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Shiv mahapuran

🙏🙏🙏मोक्ष दायिनी "शिव महापुराण" एक परिचय 🙏🙏🙏

हरि अनंत हरि कथा अनंता, कहानी सुनई केही विधि सब संता ।

ईश्वर का स्वरूप, विस्तार, व्यापकता, अनंत है और उनकी कथाएं भी अनंत है । जिन्हें ऋषि -मुनियों, सतो, साधुओं व विद्वानों तथा विशेषज्ञों ने इसे अपने-अपने विचारों से विभिन्न अवसरों पर कही है ।

अनंत विस्तारित ब्रह्मांड (यूनिवर्स) में अनगिनत निहारिकाएं ( गेलेक्सी) है और प्रत्येक निहारिका में अनगिनत तारे (नक्षत्र ) है, प्रत्येक तारे के साथ उनका एक परिवार होता है, जिसमें नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह, उल्का- पिण्ड वह अन्य आकाशीय संरचनाएं सम्मिलित होती है।सभी आकाशीय पिंड ब्रह्मांड में अपनी धूरी पर व अपने परिवार के मुखिया के चारों और परिक्रमण और परिभ्रमण निर्धारित गति एवं पथ (अंडाकार) पर लगातार कर रहे हैं ।

सूर्य एक नक्षत्र है, जिसके परिवार में आठ ग्रह , अनेक उपग्रह तथा अन्य आकाशीय पिंड है । सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं , पृथ्वी सूर्य के चारों ओर 365 दिन में एक चक्कर पूरा करती है, एवं चंद्रमा, जो पृथ्वी का उपग्रह है, वह साढ़े 27 दिन में पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करता है , जिससे महीने और वर्ष की गणना होती है । इसी से पंचांग का निर्माण होता है।

एक परिकल्पित काल गणना अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग 460करोड़ वर्ष पूर्व हुई थी , किंतु पृथ्वी पर मानव का जन्म 10000 वर्ष पूर्व हुआ है, सनातन धर्म दुनिया का सबसे प्राचीन धर्म है। यह लगभग 9000 से 12000 वर्ष पूराना है । सनातन का अर्थ शास्वत या सदा बना रहने वला होता है, जिसका आदि है न अंत है। नेपाल , भारत, मॉरीशस, सूरीनाम, फीजी आदि देशों में इस धर्म के अनुयाई बहुसंख्यक मात्रा में पाए जाते हैं।

हिंदू धर्म ग्रंथो के अनुसार ब्रह्माजी का एक दिन (दिन रात) दो कल्प (864 करोड़ मानव वर्ष) के बराबर होता है । इस तरह सृष्टि की कुल आयु अभी तक 432 करोड़ वर्ष मानी गई है। एक दिव्य वर्ष मनुष्य के 360 वर्ष के बराबर होता है। ब्रह्मा जी के एक कल्प में 14 मनु जन्म लेते हैं। प्रहर, दिन, रात, सप्ताह, पक्ष, अयन, संवत्सर, दिव्य वर्ष, मन्वंतर, युग, कल्प, आदि इकाइयां ब्रह्मा जी की काल गणना की इकाइयां है।

सनातन धर्म के धर्म ग्रंथो में दो प्रकार के ग्रंथ वेद (श्रुति) 'जो कहा गया है' और स्मृति 'जो याद किया गया है ' होते हैं। वेद चार है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद । वेद की रिचाओं ( छंदों) में देवी देवताओं की प्रार्थना, स्तुतियां गई है ‌। पुराण 18 होते हैं। इसी प्रकार शास्त्र 6, उपनिषद, श्रीमद् भगवत, भगवत गीता, रामायण, महाभारत, संहिताएं आदि तथा इनके आधार पर संस्कृत व हिंदी में लिखे गए कई ग्रंथों में सनातन धर्म की कथाओं का समायोजन किया गया है

18 पुराणों में चौथा पुराण शिव पुराण या शिव महापुराण है, जिसकी रचना वेदव्यास जी ने सनत कुमार ऋषि के कहने पर संस्कृत भाषा में की है , शिव भक्ति विषय पर लिखित इस ग्रंथ में 100000 श्लोक थे, जिन्हें 24000 पर सारांशीकरण किया गया है, शिव पुराण में विद्येश्वर संहिता, रुद्र संहिता, सत रूद्र संहिता, कोटी रूद्र संहिता, उमा संहिता, कैलाश संहिता व वायु संहिता इन सात संहिताओं में भगवान शिव की महिमा का गुणगान किया गया है शिव पुराण सभी पुराणों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुराण है इसमें शिव का विविध रूपों, अवतारों, ज्योतिर्लिंगों, शक्ति पीठों, भक्तों और भक्ति का विषद वर्णन मिलता है । शिव के कल्याणकारी स्वरूप का तात्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासना का वर्णन है ।

शिव पुराण में शिव को पंचदेवों (सूर्य, गणेश, शिव, विष्णु और दुर्गा) जिन्हें क्रमशः आकाश, जल, पृथ्वी, वायु और अग्नि का प्रतीक माना गया है , में प्रधान , अनादि ,सिद्ध, परमेश्वर के रूप में शिव को स्वीकार किया गया है।

शिव पुराण मानव प्रकृति को चेतना के चरम तक ले जाने वाला सर्वोच्च विज्ञान है। शिव पुराण की कहानियों पर ध्यान दें तो आप इनमें सापेक्षता का सिद्धांत, क्वांटम मेकैनिज्म तथा भौतिक विज्ञान के अन्य सिद्धांतों को कहानियों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है । इसमें वेदांत, विज्ञान तथा निष्काम धर्म का उल्लेख है।

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों पुरुषार्थ प्रदान करने वाला यह शिव पुराण श्रेष्ठ मंत्र समूहों का संकलन है ।

शौनक मुनि द्वारा पुराणों की कथाओं का सार तत्व संबंधी प्रश्न महर्षि व्यास के शिष्य लोम हर्षण सूतजी से पूछते हैं । कलियुग के के सभी तामसी जीवों के अंत:करण किस प्रकार शुद्ध हो? से कथा का प्रारंभ होती है।

शिव पुराण संपूर्ण शास्त्रों के सिद्धांत से सपन्न, भक्ति और प्रेम बढ़ाने वाला एवं शिव को संतुष्ट करने वाला साधन है। यह कानों के लिए रसायन अमृत स्वरूप एवं दिव्य है । भक्ति,ज्ञान और वैराग्य संपन्न होकर बड़े आदर से इसका श्रवण करें ।

शिवपुराण के प्रथम भाग विद्येश्वर संहिता में शिवपुराण का का परिचय, साध्य- साधन का विचार तथा श्रवण,कीर्तन और मनन की श्रेष्ठता का प्रतिपादन, महेश्वर का ब्रह्मा और विष्णु को अपने निष्फल और सकल स्वरुप का परिचय देते हुए लिंग पूजन का महत्व बताया गया। शिवापराण में शिव महिमा, लीला- कथाओं के अतिरिक्त पूजा पद्धति ,ज्ञानप्रद आख्यान , शिक्षाप्रद कथाओं का संयोजन है।

भगवान शिव के लिंग एवं साकार विग्रह की पूजा के रहस्य तथा महत्व पांच कृत्यों का प्रतिपादन सृष्टि (निर्माण ),स्थिति (संरक्षण ),लय(विनाश) तिरोभाव (छिपाना या पुनर्जीवित करना) और अनुग्रह (मोक्ष प्रदान करना) किया गया है।

विदेश्वर संहिता में रुद्राक्ष और दान का महत्व बताया गया है। शिव के विभिन्न रूप अवतार (महाकाल, तार, बाल भुवनेश षोडसश्री, विद्येश, भैरव ,छिन्नमस्तक, धूमवान, बगलामुख, मातंग और कमल।) व 12 ज्योतिर्लिंग सौराष्ट्र (सोमनाथ), श्री सेल (मल्लिकार्जुन), उज्जैन (महाकालेश्वर), हिमालय (केदारनाथ), डाकिनी (भीमशंकर ), काशी (विश्वनाथ) गोमती तट पर (त्रंबकेश्वर), चिता भमि (बैद्यनाथ), सेतुबंध (रामेश्वरम ), दारुण वन (नागेश्वर) और शिवालय में (घुश्मेश्वर ) का पावन चरित्र का वर्णन किया गया है।

महर्षि कश्पय व सुरभि के पुत्र के रूप में 11 रूद्र (कपाली, पिंगला, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता,अजपाद, अहीरभुदन्य, संभू, चद्र और भव )की महिमा का वर्णन भी शिव पुराण में उपलब्ध है ।

शिव और सती का विवाह, शिव का रोद्र रूप -वीरभद्र, भगवती तुलसी की कथा, कुबेर का अहंकार, तपस्या का फल, समुद्र मंथन, विषपान,गंगा को जटाओं मे समाहित कर लेना, विष्णु का सुदर्शन चक्र, रामजी व शंकरजी का युद्ध, हनुमान जी का अवतार , रावण जन्म, अर्जुन को पाशुपत अस्त्र, केतकी का पुष्प ,चंद्रमा को शाप मुक्ति, गृहप्रत्यावतार, शिव का रहन-सहन, विवाह ,पुत्रों की उत्पत्ति, मोक्षदायक पूण्य क्षैत्रो का वर्णन, सप्तपुरियां, सप्तसागर, कालावधि अनुसार शुभ पर्वों पर विभिन्न नदियों मे व विभिन्न तीर्थ स्थानों में स्नान, दान का वर्णन,सदाचार, शोचाचार, स्नान, भस्म धारण, संध्या वंदन, प्रणव (ओम) जप, गायत्री मंत्र जप, दान धनोर्पाजन ,अग्निहोत्र की विधि एवं महिमा का वर्णन। यज्ञ (अग्नि यज्ञ, देव यज्ञ व ब्रह्म यज्ञ) का वर्णन , 7 वारों का निर्माण व उनमें देव आराधना से फलों की प्राप्ति, देश, काल, पात्र, और दान आदि का महत्व; देव प्रतिमा पूजन विधि एवं महत्व षडलिंग स्वरूप प्रणव का महत्व उसके सूक्ष्म रूप औंकार तथा स्थूल रूप पंचाक्षर मंत्र (नमः: शिवाय )का विवेचन, जप विधि की महिमा, वेधन और मोक्ष, पार्थिव लिंग का निर्माण, विधि और वेद मंत्रों से पूजन आदि का सुंदरतम वर्णन शिवपुराण में पढ़ा जा सकता है ।पूजन सामग्री में विशेष बिल्वपत्र, बिल्वफल ,धतूरा आदि का अर्पण, पूजन विधि (षोडशोपचार) व शुभ फल प्राप्ति को समझाया गया है।

रुद्र संहिता में सृष्टि खंड, सती खंड पार्वती खंड, कुमार खंड, युद्ध खंड है जिनमें नारद मोह प्रसंग, दक्ष पुत्री ,सती विवाह, हिमालय पुत्री पार्वती विवाह, की मनोहर कथाओं का सुंदर वर्णन है शिव के जीवन चरित्र, गणेश आदि पुत्रों का जन्म, पृथ्वी की परिक्रमा, शंखचूड़ से युद्ध, शिव से आद्या शक्ति माया व ब्रह्मा- विष्णु की उत्पत्ति, की कथा का वर्णन है । शतरुद्रसंहिता में शिव के अन्य चरित्र हनुमान, श्वेत मुख, ऋषभदेव, अर्धनारिश्वर, अष्ट मूर्ति व पंचमहाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) तत्व, ईशान (सूर्य), महादेव (चंद्र), क्षेत्रज्ञ (जीव) का सुंदर चित्रण किया गया है ।

कोटी रूद्र संहिता में 12 ज्योतिर्लिंगों का वर्णन है ।

उमा संहिता में देवी पार्वती के अद्भुत स्वरूप का चित्रण और अर्धनारीश्वर स्वरूप के महत्व का वर्णन किया गया है।

कैलाश सहिता मैं औंकार का महत्व, योग का विशाल विस्तार, विधिपूर्वक शिव आराधना का वर्णन है।

वायु संहिता में पाशुपत विज्ञान ,मोक्ष के लिए शिव ज्ञान की प्रधानता , शिव के सगुण और निर्गुण स्वरुप का वर्णन पढ़ा जा सकता है‌।

शिव को आशुतोष भी कहते हैं, जिसका अर्थ शिघ्र प्रसन्न व शिघ्र क्रोध करने वाले होता है। कैलाश पर निवास करने वाले भगवान शिव की कृपा सभी को प्राप्त हो और सकल विश्व का कल्याण हो।

जानकारी संकलन - नन्द किशोर धनोतिया

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