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अंतर्दृष्टि

मेहनत और ईमानदारी से किए गए कार्य को जब समर्थन या सराहना नहीं मिलती है तो बहुत आश्चर्य होता है कि क्या संसार में सफलता के मानक शत- प्रतिशत बदल गए हैं ?? क्या संतों, महात्माओं की वाणी प्रभावहीन हो गई है और क्या वास्तव में आदर्श केवल किताबों में ही अंकित रह गए हैं उनका वास्तविक जीवन में कोई अस्तित्व नहीं रह गया है??

इस आश्चर्य को दुख में बदलते देर नहीं लगती जब अपने विमुख हो किनारे लगा देते हैं। संघर्ष के इन नितांत क्षणों में धैर्य बनाए रखना कितना दुष्कर होता है। अकेले रह जाने की पीड़ा कितनी असहनीय होती है ? ऐसे में अपने पथ पर अडिग रहना और दिशा न बदलने का दबाव झेला नहीं जाता।

मगर बात यह है कि इस तनाव और दबाव के अंतर्द्वंद्व से उभर पाना ही तो असली सफलता है। यही घड़ी तो परीक्षा की होती है,इन्हीं पलों में तो प्रदर्शन करते रहना वास्तविक संघर्ष है। फिर जो विजय मिलती है उसकी खुशी अद्वितीय ,अतुलनीय और अव्यक्त होती है। वैसे भी संसार का नियम है वह संघर्षों की पीड़ा उसकी निराशा का अंधेरा कहां देखता है ! वह तो सफलता की चमक देखता है और उसकी चकाचौंध में सब अदृश्य हो जाता है।

क्या जाने यह दुनिया उन अनमोल पलों को जब घोर निराशा में हृदय के किसी कोने में आशा की एक किरण फूटती है और पूरे शरीर को ऊर्जा से भर देती है। ऐसी ऊर्जा जिसमें किसी के साथ की जरूरत नहीं रह जाती है ऐसी ताक़त जहां "अहम ब्रह्मासमि" का राज़ खुलता है और स्वयं की खोज शुरू होती है।

@ अर्शिया अंजुम

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