
भटके हुये इन्सान को रास्ता जल्दी नही मिलता, या मैं कहता हूं कभी नही मिलता.
यह मेरी खुद अपनी कहानी है.
दिन वह थे जब मैं बरवी क्लास मे फैल हो गया था. बरवी मे सायंस लिया था. जिसकी भाषा इंग्लिश थी. और मैं मराठी मडीयम मे दसवी फर्स्ट क्लास था. अब आप समझ ही गये होंगे. क्या हस्र हूवा होगा उस विद्यार्थी का जो पास होने के लिए इंग्लिश को पढा होगा. और फर्स्ट क्लास पास होने के बाद अपने आप को टॅलेंटेड समजता होगा. पर जुनिअर कॉलेज मे इंग्लिश सर से बहती हुयी नदिया की तरह था.समझमे तो कुछ नही आ रहा था. पर पढाना जारी रखना था. इसी बीच भाई ने लैटर भेजा.... पुलिस भरती है. आना चाहो तो आ सकते हो. फैसला तुम्हारा है.
उस वक्त मेरी प्रॅक्टिकल परीक्षा चल रही थी. और इतनी जल्दी भी नही थी नौकरी करने की. मैं नही गया. परिणाम का पता नही था. पास होने की गॅरंटी नही थी. इस वक्त मेरी जागह कोई और होता तो पुलिस भरती को चुनता. मैने एक्साम को चुना. फेल हो गया. कोई दुःख नही था. पता था पास नही होऊंगा.
फिर बेकारी के दिन चल रहे थे.
सोचा कुछ काम करें.
गांव मे रोजगार हमी का काम सुरु हूवा था. मैं दोस्तो के साथ उस काम पर गया. मुझे तो कोई अनुभव नही था. एक दोस्त बोला -"यह तो बहुत कठीण काम है. ऐसा करते है... हम शहर चलते है.. वहा आसान काम मिलेगा.
हम वह काम छोडकर घर आ गये.
मैने कुछ कपडे सामान इकठ्ठा किया, बॅग मे भरा.
पिताजी ने पूछा - " कहा जा रहा है -"
मैने कोई जवाब नही दिया. पिताजी से अनबन चल रही थी. बात करने का तो सवाल ही नही था.
पिताजी कहते रहे... "कही जाने की कोई जरुरत नही..."
पर मैं मानूंगा तब ना!
मैं बॅग उठाकर शहर में चल पडा दोस्तो के साथ.
वहा जाकर हम ऐसी जगह उतरे जिसकी कल्पना भी नही की जा सकती.
वहा एक लडकी थी. वह हमारे दोस्त के दोस्त की rakhail थी.
वहा मेरा परिचय करावा दिया की मैं उसका भाई हूं. वह भी मान गई की मैं उसके भाई की तरह दिखता हूं.
रहने का ठिकाना हो गया. काम था इट गारे का, पच्छिस बैलो की मेहनत थी. रात को रेल पटरी के करीब एक दर्गा था.. वहा सोते थे. रेल ऐसे गुजरती थी मानो हमको रॉंदना चाहती हो. पर हम डागमगये नही.
पंधरा दिन नहाये नही.
फिर एक दोस्त ने हमारा हाल देखा.वह अपने घर ले गया. बकेट और साबुन दिया. पास की बावडी पर हम पुरा दिन नहाते और कपडे धोते रहे.
फिर उसी दोस्त ने खबर दि.
गर्डो की भरती है, मुंबई जाना है. चलना है तो चलो.
सेक्युरिटी गार्ड, सुना था. पढा था पर पता नही था, सेक्युरिटी गार्ड होता क्या है.
मैं तुरंत अपने घर गया, पिताजी से कहा ऐसी, ऐसी भरती है... नौकरी मिल रही है.. पैसा चाहिये..
पिताजी ने पैसो का इंतजाम किया और मैं मुंबई आ गया.