
हम दिनचर्या के ऊब-भरे कामों से तंग भी रहते हैं, और उन्हें छोड़ने का साहस भी नहीं कर पाते। और तो और, हम अपने सबसे पसंदीदा काम को छोड़ देते हैं, लेकिन रोज़मर्रा के कामों को कुछ देर के लिए भी नहीं टालते। फिर मन में कुंठा, अवसाद और निराशा लेकर ढोते रहते हैं और समय बीत जाने पर मदद की आस करते रह जाते हैं।
सच तो यह है कि हम इंसान आज भी ज़िम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हैं। हमें आदत जो लग गई है अपनी असफलताओं का दोष दूसरों पर मढ़ने की। संयोग से कोई न मिला तो परिस्थितियों पर ठीकरा फोड़ देते हैं।
हमारी त्वरित और सरल प्रवृत्ति ने अब संघर्ष का रास्ता ही छोड़ दिया है। अब बहुसंख्यक यही कामना करता है कि उसे सफलता फास्ट फूड की तरह तुरंत परोस दी जाए। उसमें इतना धैर्य ही नहीं कि वह प्रतीक्षा का आनंद उठा सके ; चाहे वह धीमी आँच पर पके भोजन का स्वाद हो या लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए सफ़र का सुख। उसका ध्येय केवल प्राप्ति है, संघर्ष नहीं। क्योंकि उसे हासिल तो दिखता है, जिजीविषा नहीं।
@अर्शिया अंजुम