
रफीक बन के मिले चोट लगाने वाले
शुक्रिया नींद से मुझको जगाने वाले
जल जलके कतरे मेरे सब राख हुए
आये बड़े देर से है आग बुझाने वाले
मुफ़्लसी देखके अब लोग बहुत हस्ते है
बड़े बेदर्द है ये आज जमाने वाले
हमने तो मांगा हाथों का सहारा उनका
लो आ गए मुझको कांधो पे उठाने वाले