ईश्वर का चुना हुआ व्यक्ती वह व्यक्ति होता है। जीसके पुर्वजों ने अपने पुरे जीवन काल में ईश्वर की भक्ति कि सत्य के मार्ग पर चलकर धर्म का पालन किया लेकिन वै कभी नकारात्मकता कि बेड़ियों से गुलामी कि जंजीरों से खुद को आजाद नहीं करा पाएं। और अपने अमीर बनने का सपना कभी पूरा नहीं कर पाएं और मृत्यु के समय अपनी अधुरी इच्छाओं को धरती पर छोड़कर मुक्त हो गये। लेकिन वै परमात्मा के सामने अपनी चाहत रखते हैं कि उनकी ब्लड लाइन में कोई ऐसा हो जो भक्ति मार्ग के माध्यम से सत्य के मार्ग पर चलकर धर्म का पालन करते हुए लोगों कि भलाई करते हुए अपने पुर्वजों कि अधुरी इच्छाओं की पूर्ति करें। उनके सपनों को पूरा करें। मेरे पुर्वजों के बाद मेरे दादा-दादी और नाना-नानी का समय आया लेकिन वै लोग भी गुलामी और नकारात्मकता कि वजह से सत्य के मार्ग पर चलकर धर्म का पालन करते हुए अपने कार्यों को करते गये। फिर मेरे पिता और माता का समय आया मेरे पिता के पांच भाई और दो बहनें थीं। मेरे पिता और एक बुआ घर में बढ़े थे। और उस समय भारत भी अंग्रेजी हुकूमत का गुलाम था। साथ ही दादा-दादी नाना-नानी भी जमींदारों के गुलाम ही थे। और गुलामी के चलते लोगों कि नकारात्मकता के चलते अपने जीवन में कोई सकारात्मक परिवर्तन ला नहीं पाएं। दादा-दादी नाना-नानी भक्ति मार्ग पर चलकर धर्म का पालन करते थे। साथ ही लोगों का भला करते हुए अपने जीवन को व्यतित करतें थे। दादा-दादी के घर मेरे पिता का जन्म हुआ। और नाना-नानी के घर मेरी माता का जन्म हुआ। मेरी माता कि दो बहनें और तीन भाई थे। कुल छः भाई-बहन थे। और पिता के पांच भाई और दो बहनें थीं। मेरी माता घर में सबसे छोटी थी। इसलिए नाना-नानी मेरी मां से घर का रसोई का कोई भी काम करवातें नहीं थें। और मां ने भी घर का कोई काम कभी सीखा भी नहीं था। मेरे नाना नानी कि आर्थिक स्थिति थोड़ी मजबूत थी। जमींदारों कि हुकुमतों के बावजूद भी मेरे नाना-नानी कि आर्थिक स्थिति थोड़ी अच्छी थीं। क्योंकि वै ईमानदारी से मेहनत करते मजदूरी करते थे। साथ ही भगवान कि भक्ति करते हुए धर्म का पालन करते हुए अपने जीवन को व्यतित करतें थे। इसलिए परमात्मा कि थोड़ी मेहर थी। ईधर मेरे दादा दादी भी गुलामी कि जंजीरों में नकारात्मकता कि बेड़ियों में बंधकर ईश्वर कि भक्ति करते हुए अपने जीवन को व्यतित कर रहे थे। मेरे पिता घर में सभी भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। तो दादा-दादी ने काम कमाई करने के लिए पिता को भी अपने साथ काम करवाने लगे। क्योंकि उस समय खाने पीने कि बराबर व्यवस्था हो नहीं पातीं थीं। और खाने वाले ज्यादा थे। इसलिए किसान उतना ही अनाज देता था। जितने कि मजदुरी करते थे। मतलब बस ऐसे ही दिन बितते जा रहें थे। और दोनों परिवार में बच्चे बड़े होते जा रहे थे। फिर नाना-नानी ने अपनी दोनों बड़ी बेटीयों कि और दो बड़े भाईयों कि शादी कर दी। मेरी दोनों मोसी को शादी के बाद ससुराल खेती-बाड़ी वाले मिले थे। और भाइयों के ससुराल वाले भी खेती-बाड़ी वाले ही थें। तों नाना-नानी ने सोचा कि मेरी मां को भी कोई ऐसा ही परिवार मिल जाए। लेकिन मेरी मां के नसीब में भगवान ने मेहनत और कर्म करना लिख दिया। और अपने कर्मों से ही अपने सपनों का महल बनाना लिख दिया। मेरी मां के मामाओं ने नाना-नानी से कहा कि उन्होंने मेरी मां कि शादी के लिए एक लड़के कि बात आई है। जो इकलौता लड़का है। और घर में खेती बाड़ी रुपया पैसा जैवरातों से भरा पुरा घर है। तों नाना-नानी खुश हो गए कि चलो मेरी छोटी लड़की को भी अच्छा ससुराल मिल जाएगा। और सुख शांति से अपना जीवन व्यतीत करेंगी। लेकिन जो बात मां के मामाओं को पता चलीं थी। वह किसी और लड़के के बारे में थीं। जिसकी शादी हो चुकी थी। लेकिन जिसने यह बात मेरी मां के मामाओं को बताई थी। उस व्यक्ति ने मेरे पिता के बारे में झुट बोलते हुए कहा था कि यही वह लड़का है। जो इकलौता है। जिसके घर खेती-बाड़ी और खुब सारा रुपया पैसा धन दौलत है।