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ग़ज़ल

2122 1212 22

ग़म गया यार का बुख़ार गया

चार दिन ज़िन्दगी गुज़ार गया /१

कमसिनी का शबाब है आख़िर

नाज़-नखरों से मैं भी हार गया /२

कौन ऐसा था शख़्स दुनिया में

कौन क़िस्मत मेरी सँवार गया /३

बे-क़रार आ के ज़िन्दगी में रहा

ज़िन्दगी से भी बे-क़रार गया /४

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