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deliberate practice का महत्व

जब मैंने पहली बार deliberate practice के बारे में समझा, तो मुझे एहसास हुआ कि मैं पहले सिर्फ मेहनत कर रहा था, लेकिन सही दिशा में नहीं। पहले मैं घंटों काम करता था, लेकिन दिन के अंत में लगता था कि कुछ खास सुधार नहीं हुआ। फिर मैंने एक छोटा सा बदलाव किया—मैंने हर दिन खुद से पूछना शुरू किया: “आज मैं किस एक चीज़ में बेहतर बन सकता हूँ?” बस यहीं से फर्क शुरू हुआ।

अब मैं बिना सोचे-समझे मेहनत नहीं करता, बल्कि हर दिन एक स्पष्ट लक्ष्य रखता हूँ। अगर पढ़ाई कर रहा हूँ तो किसी खास टॉपिक को गहराई से समझना, अगर कोई स्किल सीख रहा हूँ तो उसकी एक छोटी कमजोरी को सुधारना। मैंने ये भी नोटिस किया कि जब मैं अपनी गलतियों को नजरअंदाज करने के बजाय उन्हें पकड़कर ठीक करने लगता हूँ, तब असली ग्रोथ होती है।

एक और चीज़ जिसने मुझे बहुत बदला, वो था फीडबैक लेना। पहले मैं अपनी ही नजर में सही था, लेकिन जब मैंने दूसरों से सुझाव लेना शुरू किया, तो मुझे अपनी कमियाँ साफ दिखाई देने लगीं। अब मैं खुद की तुलना किसी और से नहीं करता, बल्कि सिर्फ अपने कल से करता हूँ—क्या मैं आज थोड़ा बेहतर हूँ?

धीरे-धीरे ये छोटी-छोटी आदतें मेरी पहचान बन गईं। आज मुझे समझ आता है कि असाधारण बनने के लिए कोई बड़ा जंप नहीं चाहिए होता, बल्कि रोज़ का छोटा सुधार ही आपको भीड़ से अलग खड़ा कर देता है।

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