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Poetry

रफीक बन के मिले चोट लगाने वाले

शुक्रिया नींद से मुझको जगाने वाले

जल जलके कतरे मेरे सब राख हुए

आये बड़े देर से है आग बुझाने वाले

मुफ़्लसी देखके अब लोग बहुत हस्ते है

बड़े बेदर्द है ये आज जमाने वाले

हमने तो मांगा हाथों का सहारा उनका

लो आ गए मुझको कांधो पे उठाने वाले

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