्या हुक्म है गुरुदेव” ? राजा प्रताप राय ने पूछा । 

“राजन ! हमारे पौराणिक ग्रंथों में लिखा है कि जब जब भी देवताओं पर विपत्ति आई, उन्हें राक्षसों ने सताया , तब तब भगवान ने किसी अवतार के रूप में आकर उनका वध किया । जैसे आपने तारकासुर के वध की कथा तो सुनी ही होगी ? कैसे भगवान शिव के वीर्य से कार्तिकेय स्वामी का जन्म हुआ और कैसे उन्होंने उस असुर का वध किया । आज फिर से पृथ्वी संकट के उसी मुहाने पर खड़ी है । अगर इस संकट से छुटकारा न पाया गया तो पृथ्वी प्राणी विहीन हो जाएगी । पूरी पृथ्वी बंजर बन कर रह जाएगी । हमें राजा पारसधर और रानी नागमती को समाधि से जगाना होगा । उन दोनों के बिना इन राक्षसों का विनाश नामुमकिन है” । राजगुरु ने कहा । 

“हमने इनके बारे में सुना तो है लेकिन किसी ने भी इन्हें देखा नहीं” । भैरव नाग ने कहा । 

“वो इसलिए कि बरसों से ये दोनों ध्यान अवस्था में समाधि में लीन हैं । इन दोनों के जागृत होते ही हमें पारसमणि और नागमणि के परस्पर संयोग से इन दानवों के काल का सृजन करना होगा” । राजगुरु ने बताया । 

“लेकिन क्या वे दोनों हमारी सहायता करने के लिए तैयार होंगे” ? आचार्य ने पूछा । 

“इसके लिए हमें इन दोनों के बारे में कुछ जानना बहुत जरूरी है । इन दोनों का मिलन कोई संयोग नहीं होगा, प्रकृति ने इन्हें बनाया ही एक दूसरे के लिए है । पृथ्वी पर इनका आना एक विशेष उद्देश्य से ही हुआ था । प्रकृति स्वयं इन्हें मिलान चाहती थी । तभी तो जब इनका पहली बार मिलन हुआ तब इन दोनों को ही इस बात का एहसास हो गया था” । राजगुरु ने कहा और अतीत में खो गए । 

---फ्लैश बैक ----

पहाड़ों की वादियों में कहीं एक खूबसूरत झील का किनारा है । और हर तरफ बहार की ऋतु है । तभी एक तरफ से घोड़े पर सवार राजा पारसधर का आगमन होता है । पूरे इलाके की खूबसूरती देख कर वो मंत्रमुग्ध रह जाते हैं । “अद्भुत स्थान है, मानो सृष्टि का हृदय यहीं धड़कता हो । कितनी शांति है यहाँ” , राजा ने मन ही मन सोचा । 

तभी वातावरण में घोड़ों की टापों की आवाज़ गूंजने लगी मानो कोई इसी ओर आ रहा हो । राजा ने स्वयं को एक ओट में छुपा लिया । 

एक अत्यंत खूबसूरत राजकुमारी अपने महिला अंगरक्षकों के साथ वहाँ आती है । लंबे केश, तेजस्वी चेहरा गहरी और आकर्षक आँखें । 

“ये कौन है ? चाँदनी सी उज्ज्वल और अप्सरा सी सुंदर । राजा ने स्वयं से पूछा । 

तभी राजा के घोड़े के हिनहिनाने के स्वर ने राजकुमारी का ध्यान भी राजा की ओर आकर्षित किया । दोनों ने एक दूसरे को गहरी निगाहों से देखा और देखते ही रह गए । 

राजा के मन ने कहा “उसकी आँखों में ऐसा कुछ है, जो मेरी आत्मा की गहराइयों तक पहुँच गया” । 

“उस अजनबी की आँखों में जो प्रकाश है, वो मेरे मन के अंधेरे कोनों को प्रकाशित कर रहा है” राजकुमारी के मन ने भी उससे कहा । 

परस्पर आकर्षण में बंधे वो दोनों अपने अपने राजमहल वापिस तो आ गए लेकिन दोनों का दिल एक दूसरे के पास ही रह गया । पूरी रात करवटें बदलते हुए बीती दोनों की । अगले दिन अनायास ही दोनों फिर उसी जगह पहुँच गए, उसी वक़्त । आज केवल मौन ही नहीं था । दोनों ने एक दूसरे का परिचय जाना और थोड़ा और करीब आ गए । रोजाना मिलने से दोनों के बीच नजदीकियाँ बढ़ने लगीं । दोनों के राज्य में कानाफूसी भी होने लगीं । दोनों के प्यार के चर्चे फैलने लगे तो बुजुर्गों ने दोनों की शादी का फैसला कर लिया ।

एक शुभ मुहूर्त में दोनों की शादी हो गई । राजा पारसधर और रानी नागमती एक दूसरे को पाकर बहुत खुश थे । वो परस्पर प्रेम में इतना डूब गए कि उनको दुनिया जहान की कोई खबर ही नहीं थी ।  

राजा पारसधर के राज्य के ही छपरी गाँव में एक आदिवासी विधवा महिला रहती थी। उसका नाम नागेश्वरी था। उसके परिवार में उसका एक ही सहारा था—उसका बारह वर्ष का बेटा करिया । पति के न रहने के कारण नागेश्वरी अपने छोटे से परिवार का पालन-पोषण बकरी पालन करके करती थी।

नागेश्वरी ने सबसे पहले एक ही बकरी पाली थी। वह बकरी उसे बहुत प्रिय थी, इसलिए उसने उसका नाम सुखमती रखा। समय के साथ-साथ सुखमती का परिवार बढ़ता गया और धीरे-धीरे बकरियों का झुंड दो दर्जन के करीब हो गया।

हर दिन करिया अपनी माँ की मदद के लिए बकरियों को चराने पास के जंगल में ले जाता था। पूरा झुंड करिया के पीछे-पीछे चलता और सबसे आगे सुखमती चलती थी। नागेश्वरी घर पर ही रहती और हर शाम अपने बेटे के लौटने का इंतजार करती। जब तक करिया घर वापस नहीं आ जाता, तब तक नागेश्वरी का मन बेचैन रहता था।

एक दिन फाल्गुन का महीना था। जंगल में पतझड़ लगा हुआ था। पगडंडियाँ सूखे पत्तों से ढकी हुई थीं। रोज की तरह करिया बकरियों को चराने जंगल गया। चलते-चलते अचानक उसका पैर अनजाने में एक कोबरा साँप पर पड़ गया। साँप ने झपट कर करिया के पैर में डंक मार दिया । 

कुछ ही क्षणों में करिया जमीन पर तड़पते हुए गिर पड़ा। उसके शरीर में जहर फैलने लगा। यह देखकर बकरियों का पूरा झुंड उसके पास ही खड़ा रह गया। सुखमती समझ गई कि उसके मालिक करिया को जहरीले साँप ने डस लिया है ।

सुखमती तुरंत भागती हुई गाँव की ओर दौड़ी और नागेश्वरी के घर पहुँच गई। बकरी की बेचैनी देखकर नागेश्वरी समझ गई कि जरूर कोई अनहोनी हो गई है। वह तुरंत सुखमती के पीछे-पीछे जंगल की ओर दौड़ी।

जब नागेश्वरी वहाँ पहुँची तो देखा कि उसका बेटा करिया जमीन पर पड़ा है और उसका शरीर जहर से काला पड़ने लगा है। यह देखकर माँ का कलेजा फट पड़ा। वह करिया को अपनी गोद में उठाकर राजा पारसमणिधार और रानी नागमती के राजमहल की ओर दौड़ी, क्योंकि लोगों का विश्वास था कि राजा-रानी के पास दिव्य शक्ति है।

राजमहल एक विशाल सरोवर के बीच बना हुआ था। नागेश्वरी वहाँ पहुँचकर द्वारपालों से रो-रोकर विनती करने लगी कि वे राजा और रानी को बुलाएँ ताकि उसके बेटे को बचाया जा सके। लेकिन द्वारपालों ने उसे भीतर ही नहीं जाने दिया । कहा कि राजा और रानी इस वक़्त विश्राम कर रहे हैं । हम उनके आराम में व्यवधान नहीं पहुंचा सकते । 

अपने बेटे को मरता देखकर दुख और क्रोध में डूबी नागेश्वरी के मुँह से शाप निकल पड़ा। उसने कहा— “जिस राजा और रानी के हृदय में प्रजा के लिए दया नहीं है, वे जीवन भर संतान सुख से वंचित रहें ।” इतना कहकर नागेश्वरी अपने बेटे के शव को लेकर घर आ गई । 

उधर उसी समय सुखमती बकरी करिया के जीवन के लिए पास के जंगल में स्थित एक शिवलिंग के पास पहुँची। वह अपने थन से लगातार दूध बहाकर शिवलिंग को अर्पित करने लगी। सुबह से शाम तक वह बिना रुके शिवलिंग पर दूध चढ़ाती रही, मानो भगवान से अपने मालिक की जान की भीख माँग रही हो।

भगवान शिव उस बकरी के अपने स्वामी के प्रति इतना लगाव देख कर द्रवित हो गए । 

अचानक आकाश में बिजली चमकी और उसी क्षण एक चमत्कार हुआ— घर में रखे करिया के शरीर से जहर उतर गया और वह फिर से जीवित हो उठा।

नागेश्वरी अपने बेटे को जीवित देखकर खुशी से उसे गले लगा लिया। तभी उसे अपनी प्रिय बकरी सुखमती की याद आई। वह करिया के साथ उसे ढूँढते-ढूँढते जंगल में पहुँची।

वहाँ उन्होंने जो दृश्य देखा, वह अत्यंत मार्मिक था। सुखमती की आँखों से आँसू बह रहे थे और वह अभी भी शिवलिंग पर अपना दूध अर्पित कर रही थी।

करिया ने प्यार से पुकारा—“सुखमती…!”

अपने मालिक की आवाज सुनते ही सुखमती खुशी से उछल पड़ी और दौड़कर करिया और नागेश्वरी के पास आ गई। उस क्षण माँ, बेटा और बकरी—तीनों का मिलन देखकर जंगल भी जैसे भावुक हो उठा। अपने बेटे को जीवित देख अन नागेश्वरी को आभास हुआ कि क्रोध में आकर उसने अपने राज्य के राजा को श्राप दे दिया । उसे पछतावा होने लगा । 

उधर राजा और रानी को जैसे ही सारी बात का पता लगा उन्होंने द्वारपालों को डांटा और तुरंत रथ पर सवार होकर नागेश्वरी के घर की तरफ चल दिए । रास्ते में किसी ने उन्हें बताया कि नागेश्वरी तो अपने पुत्र के सतह जंगल की तरफ गई है । राजा ने रथ को उधर ही मोड दिया । दोनों जंगल में बने उसी शिव मंदिर के पास जा पहुंचे जहां नागेश्वरी और करिया पहले से ही अपनी बकरी सुखमती के साथ उपस्थित थे । 

राजा और रानी ने अपने द्वारपालों के व्यवहार के लिए नागेश्वरी से क्षमा मांगी और करिया के जीवित होने पर नागेश्वरी को शुभकामनाएँ प्रदान की । नागेश्वरी ने भी क्षमा मांगी कि पुत्र के वियोग में क्रोध वश उसने जो श्राप दिया है, भगवान करे वो श्राप फलीभूत न हो । तब राजा और रानी ने हाथ जोड़ कर कहा कि एक माँ के दुखी हृदय से दिया गया श्राप अवश्य ही फलीभूत होगा । लेकिन हमें उस माँ से कोई शिकायत नहीं है । तभी वहाँ पर भगवान शिव एक ऋषि के रूप में प्रकट हो गए और सब को आशीर्वाद देते हुए कहा – 

“यद्यपि इसमें राजा और रानी का कोई दोष नहीं है फिर भी माँ का दिया हुआ श्राप अवश्य फलीभूत होगा । लेकिन अगर राजा और रानी भगवान शिव की आराधना करते हुए कड़ी तपस्या करेंगे तो एक दिन इनके यहाँ एक तेजस्वी पुत्र भोरम देव का जन्म होगा । वो साक्षात शिव का ही रूप होगा । उस जैसा प्रतापी और वीर कोई दूसरा नहीं होगा और वो पृथ्वी का रक्षक कहलाएगा” । सबने उस ऋषि को प्रणाम किया और ऋषि अपने रास्ते चले गए । 

राजा और रानी महलों में वापिस आ गए । ऋषि के शब्द उनके कानों में गूंज रहे थे । प्रायश्चित के लिए उन्होंने कड़ी तपस्या करने का निश्चय किया । 

जिस झील के पास राजा और रानी पहली बार मिले थे, उसी स्थान पर राजा–रानी के आदेश पर एक अद्भुत जीवित महल का निर्माण शुरू हुआ । ऐसा महल जो जल में डूब सकता है, सूर्य से ऊर्जा ले सकता है और दसों दिशाओं में गुप्त सुरंगों से जुड़ा है । यह महल केवल निवास नहीं, बल्कि एक जीवित यंत्र है—युद्ध, सुरक्षा और संवाद का केंद्र । इस सभ्यता की सबसे अनोखी विशेषता है मनुष्य, पशु, पक्षी और जलचरों के बीच ध्वनि और तरंगों के माध्यम से संवाद की कला ।

निर्माण का कार्य महान वास्तुकार अशोक कर्मकार नागराज को सौंपा गया ।महल साधारण पत्थरों से नहीं, बल्कि जीवित रत्नों से निर्मित था । इसकी विलक्षण विशेषता यह थी कि यह झील की गहराइयों में डूब सकता था और सूर्यप्रकाश में पुनः ऊपर उठ जाता था । महल जल–भार संतुलन से संचालित होता था । एक पवित्र शिव मंदिर उसके भार को नियंत्रित करता था, मानो देव-यांत्रिकी का अद्भुत चमत्कार हो । दरवाज़े पूर्णतः जल–वायुरोधक थे।खिड़कियों में जड़े क्रिस्टल सूर्यप्रकाश को पकड़कर महल के हर कक्ष तक पहुंचाते थे । शिखर पर जड़े हीरे प्रकाश को अपवर्तित कर झील के नीचे हर कोने को आलोकित करते थे । दसों दिशाओं में गुप्त सुरंगें फैली थीं ।

पूर्व दिशा —सूर्य मंदिर, जिसकी रक्षा राजगुरु आदित्य प्रताप सिंह करते थे।

दक्षिण–पूर्व —यज्ञ मंदिर, जिसकी सुरक्षा अग्निहोत्री मलकम करते थे।

सबसे दूरस्थ क्षेत्र —काली मंदिर, जिसकी रक्षा वीरभद्र राजपूत और उनके निर्भीक योद्धा करते थे।

दसों दिशाएँ पवित्र सुरंगों से संरक्षित थीं, जिन्हें केवल महल के भीतर से नियंत्रित किया जा सकता था ।

महल की चोटी पर एक विशाल स्तंभ था जिस पर सफेद ध्वज लहराता था । जब महल जल में डूब जाता, केवल वही ध्वज दिखाई देता —आकाश और गहराई के बीच का पवित्र संबंध । झील की तली में रानी नागमती की महिला सेना रहती थी, स्वर्ण मत्स्यकन्या के नेतृत्व में । वे गहराइयों से छलांग लगाकर ध्वज स्तंभ तक पहुँचतीं और राजा–रानी से संपर्क बनाए रखतीं । महल का हर पत्थर, हर कक्ष, हर सुरंग रहस्य से भरा है । यह केवल वास्तुकला नहीं…यह एक जीवित यंत्र है — शक्ति, विज्ञान और अनन्त प्रेम का ।

इसी महल में राजा पारसधर और रानी नागमती तपस्या में लीन हो गए । 

----फ्लैश बैक समाप्त ---- 

राजगुरु की तंद्रा टूटती है । उनके चेहरे पर असीम प्रकाश के साथ गंभीरता भी है । वे आँखें खोलते और फुसफुसाते हैं “समय आ गया है । अब राजा और रानी को ध्यान से बाहर निकालना होगा । वो सबको आदेश देते हैं । सभी राजाओं को संदेश भेजो । राज्य और सहयोगी प्रदेशों से श्रेष्ठ अविवाहित युवकों और युवतियों का चयन करो — जो मन और शरीर से बलवान हों । कोई भी शारीरिक रूप से रोगी या मानसिक रूप से बीमार न हो । कम से कम पाँच हजार नवयुवक और पाँच हजार नवयुवतियाँ । सबको प्रयोग समाप्त होने तक महल में ही रहना होगा” ।  राजगुरु का आदेश सुन कर सभी बाहर की तरफ चल पड़ते हैं । राजगुरु आँखें बन करके किसी गहन चिंतन में डूब जाते हैं । 

जो ड्रैगन थोड़ी सी संख्या में अंतरिक्ष से आए थे अब उनकी संख्या बढ़कर हजारों में पहुँच चुकी थी । अब तो उन्होंने दिन के उजाले में भी आक्रमण करने शुरू कर दिए थे । मनुष्यों और अन्य प्राणियों का रक्त चूस-चूस कर वे शक्तिशाली होते जा रहे थे । अब जरूरत थी कि एक ही बार में सभी ड्रैगन खत्म कर दिए जाएँ क्योंकि अगर कोई भी ड्रैगन बच गया तो ये विनाश लीला फिर से शुरू हो जाएगी । 

कुछ दिनों बाद — महल के एक गुप्त स्थान पर राजा पारसधर और रानी नागमती गहन समाधि में लीन हैं और हज़ारों चयनित युवक-युवतियाँ अनुशासन में खड़े हैं । 

राजगुरु ने सबको संबोधित करते हुए कहा “हे शक्ति के धारको ! आज तुम सबसे महान प्रयोग की दहलीज़ पर खड़े हो। तुम्हारी निष्ठा इस राज्य की ढाल बनेगी। यह प्रांगण अब आध्यात्मिक ऊर्जा की प्रयोगशाला बनेगा। तैयार हो जाओ…क्योंकि यह जागरण युग का प्रारंभ हो चुका है । समय आ गया है जब मानव ऊर्जा दिव्यता को छूएगी । हमारे सामने संकट सिर्फ राज्य का नहीं है बल्कि सम्पूर्ण पृथ्वी का है । इस संकट को हराने के लिए हमें राजा पारसधर और रानी नागमती को समाधि से जगाना होगा । तुम्हारी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजा और रानी शारीरिक ऊर्जा से परे जा चुके हैं । उन्हें ऊर्जा जागरण से गुजरना होगा । तुममें से हर युवती को किसी एक युवक को चुनना होगा और जोड़ी बनानी होगी । यह अधिकार केवल स्त्रियों को है । हर जोड़ी एक श्रेष्ठ नया जीवन बनाएगी । दो विभिन्न ऊर्जाओं के संयोग से जो वंश उत्पन्न होगा, वही इस संकट का अंत करेगा । राज्य तुम्हारी सभी जरूरतों को पूरा करेगा । पूरे सप्ताह, हर जोड़ी ऊर्जा नृत्य, लय-योग और शक्ति उत्सर्जन का अभ्यास करेगी। तुम्हारी तरंग राजा और रानी को जागृत करेगी। स्मरण रहे — संचार रुकना नहीं चाहिए। किसी भी व्यवधान से ऊर्जा बिखर सकती है” । 

फिर शुरू हुई राजा और रानी के जागरण की प्रक्रिया । पाँच हजार जोड़े पूरी तन्मयता और काम भाव से वातावरण में प्रेम और आनंद का रस बरसा रहे थे ताकि जैसे ही राजा और रानी जागें उनके मन में भी वही काम भाव जन्म ले जिससे ऊर्जा वंश की उत्पति हो । पूरा महल संगीत और नृत्य के संगम से सराबोर हो चला था । ऐसा लग रहा था जैसे देवताओं के दरबार में अप्सराएँ और देवता काम भाव युक्त नृत्य कर रहे हों । प्रक्रिया के पूरा होते ही राजा पारसधर और रानी नागमती की तंद्रा टूटी । दोनों ने आँखें खोल कर परस्पर एक दूसरे को देखा और फिर पूरे वातावरण का जायज़ा लिया । 

दोनों के जागते ही राजगुरु, आचार्य, राजा प्रताप राय, भैरव नाग और सभी विद्वानों और वैज्ञानिकों का प्रवेश होता है । राजा पारसधर और रानी नागमती गुरुजनों को प्रणाम करते हैं । तब राजगुरु बताते हैं कि पृथ्वी पर कैसा संकट आया हुआ है । वो उन्हें याद दिलाते हैं कि जनगल के शिव मंदिर में ऋषि ने जो बात काही थी अब उसका समय आ गया है । इसीलिए उनको गहन समाधि से उठाया गया है । क्योंकि पारस मणि और नाग मणि के बिना उन दानवों की समाप्ति लगभग असंभव है । और ये दोनों मणियाँ आप दोनों की मानसिक आज्ञाओं का ही पालन करती हैं । 

तब राजा पारसधर और रानी नागमती ने पूछा कि हमें क्या करना है आज्ञा दें । राजगुरु ने बताया कि अब राजा पारसधर और रानी नागमती के साथ साथ पाँच हजार जोड़ों को एक प्रयोग से गुजरना होगा । दोनों मणियों की ऊर्जा के प्रभाव से एक ऐसे वंश की उत्पत्ति होगी जो ड्रैगन जाति के समूल नाश का कारण बनेगी । 

राजगुरु ने आगे बताया कि हमें ऐसे वीर और दैविक योद्धाओं की जरूरत है जो आम इंसान से भिन्न हों । जिन के अंदर विशेष चमत्कारी शक्तियां हों और उन पर ड्रैगन के वार का असर न हो । सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि हमारे पास समय नहीं है । हम जितनी देर करेंगे, ड्रैगन उतने ही शक्तिशाली होते चले जाएंगे । साधारण दशा में एक बच्चे के जन्म में नौ मास का समय लगता है और बच्चे को बड़ा होने में और युद्ध के लायक किशोर बनने में कम से कम 12 बरस लगते हैं । लेकिन हमें ये सब काम 12 दिन में करना है । बच्चे के पैदा होने से लेकर युद्ध के लिए तैयार होने का सारा काम हमने अगले 12 दिन में करना है । और ये सब होगा पारसमणि और नागमणि की चमत्कारी शक्तियों से । इन शक्तियों को वैज्ञानिकों के कहे अनुसार आदेश देने का काम राजा पारसधर और रानी नागमती के द्वारा किया जाएगा । राजा और रानी ने अपने सहयोग के लिए अनुमति प्रदान कर दी । 

फिर शुरू हुआ वो प्रयोग जो न केवल अद्भुत था बल्कि प्रकृति से हट कर था । राजा पारसधर और सभी युवकों को कामोत्तेजना के चरम पर ले जाकर उनसे वीर्य लिया गया और इसी प्रकार रानी और युवतियों से भी डिंब/अंडे लिए गए । तब प्रयोगशाला में बने चैम्बर में राजा के शुक्राणु और रानी के डिंब में निषेचिन क्रिया करवाई गई । पाँच हजार जोड़ों के लिए भी इसी प्रक्रिया को अपनाया गया । सारा काम वैज्ञानिकों और विद्वानों की देख रेख में किया जा रहा था । पारसमणि और नागमणि के अद्भुत संयोग से उत्पन्न तिलस्मी किरणों के कारण जन्म की प्रक्रिया को चार सौ गुणा तेजी से किया जाने लगा ताकि 12 बरस 9 महीने का काम सिर्फ 12 दिन में किया जा सके ।  ठीक बारह दिन बाद जब प्रयोग का परिणाम देखने का दिन आया तो सभी बहुत प्रसन्न हुए । 5000 किशोर योद्धाओं के साथ राजा पारसधर और रानी नागमती का बेटा भी विकसित हो चुका था । राजा और रानी ने उसका नाम ऋषि के कहे अनुसार भोरम देव रख दिया । राजा और रानी नागेश्वरी के श्राप के खत्म हो जाने से बहुत प्रसन्न थे । 

अब ये सभी कोई साधारण योद्धा नहीं थे । ये पाने अंदर कई विशेषताएँ लेकर पैदा हुए थे । जैसे ये मानसिक तरंगों के माध्यम से ही संवाद करने में सक्षम थे । इंसान हो जा जानवर, सभी को ये मानसिक तरंगों के माध्यम से निर्देशित कर पाने में सक्षम थे । दिखने में इनके शरीर कोमल थे लेकिन इन के ऊपर कोई भी कठोर से कठोर धातु भी असर नहीं कर सकती थी । क्योंकि इनके अंदर एक और विशेषता ये थी कि ये स्वयं को अपने पर होने वाले आक्रमण के हिसाब से सुरक्षित कर सकते थे । जैसे अगर इन पर अग्नि से आक्रमण हो तो ये उस पर जल से प्रहार कर सकते थे । अगर इन पर  धातु से आक्रमण हो तो ये अपनी त्वचा को कठोर कर सकते थे ताकि कोई भी धातु इन पर असर न कर सके । अगर इन पर मानसिक आक्रमण होता तो ये अपनी विचार तरंगों को मानसिक कवच से सुरक्षित कर सकते थे । प्रकाश हो या अंधकार ये सभी हर दशा में युद्ध कर पाने में सक्षम थे । इनका सृजन ही ड्रैगन की शक्तियों को ध्यान में रख कर किया गया था । 

अब युद्ध का समय आ चुका है । गुरुदेव, पर्वत की एक चट्टान पर एक यंत्र स्थापित कर रहे हैं । ये यंत्र प्रकाश की विलक्षण किरणें छोड़ता है । ये तीव्र प्रकाश ड्रैगनों को आकर्षित करने का काम करेगा । इस यंत्र की विशेषता ये है कि इस में से प्रकाश अपने आप उत्पन्न होता है । कोई कितना भी प्रकाश खींच ले ये कभी प्रकाश हीन नहीं होगा और इससे परेशान होकर ड्रैगन इस पर आक्रमण करने के लिए आते रहेंगे । 

फिर राजगुरु ने सभी योद्धाओं को संबोधित करते हुए कहा कि ध्यान रहे ये ड्रैगन पृथ्वी, आकाश और जल, तीनों जगह विचरण कर पाने में सक्षम हैं । हमें भी पाने अपने वाहनों का चुनाव इस प्रकार करना होगा कि हम हर सतह पर इनसे मुकाबला कर पाएँ । आप अपने वहाँ के तौर पर किसी भी जलचर, नभचर या थलचर को चुन सकते हो । आवश्यकता के हिसाब से वाहन बदले भी जा सकते हैं । ध्यान रहे हमारा एक भी दुश्मन बच न पाए । अब आप अपने लिए वाहन का आह्वान कर सकते हो । सभी योद्धा आँखें बंद करके अपनी अपनी पसंद के वाहन को मानसिक संदेश भेजने लगे । 

शेर, चीते, हाथी, भेड़िये जैसे जंगली जानवर, बैल , घोड़े, ऊंट, भैंसे जैसे पालतू पशु, गरुड, चील, मोर, सारस जैसे पक्षी और वहेल, शार्क, मगरमच्छ जैसे जलचर सभी को मानसिक संदेश भेजे गए । पृथ्वी को बचाने के लिए सभी इस युद्ध में भाग लेने के लिए अपने अपने स्थान से युद्धभूमि की ओर चल दिए । कुछ ही घंटों में पाँच हजार योद्धा और भोरम देव अपने अपने वाहन  से सुसज्जित दिखाई देने लगे ।  

राजगुरु ने युद्ध की घोषणा करते हुए प्रकाश के यंत्र को प्रकाशित कर दिया । और शंख नाद से युद्ध आरंभ की घोषणा कर दी । प्रकाश और शंख नाद ने ड्रैगनों को आकर्षित किया और वो अपनी कन्दरा से बाहर निकाल आए । सामने विशाल जन समूह को देख उन्होंने आक्रमण कर दिया । अब धरती, आकाश और जल, सभी जगह घनघोर युद्ध शुरू हो गया । ड्रैगन आग के गोले बरसा रहे थे । अपने बड़े बड़े पंजों से पर्वत और चट्टानों को भोरम देव की सेना पर बरसा रहे थे । लेकिन भोरम देव और उसके योद्धा बड़ी चतुराई से एक एक करके उनका सफाया करने में लगे थे । 

आकाश मिट्टी और धुएँ से भर चुका था । सैंकड़ों बड़े बड़े गड्ढों ने धरती को छलनी कर दिया था । जलते हुए जंगल और टूटी फूटी चट्टानें बड़ा ही भयानक दृश्य उत्पन्न कर रही हैं ।  बड़ी भयंकर मारकाट मची है । पाँच हजार योद्धाओं के साथ भोरम देव बड़ी बहादुरी के साथ ड्रैगनों का सफाया करने में जुट जाते हैं । लेकिन ड्रैगन भी कुछ कम नहीं हैं । भोरम देव के दिव्य सिपाही भी उनका कुछ ज्यादा बिगाड़ पाने में सफल नहीं हो पा रहे ।  

भोरमदेव का वाहन गरुड आकाश में डगमगाता हुआ उड़ता है । पाँच हज़ार युवा योद्धा उसके साथ उड़ रहे हैं—लेकिन उनके चारों ओर दर्जनों ड्रैगन टूटते पहाड़ों की तरह गिर रहे हैं। अचानक एक ड्रैगन दहाड़ता है—एक ही वार में वह बीस योद्धाओं को गिरा देता है।धातु, आग और चीखें— हवा में बिखर जाती हैं । भूमि पर — हर प्रजाति गिर रही है । भेड़िए, बाघ, गैंडे, गरुड़, नाग, मानव सैनिक—सब मिलकर भी ड्रैगनों को रोक नहीं पा रहे ।एक विशालकाय ड्रैगन पंजा मारता है—तीस योद्धा एक ही वार में उड़ जाते हैं । उन्नत तकनीक भी विफल साबित हो रही है । तीन योद्धा एक साथ ड्रैगन पर आक्रमण करते हैं । सूर्य मणि से उत्पन्न लेसर किरणें भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती । एक खरोंच तक नहीं लगती ।

एक ड्रैगन झपटता है—योद्धा के वाहन चील को मुँह में जकड़ लेता है— कड़कड़ाहट!!! उसके पंख चबाकर निगल लिये जाते हैं । ये देख कर भोरमदेव की पीड़ा-भरी गर्जना । भोरमदेव गदा घुमाते हैं—तेज प्रकाश चमकता है—पर ड्रैगन पर कोई असर नहीं। ड्रैगन नीली अग्नि छोड़ता है—बारह युवा योद्धा बड़ी मुश्किल से उन आग की लपटों से बच पाते हैं । भोरमदेव क्रोध में उस ड्रैगन पर हमला करता है और उसे नष्ट कर देता है । 

उधर राजगुरु अपने योद्धाओं की दशा देख कर थोड़े भयभीत हैं । वो पर्वत की ऊँची चोटी पर मंत्र का जाप कर रहे हैं—उनकी आँखों में पहली बार डर है और वो असमंजस की स्थिति में हैं  । 

राजा पारसधर, राजगुरु, रानी नागमणि परस्पर विचार विमर्श करते हैं । वे ड्रैगनों की बढ़ती ताकत से चिंतित दिखाई दे रहे हैं । राजा बताते हैं कि हमारी सारी शक्तियां बेकार साबित हो रही हैं । जीतने ड्रैगन नष्ट होते हैं, उससे अधिक पैदा हो जाते हैं । अब तो कोई ऐसा चाहिए जो इनको एक ही वार से खत्म कर दे । वो राजगुरु से निवेदन करते हैं कि अब एक ही रास्ता बचा है “अंतिम अस्त्र” को जागृत करने का ।  राजगुरु कहते हैं कि अंतिम अस्त्र को सिर्फ उसी हालात में जागृत किया जा सकता है जब और कोई रास्ता न बचा हो । रानी नागमती तर्क देती हैं कि अब और युवाओं की बलि नहीं दी जा सकती । पूरी पृथ्वी वीरान होने की कगार पर है । अगर अब हमने अंतिम अस्त्र को जागृत नहीं किया तो कब करेंगे । रानी का तर्क सुन कर सभी योद्धा, सभी ऋषि, सभी वैज्ञानिक और विद्वान भी निवेदन करते हैं । सभी का आग्रह सुन राजगुरु अंतिम अस्त्र को जागृत करने की अनुमति प्रदान कर देते हैं । वे भोरम देव को आदेश देते हैं कि जाओ और जाकर अंतिम अस्त्र “रक्षेय” को जागृत करने के लिया गर्भगृह के भीतर जाकर यज्ञ आरंभ करो । कल सुबह हम सब भी वहाँ आकर उनका आह्वान करेंगे और उनसे प्रार्थना करेंगे कि संकट की इस घड़ी में वे हमारी तथा पृथ्वी की रक्षा करें । भोरम देव सिर झुक कर वहाँ से चल देते हैं । 

भोरम देव रहस्यमयी महल के शिव मंदिर के गर्भगृह में पहुंचते हैं । पुजारी द्वार खोल कर उन्हें अंदर भेज देता है और फिर द्वार को बंद कर देता है । अंदर जाकर भोरम देव यज्ञ प्रारंभ कर देते हैं । उनके सामने एक विशाल प्रतिमा है । जो दिखने में नृसिंघ अवतार जैसी है । जिसकी मुख मुद्रा बड़ी भयंकर प्रतीत होती है ।  

अगली सुबह — ‘अंतिम निनाद’ की ध्वनि । एक विराट घंटा तीन बार गूँजता है । मानो ब्रह्मांड को चेतावनी दी जा रही हो—अंतिम युद्ध शुरू हो गया है। रहस्यमयी महल के उत्तर पूर्व कोने में बने शिव मंदिर के गर्भगृह के सामने सब हाथ जोड़े आदर की मुद्रा में खड़े हैं ।  

पुरोहित एक विशाल पत्थर गोला गर्भगृह में धकेलता है । धरती कांप उठती है । पवित्र झील के नीचे से एक प्राचीन राजनगरी उठने लगती है, चमत्कारिक तकनीक से सुसज्जित ।  झील का जल नीचे की कक्षाओं में समा जाता है । मुख्य द्वार गर्जना के साथ खुलता है । युद्ध-देव प्रकट होते हैं । राजा पारसधर एक विशाल बाग पर सवार हैं । रानी नागमती एक उड़ते हुए रथ पर सवार है । भैरव नाग एक विशाल भेड़िये पर आरूढ़ हैं । इसी प्रकार सभी गणमान्य योद्धा अपने अपने वाहनों पर सवार होकर अंतिम अस्त्र को जागृत करने के लिए जोर जोर से मंत्रों से उसका आह्वान कर रहे हैं । प्रत्येक मंत्र के उच्चारण से वातावरण बोझिल होता जा रहा है । मंत्रों के उच्चारण की गति तीव्र होती जा रही है । ध्वनि का आवेग भी जोश भरा होता जा रहा है । लगभग एक घंटे के बाद बड़ी जोर से बिजली कड़कड़ाती है और बादलों का भयंकर गर्जन सुनाई देता है । जोर की एक गड़गड़ाहट के साथ गर्भ गृह का भीतरी द्वार खुलने की आवाज आती है और भीतर से एक दैत्याकार प्राणी प्रकट होता है । 

चालीस हाथियों जितना ऊँचा । सिंह-सा चेहरा । अंगारों-सी आँखें । लंबी जटाएँ । पर्वत-सी भुजाएँ । वानर जैसे पंजे । गर्जनकारी खुर । सीधा चलता—अलौकिक । एक महागज भी उसकी टांग तक नहीं पहुँचता । उसकी गर्जना धरती हिला देती है । भोरम देव उसकी पीठ पर सवार हैं । इस समय उस प्राणी की आँखें अंगारों जैसी धधक रही हैं । 

भोरम देव जोशीली आवाज में सब युवा योद्धाओं को संबोधित करते हुए कहते हैं “ये अंतिम युद्ध है । आज कोई पीछे नहीं हटेगा । आज रक्षेय हमारे साथ है जिसकी मार से कोई ड्रैगन नहीं बचेगा । पृथ्वी का हर शत्रु आज राख बन जाएगा । वो विचित्र प्राणी रक्षेय एक गर्जना के साथ भोरम देव की हाँ में हाँ मिलाता हुआ प्रतीत होता है । 

भोरम देव के नेतृत्व में सारी सेना ड्रैगनों के निवास स्थान उस धूमकेतु की तरफ चल पड़ती है । और फिर शुरू होता है महा भयंकर युद्ध । आकाश राख से भरा है। ड्रैगनों की चीखें आसमान को फाड़ रही हैं । धरती युद्ध की आग में जल रही है । घने धुएँ के बीच एक विराट छाया युद्धभूमि पर उतरती है…वह है—रक्षेय । सदियों की तपस्या और विज्ञान… आज एक रूप में एकजुट खड़े हैं—रक्षेय ! यानि रक्षक । 

रक्षे गर्जना करता है—मानो जलता हुआ पर्वत फट पड़ा हो । भोरामदेव चमकते दंड को उठाता है। उसके भीतर दो शक्तियाँ धड़क रही हैं—पारसमणि और नागमणि । आज यही दो रत्न ड्रैगनों का अंत लिखेंगे!

हर दिशा से ड्रैगन टूट पड़ते हैं। रक्षेय ज्वालामुखी की तरह दहाड़ते हुए धावा बोलता है । गिरे हुए ड्रैगन फिर उठ खड़े होते हैं । उनके माथे का नीला चिह्न—अंधकार को सोखकर उन्हें पुनर्जीवित कर देता है । उनका चिह्न… यही उनकी पुनर्जन्म शक्ति है!

भोरामदेव चिह्नों पर संयुक्त किरण छोड़ता है । कुछ नहीं होता। ड्रैगन हँसते हैं—और और भी शक्तिशाली हो जाते हैं ।

तभी भोरम देव के पास आते हुए नागमती ने कहा “माथे पर मत वार करो! उन्हें अंदर से नष्ट करो! ड्रैगन के मुँह में छलांग लगाओ और किरण सीधा उसकी तालु पर छोड़ो” । 

“माता… आपका आदेश ही मेरा साहस है” । भोरम देव ने कहा । 

एक विशाल ड्रैगन नीचे झपटता है । रक्षेय उसकी गर्दन पकड़कर जकड़ लेता है । भोरमदेव सीधा उसके मुँह में कूद जाता है—किरण तालु पर लगते ही—

धड़ाम!!! चिह्न भीतर से फट पड़ता है। ड्रैगन राख बन जाता है। एक-एक कर ड्रैगन गिरने लगते हैं। आशा लौट आती है।

लेकिन धूमकेतु-ग्रह से… नए ड्रैगन प्रकट होते रहते हैं। असंख्य। अनंत ।

तब भोरम देव ने रक्षेय से कहा “रक्षे! अपनी सम्पूर्ण शक्ति जागृत करो । धरती में पाँव रोपकर, धूमकेतु को पीछे धकेलो । जब तक ये नष्ट नहीं होगा, ये ड्रैगन भी नष्ट नहीं होंगे । 

रक्षेय ने धूमकेतु पर धावा बोल दिया । सभी योद्धा भी उसके पीछे पीछे धूमकेतु पर आक्रमण करने में लग गए । जैसे ही धूमकेतु पर आक्रमण हुआ, ड्रैगन घबरा गए और एक एक करके मारे जाने लगे । 

भोरम देव को लिए लिए रक्षेय धूमकेतु की भीतर जा पहुंचा । अपने तिलस्मी प्रहारों से धूमकेतु की दीवारों को विदीर्ण कर दिया । थोड़ी ही देर में धूमकेतु बर्बाद हो चुका था । जिस बिन्दु से ड्रैगनों को ताकत मिलती थी, वो भी नष्ट कर दिया गया । 

फिर आखिरी प्रहार करके भोरम देव, रक्षेय और सभी योद्धा धूमकेतु से बाहर आ गए । ड्रैगन लगभग खत्म हो चुके थे । उनका निवास स्थान और शक्ति प्रदाता धूमकेतु भी विस्फोटित होने वाला था । 

फिर एक जोर का धमाका हुआ और धूमकेतु फट गया । सब रो पड़ते हैं । खुशी में दहाड़ते हैं ।  धूमकेतु के चार टुकड़े—चार भयावह ड्रैगन लिए हुए—धरती पर गिरते हैं । ड्रैगनों के आतंक का सफाया हो चुका था । भोरम देव ने माता नागमती, पिता पारसधर और सभी गुरुजनों को प्रणाम किया । सबने उसे आशीष दिए । और उसे पृथ्वी के रक्षक की उपाधि प्रदान की । रक्षेय वापिस अपने स्थान पर जा चुका था ।

 

काफी दिनों की यातनाएँ झेलने के बाद प्रजा के चेहरों पर भी खुशी थी ।  लेकिन सभी इस बात से अनजान थे कि धूमकेतु के मलबे में अभी एक ड्रैगन जीवित था और और छुप कर वो इन सबको देख रहा था । 

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