
उसने कभी ज़ोर से रोना नहीं सीखा,
क्योंकि बचपन से उसे बताया गया था कि
आँसू कमज़ोर लोगों की भाषा होते हैं।
सो उसने अपने सारे आँसू
दिल के किसी अँधेरे कमरे में बंद कर दिए।
साल बीतते गए।
चेहरे पर मुस्कानें बढ़ती गईं,
और भीतर का सन्नाटा भी।
लोग उसे सफल कहते थे,
क्योंकि उसके पास नौकरी थी,
कुछ पैसे थे,
कुछ पहचान थी।
पर किसी ने यह नहीं देखा कि
रात के आख़िरी पहर में,
जब सारी दुनिया सो जाती थी,
वह अपनी ही यादों के मलबे में बैठा
खुद को ढूँढ़ता रहता था।
उसे उन लोगों की कमी नहीं थी
जो चले गए,
दर्द तो उन लोगों का था
जो रहते हुए भी कभी उसके नहीं हुए।
वह हर रिश्ते में
थोड़ा-थोड़ा खुद को बाँटता रहा,
और एक दिन जब आईने के सामने खड़ा हुआ,
तो पाया—
उसके पास सबके हिस्से थे,
बस अपना हिस्सा नहीं था।
तब उसे समझ आया कि
इंसान को सबसे ज़्यादा
दुनिया नहीं तोड़ती,
उम्मीदें तोड़ती हैं।
वे उम्मीदें,
जो हम उन लोगों से बाँध लेते हैं
जिन्हें हमारी परवाह करने की फुर्सत भी नहीं होती।
और उस रात,
कई वर्षों बाद,
वह पहली बार रोया।
किसी के लिए नहीं,
किसी रिश्ते के लिए नहीं,
किसी हार के लिए नहीं।
वह रोया
उस आदमी के लिए,
जो हमेशा सबको बचाता रहा,
पर कभी खुद को नहीं बचा पाया।
और सुबह जब सूरज निकला,
तो दुनिया को वही पुराना चेहरा दिखा।
मगर उसके भीतर
एक सच्चाई जन्म ले चुकी थी—
सबसे दुखद बात यह नहीं कि कोई तुम्हें छोड़ दे,
सबसे दुखद बात यह है कि
तुम खुद को खो दो।