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पेड़

पेड़

​ये खड़े हैं जो कतारों में, चुपचाप से कहीं,

पेड़ों की इस खामोशी में, कोई शोर तो नहीं।

​धूप की तपिश सहते, ये अडिग से खड़े हैं,

न जाने कितने मौसम, इनकी छाँव में ढले हैं।

​हवा चलती है तो बस, पत्तियाँ कुछ कहती हैं,

बाकि सब बातें तो, इनकी जड़ों में रहती हैं।

​न ये शिकायत करते, न ये दुआ मांगते हैं,

ये तो बस मुसाफिरों की, थकान को जानते हैं।

​परिंदे जब लौटते हैं, शाम को इनके घर,

ये खामोशी से ओढ़ लेते हैं, रात का मंज़र।

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