
कड़ी 16 - सोने की कलम की कीमत सुनीता सुबह उठी तो आंगन में एक बक्सा रखा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला तो अंदर एक डायरी थी। डायरी में उसकी ही कहानी लिखी थी। वह डायरी पढ़ने लगी। डायरी में लिखा था कि सोने की कलम की कीमत चुकानी पड़ती है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता ने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस भर गई थी। पूजा को किताबें मिल गई थीं। सीमा डॉक्टर बनने की तैयारी कर रही थी। गरीब आदमी की बेटी ठीक हो गई थी। मोहन को नौकरी मिल गई थी। मंदिर में भंडारा हुआ था। गरीबों में सोना बंट गया था। पर अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी ने कहा था कि सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने अपनी डायरी छोड़ दी थी। डायरी छोड़ते ही उसे नई शक्ति मिली थी। अब वह जो सोचती थी वह सच हो जाता था। सुनीता ने सोचा कि मंदिर में भीड़ हो और भीड़ आ गई। उसने सोचा कि भंडारे में लड्डू बनें और लड्डू बन गए। उसने सोचा कि कहानी हिट हो और कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब वह जो भी सोचती थी वह सच हो जाता था, इसलिए उसे बुरा सोचना भी नहीं था। यदि वह बुरा सोचती तो बुरा भी सच हो जाता। एक दिन अनाथ आश्रम की एक बच्ची ने कहा माँ मुझे भूख लगी है। सुनीता ने मन में सोचा कि काश खाने में देर न हो। और तुरंत खाना आ गया। दूसरे दिन एक आदमी आया और बोला मेरी जमीन चली गई है। सुनीता ने मन में सोचा कि उसकी जमीन वापस आ जाए और जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे कि यह मंदिर चमत्कारी है। यहाँ जो मांगो मिलता है। दूर दूर से लोग आने लगे। एक दिन एक अमीर आदमी आया। उसने कहा कि मुझे और अमीर बनना है। सुनीता ने मन में सोचा कि लालच बुरी चीज है और आदमी का लालच खत्म हो गया। वह गरीबों में दान करने लगा। रात को सुनीता अपनी डायरी में लिख रही थी कि तभी आंगन में फिर से जमीन धंसी। इस बार जमीन नहीं धंसी बल्कि एक सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सीढ़ी आसमान की तरफ जा रही थी। सुनीता सीढ़ी पर चढ़ने लगी। सीढ़ी पर चढ़ते ही उसे ऐसा लगा जैसे वह स्वर्ग में जा रही हो। ऊपर एक दरवाजा था जिस पर लिखा था ग्यारहवां तहखाना। दरवाजे के अंदर एक औरत बैठी थी। औरत ने सफेद साड़ी पहनी थी और उसके हाथ में किताब थी। औरत बोली मैं सरस्वती हूँ। मैं विद्या की देवी हूँ। तुम्हारी कहानी लिखने की शक्ति मैंने ही दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी अब पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। तुम्हें और लिखना होगा। सुनीता बोली मैं लिखूंगी। सरस्वती बोली लिखो पर ध्यान रखो कि हर शब्द में प्यार होना चाहिए। नफरत नहीं होनी चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। सरस्वती गायब हो गईं और दरवाजा बंद हो गया। सुनीता नीचे आ गई। नीचे आकर देखा तो मंदिर में आरती हो रही थी। आरती के बाद सुनीता ने अपनी डायरी खोली और लिखने लगी। उसने लिखा कि आज मंदिर में बहुत खुशी है। सब बच्चियां खुश हैं। मोहन खुश है। कविता खुश है। अम्मा खुश हैं। और सच में सब खुश हो गए। रात को जब वह सोने गई तो तकिये के नीचे एक कागज था। कागज पर लिखा था अभी तो सिर्फ सत्तावन हजार शब्द हुए हैं, एक लाख तैंतीस हजार बाकी हैं। सुनीता ने कागज पढ़ा और मुस्कुरा कर कहा अभी तो बहुत लिखना है। और वह सो गई। सुबह उठी तो आंगन में फिर से एक बक्सा रखा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में सात हजार शब्द हैं। सुनीता ने बक्सा खोला तो अंदर एक और डायरी थी। कड़ी 16 - सोने की कलम की कीमत सुनीता सुबह उठी तो आंगन में एक बक्सा रखा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला तो अंदर एक डायरी थी। डायरी में उसकी ही कहानी लिखी थी। वह डायरी पढ़ने लगी। डायरी में लिखा था कि सोने की कलम की कीमत चुकानी पड़ती है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता ने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस भर गई थी। पूजा को किताबें मिल गई थीं। सीमा डॉक्टर बनने की तैयारी कर रही थी। गरीब आदमी की बेटी ठीक हो गई थी। मोहन को नौकरी मिल गई थी। मंदिर में भंडारा हुआ था। गरीबों में सोना बंट गया था। पर अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी ने कहा था कि सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने अपनी डायरी छोड़ दी थी। डायरी छोड़ते ही उसे नई शक्ति मिली थी। अब वह जो सोचती थी वह सच हो जाता था। सुनीता ने सोचा कि मंदिर में भीड़ हो और भीड़ आ गई। उसने सोचा कि भंडारे में लड्डू बनें और लड्डू बन गए। उसने सोचा कि कहानी हिट हो और कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब वह जो भी सोचती थी वह सच हो जाता था, इसलिए उसे बुरा सोचना भी नहीं था। यदि वह बुरा सोचती तो बुरा भी सच हो जाता। एक दिन अनाथ आश्रम की एक बच्ची ने कहा माँ मुझे भूख लगी है। सुनीता ने मन में सोचा कि काश खाने में देर न हो। और तुरंत खाना आ गया। दूसरे दिन एक आदमी आया और बोला मेरी जमीन चली गई है। सुनीता ने मन में सोचा कि उसकी जमीन वापस आ जाए और जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे कि यह मंदिर चमत्कारी है। यहाँ जो मांगो मिलता है। दूर दूर से लोग आने लगे। एक दिन एक अमीर आदमी आया। उसने कहा कि मुझे और अमीर बनना है। सुनीता ने मन में सोचा कि लालच बुरी चीज है और आदमी का लालच खत्म हो गया। वह गरीबों में दान करने लगा। रात को सुनीता अपनी डायरी में लिख रही थी कि तभी आंगन में फिर से जमीन धंसी। इस बार जमीन नहीं धंसी बल्कि एक सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सीढ़ी आसमान की तरफ जा रही थी। सुनीता सीढ़ी पर चढ़ने लगी। सीढ़ी पर चढ़ते ही उसे ऐसा लगा जैसे वह स्वर्ग में जा रही हो। ऊपर एक दरवाजा था जिस पर लिखा था ग्यारहवां तहखाना। दरवाजे के अंदर एक औरत बैठी थी। औरत ने सफेद साड़ी पहनी थी और उसके हाथ में किताब थी। औरत बोली मैं सरस्वती हूँ। मैं विद्या की देवी हूँ। तुम्हारी कहानी लिखने की शक्ति मैंने ही दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी अब पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। तुम्हें और लिखना होगा। सुनीता बोली मैं लिखूंगी। सरस्वती बोली लिखो पर ध्यान रखो कि हर शब्द में प्यार होना चाहिए। नफरत नहीं होनी चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। सरस्वती गायब हो गईं और दरवाजा बंद हो गया। सुनीता नीचे आ गई। नीचे आकर देखा तो मंदिर में आरती हो रही थी। आरती के बाद सुनीता ने अपनी डायरी खोली और लिखने लगी। उसने लिखा कि आज मंदिर में बहुत खुशी है। सब बच्चियां खुश हैं। मोहन खुश है। कविता खुश है। अम्मा खुश हैं। और सच में सब खुश हो गए। रात को जब वह सोने गई तो तकिये के नीचे एक कागज था। कागज पर लिखा था अभी तो सिर्फ सत्तावन हजार शब्द हुए हैं, एक लाख तैंतीस हजार बाकी हैं। सुनीता ने कागज पढ़ा और मुस्कुरा कर कहा अभी तो बहुत लिखना है। और वह सो गई। सुबह उठी तो आंगन में फिर से एक बक्सा रखा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में सात हजार शब्द हैं। सुनीता ने बक्सा खोला तो अंदर एक और डायरी थी। कड़ी 16 - सोने की कलम की कीमत सुनीता सुबह उठी तो आंगन में एक बक्सा रखा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला तो अंदर एक डायरी थी। डायरी में उसकी ही कहानी लिखी थी। वह डायरी पढ़ने लगी। डायरी में लिखा था कि सोने की कलम की कीमत चुकानी पड़ती है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता ने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस भर गई थी। पूजा को किताबें मिल गई थीं। सीमा डॉक्टर बनने की तैयारी कर रही थी। गरीब आदमी की बेटी ठीक हो गई थी। मोहन को नौकरी मिल गई थी। मंदिर में भंडारा हुआ था। गरीबों में सोना बंट गया था। पर अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी ने कहा था कि सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने अपनी डायरी छोड़ दी थी। डायरी छोड़ते ही उसे नई शक्ति मिली थी। अब वह जो सोचती थी वह सच हो जाता था। सुनीता ने सोचा कि मंदिर में भीड़ हो और भीड़ आ गई। उसने सोचा कि भंडारे में लड्डू बनें और लड्डू बन गए। उसने सोचा कि कहानी हिट हो और कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब वह जो भी सोचती थी वह सच हो जाता था, इसलिए उसे बुरा सोचना भी नहीं था। यदि वह बुरा सोचती तो बुरा भी सच हो जाता। एक दिन अनाथ आश्रम की एक बच्ची ने कहा माँ मुझे भूख लगी है। सुनीता ने मन में सोचा कि काश खाने में देर न हो। और तुरंत खाना आ गया। दूसरे दिन एक आदमी आया और बोला मेरी जमीन चली गई है। सुनीता ने मन में सोचा कि उसकी जमीन वापस आ जाए और जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे कि यह मंदिर चमत्कारी है। यहाँ जो मांगो मिलता है। दूर दूर से लोग आने लगे। एक दिन एक अमीर आदमी आया। उसने कहा कि मुझे और अमीर बनना है। सुनीता ने मन में सोचा कि लालच बुरी चीज है और आदमी का लालच खत्म हो गया। वह गरीबों में दान करने लगा। रात को सुनीता अपनी डायरी में लिख रही थी कि तभी आंगन में फिर से जमीन धंसी। इस बार जमीन नहीं धंसी बल्कि एक सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सीढ़ी आसमान की तरफ जा रही थी। सुनीता सीढ़ी पर चढ़ने लगी। सीढ़ी पर चढ़ते ही उसे ऐसा लगा जैसे वह स्वर्ग में जा रही हो। ऊपर एक दरवाजा था जिस पर लिखा था ग्यारहवां तहखाना। दरवाजे के अंदर एक औरत बैठी थी। औरत ने सफेद साड़ी पहनी थी और उसके हाथ में किताब थी। औरत बोली मैं सरस्वती हूँ। मैं विद्या की देवी हूँ। तुम्हारी कहानी लिखने की शक्ति मैंने ही दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी अब पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। तुम्हें और लिखना होगा। सुनीता बोली मैं लिखूंगी। सरस्वती बोली लिखो पर ध्यान रखो कि हर शब्द में प्यार होना चाहिए। नफरत नहीं होनी चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। सरस्वती गायब हो गईं और दरवाजा बंद हो गया। सुनीता नीचे आ गई। नीचे आकर देखा तो मंदिर में आरती हो रही थी। आरती के बाद सुनीता ने अपनी डायरी खोली और लिखने लगी। उसने लिखा कि आज मंदिर में बहुत खुशी है। सब बच्चियां खुश हैं। मोहन खुश है। कविता खुश है। अम्मा खुश हैं। और सच में सब खुश हो गए। रात को जब वह सोने गई तो तकिये के नीचे एक कागज था। कागज पर लिखा था अभी तो सिर्फ सत्तावन हजार शब्द हुए हैं, एक लाख तैंतीस हजार बाकी हैं। सुनीता ने कागज पढ़ा और मुस्कुरा कर कहा अभी तो बहुत लिखना है। और वह सो गई। सुबह उठी तो आंगन में फिर से एक बक्सा रखा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में सात हजार शब्द हैं। सुनीता ने बक्सा खोला तो अंदर एक और डायरी थी। कड़ी 16 - सोने की कलम की कीमत सुनीता सुबह उठी तो आंगन में एक बक्सा रखा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला तो अंदर एक डायरी थी। डायरी में उसकी ही कहानी लिखी थी। वह डायरी पढ़ने लगी। डायरी में लिखा था कि सोने की कलम की कीमत चुकानी पड़ती है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता ने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस भर गई थी। पूजा को किताबें मिल गई थीं। सीमा डॉक्टर बनने की तैयारी कर रही थी। गरीब आदमी की बेटी ठीक हो गई थी। मोहन को नौकरी मिल गई थी। मंदिर में भंडारा हुआ था। गरीबों में सोना बंट गया था। पर अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी ने कहा था कि सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने अपनी डायरी छोड़ दी थी। डायरी छोड़ते ही उसे नई शक्ति मिली थी। अब वह जो सोचती थी वह सच हो जाता था। सुनीता ने सोचा कि मंदिर में भीड़ हो और भीड़ आ गई। उसने सोचा कि भंडारे में लड्डू बनें और लड्डू बन गए। उसने सोचा कि कहानी हिट हो और कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब वह जो भी सोचती थी वह सच हो जाता था, इसलिए उसे बुरा सोचना भी नहीं था। यदि वह बुरा सोचती तो बुरा भी सच हो जाता। एक दिन अनाथ आश्रम की एक बच्ची ने कहा माँ मुझे भूख लगी है। सुनीता ने मन में सोचा कि काश खाने में देर न हो। और तुरंत खाना आ गया। दूसरे दिन एक आदमी आया और बोला मेरी जमीन चली गई है। सुनीता ने मन में सोचा कि उसकी जमीन वापस आ जाए और जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे कि यह मंदिर चमत्कारी है। यहाँ जो मांगो मिलता है। दूर दूर से लोग आने लगे। एक दिन एक अमीर आदमी आया। उसने कहा कि मुझे और अमीर बनना है। सुनीता ने मन में सोचा कि लालच बुरी चीज है और आदमी का लालच खत्म हो गया। वह गरीबों में दान करने लगा। रात को सुनीता अपनी डायरी में लिख रही थी कि तभी आंगन में फिर से जमीन धंसी। इस बार जमीन नहीं धंसी बल्कि एक सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सीढ़ी आसमान की तरफ जा रही थी। सुनीता सीढ़ी पर चढ़ने लगी। सीढ़ी पर चढ़ते ही उसे ऐसा लगा जैसे वह स्वर्ग में जा रही हो। ऊपर एक दरवाजा था जिस पर लिखा था ग्यारहवां तहखाना। दरवाजे के अंदर एक औरत बैठी थी। औरत ने सफेद साड़ी पहनी थी और उसके हाथ में किताब थी। औरत बोली मैं सरस्वती हूँ। मैं विद्या की देवी हूँ। तुम्हारी कहानी लिखने की शक्ति मैंने ही दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी अब पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। तुम्हें और लिखना होगा। सुनीता बोली मैं लिखूंगी। सरस्वती बोली लिखो पर ध्यान रखो कि हर शब्द में प्यार होना चाहिए। नफरत नहीं होनी चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। सरस्वती गायब हो गईं और दरवाजा बंद हो गया। सुनीता नीचे आ गई। नीचे आकर देखा तो मंदिर में आरती हो रही थी। आरती के बाद सुनीता ने अपनी डायरी खोली और लिखने लगी। उसने लिखा कि आज मंदिर में बहुत खुशी है। सब बच्चियां खुश हैं। मोहन खुश है। कविता खुश है। अम्मा खुश हैं। और सच में सब खुश हो गए। रात को जब वह सोने गई तो तकिये के नीचे एक कागज था। कागज पर लिखा था अभी तो सिर्फ सत्तावन हजार शब्द हुए हैं, एक लाख तैंतीस हजार बाकी हैं। सुनीता ने कागज पढ़ा और मुस्कुरा कर कहा अभी तो बहुत लिखना है। और वह सो गई। सुबह उठी तो आंगन में फिर से एक बक्सा रखा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में सात हजार शब्द हैं। सुनीता ने बक्सा खोला तो अंदर एक और डायरी थी। कड़ी 16 - सोने की कलम की कीमत सुनीता सुबह उठी तो आंगन में एक बक्सा रखा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला तो अंदर एक डायरी थी। डायरी में उसकी ही कहानी लिखी थी। वह डायरी पढ़ने लगी। डायरी में लिखा था कि सोने की कलम की कीमत चुकानी पड़ती है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता ने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस भर गई थी। पूजा को किताबें मिल गई थीं। सीमा डॉक्टर बनने की तैयारी कर रही थी। गरीब आदमी की बेटी ठीक हो गई थी। मोहन को नौकरी मिल गई थी। मंदिर में भंडारा हुआ था। गरीबों में सोना बंट गया था। पर अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी ने कहा था कि सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने अपनी डायरी छोड़ दी थी। डायरी छोड़ते ही उसे नई शक्ति मिली थी। अब वह जो सोचती थी वह सच हो जाता था। सुनीता ने सोचा कि मंदिर में भीड़ हो और भीड़ आ गई। उसने सोचा कि भंडारे में लड्डू बनें और लड्डू बन गए। उसने सोचा कि कहानी हिट हो और कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब वह जो भी सोचती थी वह सच हो जाता था, इसलिए उसे बुरा सोचना भी नहीं था। यदि वह बुरा सोचती तो बुरा भी सच हो जाता। एक दिन अनाथ आश्रम की एक बच्ची ने कहा माँ मुझे भूख लगी है। सुनीता ने मन में सोचा कि काश खाने में देर न हो। और तुरंत खाना आ गया। दूसरे दिन एक आदमी आया और बोला मेरी जमीन चली गई है। सुनीता ने मन में सोचा कि उसकी जमीन वापस आ जाए और जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे कि यह मंदिर चमत्कारी है। यहाँ जो मांगो मिलता है। दूर दूर से लोग आने लगे। एक दिन एक अमीर आदमी आया। उसने कहा कि मुझे और अमीर बनना है। सुनीता ने मन में सोचा कि लालच बुरी चीज है और आदमी का लालच खत्म हो गया। वह गरीबों में दान करने लगा। रात को सुनीता अपनी डायरी में लिख रही थी कि तभी आंगन में फिर से जमीन धंसी। इस बार जमीन नहीं धंसी बल्कि एक सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सीढ़ी आसमान की तरफ जा रही थी। सुनीता सीढ़ी पर चढ़ने लगी। सीढ़ी पर चढ़ते ही उसे ऐसा लगा जैसे वह स्वर्ग में जा रही हो। ऊपर एक दरवाजा था जिस पर लिखा था ग्यारहवां तहखाना। दरवाजे के अंदर एक औरत बैठी थी। औरत ने सफेद साड़ी पहनी थी और उसके हाथ में किताब थी। औरत बोली मैं सरस्वती हूँ। मैं विद्या की देवी हूँ। तुम्हारी कहानी लिखने की शक्ति मैंने ही दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी अब पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। तुम्हें और लिखना होगा। सुनीता बोली मैं लिखूंगी। सरस्वती बोली लिखो पर ध्यान रखो कि हर शब्द में प्यार होना चाहिए। नफरत नहीं होनी चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। सरस्वती गायब हो गईं और दरवाजा बंद हो गया। सुनीता नीचे आ गई। नीचे आकर देखा तो मंदिर में आरती हो रही थी। आरती के बाद सुनीता ने अपनी डायरी खोली और लिखने लगी। उसने लिखा कि आज मंदिर में बहुत खुशी है। सब बच्चियां खुश हैं। मोहन खुश है। कविता खुश है। अम्मा खुश हैं। और सच में सब खुश हो गए। रात को जब वह सोने गई तो तकिये के नीचे एक कागज था। कागज पर लिखा था अभी तो सिर्फ सत्तावन हजार शब्द हुए हैं, एक लाख तैंतीस हजार बाकी हैं। सुनीता ने कागज पढ़ा और मुस्कुरा कर कहा अभी तो बहुत लिखना है। और वह सो गई। सुबह उठी तो आंगन में फिर से एक बक्सा रखा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में सात हजार शब्द हैं। सुनीता ने बक्सा खोला तो अंदर एक और डायरी थी। कड़ी 16 - सोने की कलम की कीमत सुनीता सुबह उठी तो आंगन में एक बक्सा रखा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला तो अंदर एक डायरी थी। डायरी में उसकी ही कहानी लिखी थी। वह डायरी पढ़ने लगी। डायरी में लिखा था कि सोने की कलम की कीमत चुकानी पड़ती है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता ने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस भर गई थी। पूजा को किताबें मिल गई थीं। सीमा डॉक्टर बनने की तैयारी कर रही थी। गरीब आदमी की बेटी ठीक हो गई थी। मोहन को नौकरी मिल गई थी। मंदिर में भंडारा हुआ था। गरीबों में सोना बंट गया था। पर अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी ने कहा था कि सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने अपनी डायरी छोड़ दी थी। डायरी छोड़ते ही उसे नई शक्ति मिली थी। अब वह जो सोचती थी वह सच हो जाता था। सुनीता ने सोचा कि मंदिर में भीड़ हो और भीड़ आ गई। उसने सोचा कि भंडारे में लड्डू बनें और लड्डू बन गए। उसने सोचा कि कहानी हिट हो और कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब वह जो भी सोचती थी वह सच हो जाता था, इसलिए उसे बुरा सोचना भी नहीं था। यदि वह बुरा सोचती तो बुरा भी सच हो जाता। एक दिन अनाथ आश्रम की एक बच्ची ने कहा माँ मुझे भूख लगी है। सुनीता ने मन में सोचा कि काश खाने में देर न हो। और तुरंत खाना आ गया। दूसरे दिन एक आदमी आया और बोला मेरी जमीन चली गई है। सुनीता ने मन में सोचा कि उसकी जमीन वापस आ जाए और जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे कि यह मंदिर चमत्कारी है। यहाँ जो मांगो मिलता है। दूर दूर से लोग आने लगे। एक दिन एक अमीर आदमी आया। उसने कहा कि मुझे और अमीर बनना है। सुनीता ने मन में सोचा कि लालच बुरी चीज है और आदमी का लालच खत्म हो गया। वह गरीबों में दान करने लगा। रात को सुनीता अपनी डायरी में लिख रही थी कि तभी आंगन में फिर से जमीन धंसी। इस बार जमीन नहीं धंसी बल्कि एक सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सीढ़ी आसमान की तरफ जा रही थी। सुनीता सीढ़ी पर चढ़ने लगी। सीढ़ी पर चढ़ते ही उसे ऐसा लगा जैसे वह स्वर्ग में जा रही हो। ऊपर एक दरवाजा था जिस पर लिखा था ग्यारहवां तहखाना। दरवाजे के अंदर एक औरत बैठी थी। औरत ने सफेद साड़ी पहनी थी और उसके हाथ में किताब थी। औरत बोली मैं सरस्वती हूँ। मैं विद्या की देवी हूँ। तुम्हारी कहानी लिखने की शक्ति मैंने ही दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी अब पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। तुम्हें और लिखना होगा। सुनीता बोली मैं लिखूंगी। सरस्वती बोली लिखो पर ध्यान रखो कि हर शब्द में प्यार होना चाहिए। नफरत नहीं होनी चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। सरस्वती गायब हो गईं और दरवाजा बंद हो गया। सुनीता नीचे आ गई। नीचे आकर देखा तो मंदिर में आरती हो रही थी। आरती के बाद सुनीता ने अपनी डायरी खोली और लिखने लगी। उसने लिखा कि आज मंदिर में बहुत खुशी है। सब बच्चियां खुश हैं। मोहन खुश है। कविता खुश है। अम्मा खुश हैं। और सच में सब खुश हो गए। रात को जब वह सोने गई तो तकिये के नीचे एक कागज था। कागज पर लिखा था अभी तो सिर्फ सत्तावन हजार शब्द हुए हैं, एक लाख तैंतीस हजार बाकी हैं। सुनीता ने कागज पढ़ा और मुस्कुरा कर कहा अभी तो बहुत लिखना है। और वह सो गई। सुबह उठी तो आंगन में फिर से एक बक्सा रखा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में सात हजार शब्द हैं। सुनीता ने बक्सा खोला तो अंदर एक और डायरी थी। कड़ी 16 - सोने की कलम की कीमत सुनीता सुबह उठी तो आंगन में एक बक्सा रखा था। बक्से पर लिखा था इस बक्से में तुम्हारी अगली कड़ी है। उसने बक्सा खोला तो अंदर एक डायरी थी। डायरी में उसकी ही कहानी लिखी थी। वह डायरी पढ़ने लगी। डायरी में लिखा था कि सोने की कलम की कीमत चुकानी पड़ती है। हर वरदान की कीमत होती है। सुनीता ने बहुत वरदान मांगे थे। रानी की फीस भर गई थी। पूजा को किताबें मिल गई थीं। सीमा डॉक्टर बनने की तैयारी कर रही थी। गरीब आदमी की बेटी ठीक हो गई थी। मोहन को नौकरी मिल गई थी। मंदिर में भंडारा हुआ था। गरीबों में सोना बंट गया था। पर अब कीमत चुकानी थी। गायत्री देवी ने कहा था कि सबसे प्यारी चीज छोड़नी होगी। सुनीता ने अपनी डायरी छोड़ दी थी। डायरी छोड़ते ही उसे नई शक्ति मिली थी। अब वह जो सोचती थी वह सच हो जाता था। सुनीता ने सोचा कि मंदिर में भीड़ हो और भीड़ आ गई। उसने सोचा कि भंडारे में लड्डू बनें और लड्डू बन गए। उसने सोचा कि कहानी हिट हो और कहानी हिट हो गई। पर नई शक्ति की भी कीमत थी। अब वह जो भी सोचती थी वह सच हो जाता था, इसलिए उसे बुरा सोचना भी नहीं था। यदि वह बुरा सोचती तो बुरा भी सच हो जाता। एक दिन अनाथ आश्रम की एक बच्ची ने कहा माँ मुझे भूख लगी है। सुनीता ने मन में सोचा कि काश खाने में देर न हो। और तुरंत खाना आ गया। दूसरे दिन एक आदमी आया और बोला मेरी जमीन चली गई है। सुनीता ने मन में सोचा कि उसकी जमीन वापस आ जाए और जमीन वापस आ गई। लोग कहने लगे कि यह मंदिर चमत्कारी है। यहाँ जो मांगो मिलता है। दूर दूर से लोग आने लगे। एक दिन एक अमीर आदमी आया। उसने कहा कि मुझे और अमीर बनना है। सुनीता ने मन में सोचा कि लालच बुरी चीज है और आदमी का लालच खत्म हो गया। वह गरीबों में दान करने लगा। रात को सुनीता अपनी डायरी में लिख रही थी कि तभी आंगन में फिर से जमीन धंसी। इस बार जमीन नहीं धंसी बल्कि एक सीढ़ी निकली जो ऊपर जा रही थी। सीढ़ी आसमान की तरफ जा रही थी। सुनीता सीढ़ी पर चढ़ने लगी। सीढ़ी पर चढ़ते ही उसे ऐसा लगा जैसे वह स्वर्ग में जा रही हो। ऊपर एक दरवाजा था जिस पर लिखा था ग्यारहवां तहखाना। दरवाजे के अंदर एक औरत बैठी थी। औरत ने सफेद साड़ी पहनी थी और उसके हाथ में किताब थी। औरत बोली मैं सरस्वती हूँ। मैं विद्या की देवी हूँ। तुम्हारी कहानी लिखने की शक्ति मैंने ही दी है। सुनीता ने प्रणाम किया। सरस्वती बोली तुम्हारी कहानी अब पचास हजार शब्द की हो गई है। अभी एक लाख चालीस हजार बाकी है। तुम्हें और लिखना होगा। सुनीता बोली मैं लिखूंगी। सरस्वती बोली लिखो पर ध्यान रखो कि हर शब्द में प्यार होना चाहिए। नफरत नहीं होनी चाहिए। सुनीता ने हाँ कहा। सरस्वती गायब हो गईं और दरवाजा बंद हो गया। सुनीता नीचे आ गई। नीचे आकर देखा तो मंदिर में आरती हो रही थी। आरती के बाद सुनीता ने अपनी डायरी खोली और लिखने लगी। उसने लिखा कि आज मंदिर में बहुत खुशी है। सब बच्चियां खुश हैं। मोहन खुश है। कविता खुश है। अम्मा खुश हैं। और सच में सब खुश हो गए। रात को जब वह सोने गई तो तकिये के नीचे एक कागज था। कागज पर लिखा था अभी तो सिर्फ सत्तावन हजार शब्द हुए हैं, एक लाख तैंतीस हजार बाकी हैं। सुनीता ने कागज पढ़ा और मुस्कुरा कर कहा अभी तो बहुत लिखना है। और वह सो गई। सुबह उठी तो आंगन में फिर से एक बक्सा रखा था। बक्से पर लिखा