जिंदगी की ठोकरों ने चैन से जीने ना दिया
आग लगी ठंडी हवा जब भी तुझे याद किया
यकी करना मेरा मुमकिन नही किसी पे कहीं
यकीन जीत कर ही उसने फ़िर बर्बाद किया
गम नही खोने का ये सोच के हैरान हूँ मैं
जिसपे सब छोड़ दिया उसने मुझे छोड़ दिया
गैर मतलब से तो कोई नहीं बनता अपना
बस इतना समझने था के जिस्म ने दम तोड़ दिया
नरेंद्र रघुवंशी