
ये खड़े हैं जो कतारों में, चुपचाप से कहीं,
पेड़ों की इस खामोशी में, कोई शोर तो नहीं।
धूप की तपिश सहते, ये अडिग से खड़े हैं,
न जाने कितने मौसम, इनकी छाँव में ढले हैं।
हवा चलती है तो बस, पत्तियाँ कुछ कहती हैं,
बाकि सब बातें तो, इनकी जड़ों में रहती हैं।
न ये शिकायत करते, न ये दुआ मांगते हैं,
ये तो बस मुसाफिरों की, थकान को जानते हैं।
परिंदे जब लौटते हैं, शाम को इनके घर,
ये खामोशी से ओढ़ लेते हैं, रात का मंज़र।