
1- 🌹 मेरे हमसफ़र,🌹
कुछ अल्फ़ाज़ हैं जो दिल में दबे हैं,
कुछ आंसू हैं जो अब तक रुके हैं।
इसलिए सोचा, आज लफ़्ज़ों से बात कर लूं —
शायद तुम्हें मेरी ख़ामोशी सुनाई दे जाए।
🌹❤️🌹
तुम्हें देखा, तो सब कुछ रुक सा गया,
दिल ने कहा — यही है, और कुछ ना रहा।
वो साथ, वो वादे, वो सब कुछ जो था,
क्या सब यूँ ही था... या मैं ही अकेली बहा?
🌹❤️🌹
बीमारी में, मजबूरी में घर छोड़ दिया,
पर तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ा था।
कहा था तुमने — “बस बुलाओ, मैं आ जाऊँगा,”
पर आवाज़ दी... और सन्नाटा रह गया।
🌹❤️🌹
धीरे-धीरे बातों का रंग फीका पड़ा,
तुम्हारे नंबर पर अब बस खामोशी चढ़ा।
न कोई जवाब, न कोई सवाल,
बस मेरी तन्हाई करती रही बेहाल।
🌹❤️🌹
और फिर आया वो कागज़ एक दिन,
जिसने हमारी कहानी को तोड़ दिया बिन कहे।
तलाक... बस एक शब्द, पर उसमें दफन हो गया सब कुछ —
प्यार, वादा, और मेरी उम्मीदें।
🌹❤️🌹
तुमने कहा था — "हम एक रूह हैं अब",
तो कैसे एक रूह दूसरी को तन्हा कर दे?
क्या तुम्हें वाकई कुछ भी महसूस नहीं हुआ?
या मैं ही कुछ ज़्यादा जुड़ गई थी इस रिश्ते से?
🌹❤️🌹
अब भी दुआओं में तेरा नाम आता है,
मगर अब आँखों के पानी में बह जाता है।
मैं नाराज़ नहीं, बस टूटी हुई हूँ —
जैसे अधूरी कोई दुआ रह गई हूँ।
🌹❤️🌹
शायद ये अल्फ़ाज़ तुम्हें छू जाएँ,
या शायद यूँ ही कहीं खो जाएँ।
पर जो भी हो, इतना जान लेना —
मैंने तुम्हें आज भी दिल से रिहा नहीं किया।
— वो, जो कभी सिर्फ तुम्हारी थी।
Dr surak selvi chinnappan
2 - 🌹 हमसफ़र 🌹(1)
✍️ डॉ. सुरक सेल्वी चिन्नप्पन
रास्ते लम्बे थे, सफ़र अकेला था,
फिर तुम मिले — और मंज़िल का सिलसिला बना।
तेरे साथ चलने में सुकून मिलता है,
हर मोड़ पे लगता है — कोई अपना मिलता है।
ना वादे ज़रूरी, ना कोई कसमें,
बस एहसास का रिश्ता है दिल की रसमें।
जब तू साथ होता है, दुनिया आसान लगती है,
तेरे बिना तो साँस भी अनजान लगती है।
हमसफ़र वो नहीं जो हर वक्त पास रहे,
वो है जो दिल में हमेशा साथ रहे।
जो समझे ख़ामोशी को भी बातों की तरह,
वो ही असली हमसफ़र है — रूह की तरह। 🌹
3 - 🌹हमसफ़र 🌹(2)
ना जाने क्यों मेरी हर बात,
तुम्हें इतनी प्यारी लगती है,
शब्दों में कुछ तो रूह सी होती,
जो दिल के पास ठहरती है।
सच में जो भी मैं लिख देती,
उसका असर तुम पर हो जाता,
हमसफ़र कोई संयोग नहीं,
ये रब का लिखा प्रसाद है।
दिल से जुदा, खूबसूरत रिश्ता,
प्यार का एहसास, भरोसे की बात,
ये Humsafar हर पल हमारे साथ,
जैसे रूहों का मिलना, चुपचाप साथ। ✍️
4 - 🌹खामोशी का बंधन🌹
पहली नज़र में कुछ अपना सा लगा,
जैसे जन्मों से बंधा सपना सा लगा।
नज़रें मिलीं तो रूह ने पहचाना,
दिल ने कहा — यही है ठिकाना।
बड़ों के आशीर्वाद से बंधा बंधन,
सात फेरे, सात वचन, एक जीवन।
सपनों के रंगों में सजी वो घड़ी,
ईश्वर के सम्मुख हुई एकता अड़ी।
वो कहता रहा — “सदा संग रहूँगा,
हर आँधी में तेरा सहारा बनूँगा।”
मैंने भी विश्वास से मन सौंप दिया,
उसके शब्दों को अपना धर्म मान लिया।
पर समय ने करवट कुछ ऐसी ली,
बीमारी आई, तकदीर बहा ले गई।
सोचा था वो हाथ थामे खड़ा रहेगा,
पर उसका मौन मेरे दिल को जला देगा।
मैं चाहती थी एक आवाज़, एक पुकार,
“मत जाओ, प्रिय, मैं हूँ तुम्हारे पास।”
पर चुप्पी ने जैसे दीवार बना दी,
रिश्ते की जड़ों में खामोशी खा गई।
मैंने भेजा तोहफ़ा, अपना प्यार,
न पहुँचा क्या उस तक — यही सवाल बार-बार।
सपनों का घर अधूरा रह गया,
वचन का दीपक बुझता रह गया।
धीरे-धीरे दूरी बढ़ती गई,
हर बात में खामोशी चुभती गई।
दिल पूछता रहा हर रोज़ यही,
क्या सच में वो था मेरे लिए सही?
रिश्ता टूटा तो घाव गहरा लगा,
मौन ने दिल को अकेला बना दिया।
जो हमसफ़र बना था जीवन का,
वही अनजान हो गया सफ़र का।
एसी क्या गलती थी मेरी जो खामोश हो गए तुम,
उम्र भर ख़याल रखोगे — सोचा, लेकिन हमारा ख़याल ही नहीं रहा तुम।
तुम्हारी यादें कहीं हमको पागल न बना दें,
दिल को पत्थर बनाकर न रहो — क्या हमारे साँस रुकने के बाद ही तुम्हारी ख़ामोशी टूटेगी?
अगर गलती हमारी है तो खुद बोलो, उसे सुधारना हमारा फ़र्ज़ है।
पर दोस्त, परिवार, समाज में हमारा मज़ाक मत बनाओ — यही हमारी विनती है।