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"Ek chhoti si cheez jo mujhe roz khush karti hai"

56 साल की उम्र में आकर मैंने एक बात समझी है — खुशी हमेशा बड़ी वजहों से नहीं मिलती। कई बार वह बहुत छोटी चीज़ों में छिपी होती है, जिन्हें हम सालों तक सामान्य समझकर नज़रअंदाज़ करते रहते हैं।

मेरे लिए वह छोटी सी चीज़ है — सुबह की शांति।

अब मेरी सुबहें पहले जैसी भाग-दौड़ वाली नहीं रहीं। बच्चों की जिम्मेदारियाँ काफी हद तक बदल गईं, जीवन की रफ्तार भी कुछ धीमी हुई है। लेकिन सुबह जब मैं उठकर कुछ देर चुपचाप बैठती हूँ, हाथ में चाय होती है और आसपास हल्की खामोशी, तब एक अजीब सा सुकून महसूस होता है।

उन कुछ मिनटों में मुझे लगता है कि जीवन चाहे जैसा भी रहा हो — संघर्षों से भरा, जिम्मेदारियों से भरा, खुशियों और निराशाओं से भरा — फिर भी मैं यहाँ तक पहुँच गई हूँ।

पहले खुशी का मतलब कुछ हासिल करना लगता था। अब लगता है कि मन का शांत होना भी खुशी है।

मुझे रोज़ खुश करने वाली वह छोटी सी चीज़ यह एहसास भी है कि अब मैं हर बात पर जल्दी नहीं करती। हर समस्या को तुरंत हल करने की बेचैनी नहीं रहती। उम्र शायद यही सिखाती है कि हर चीज़ समय पर होती है।

कभी खिड़की से आती धूप, कभी पुराने गानों की आवाज़, कभी किसी अपने का फोन — ऐसी छोटी बातें अब पहले से ज़्यादा मायने रखती हैं।

मैंने जीवन में यह सीखा है कि उम्र बढ़ने के साथ खुशियाँ कम नहीं होतीं, बस उनका रूप बदल जाता है।

आज मुझे महंगी चीज़ें या बड़ी उपलब्धियाँ उतनी खुशी नहीं देतीं, जितनी एक शांत सुबह, अपनेपन भरी बातचीत या बिना वजह मन का हल्का महसूस होना देता है।

और शायद यही वजह है कि अब मैं मानती हूँ —

रोज़ खुश रहने के लिए ज़िंदगी में बहुत कुछ नहीं चाहिए, बस छोटी-छोटी बातों को महसूस करना आना चाहिए।

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