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कोपभवन

टेकती लाठी कुब्ज़ा ने चली चाल,

नेत्र थे टेढ़े था उसका बुरा हाल |

कैकेयी ने पूछा क्यों हुआ तेरा यह हाल,

मोद मना, होगा अभिषेक राम का,

क्यों घूमती बनी बेहाल |

बोली मंथरा, रानी यह क्या अनर्थ हुआ,

तू प्रियतमा राजा की,

प्रेम क्यों ना सार्थक हुआ?

भरत बनेंगे राजा,

राम वन को जाएंगे,

सजेगा ताज शीश भरत के,

राज पद भरत जब पाएंगे |

पटरानी का पद पाओगी तुम|

मैं दासी थी वहीं रहूंगी,

जहां कहीं जाओगी तुम ||

निर्मल दृष्टि रानी की बदली,

मंथरा ने चली चाल|

सोच में निमग्न हुई,

भवन में जा बैठी धर कपाल ||

बहन कौशल्या पूछ रही,

ये कैसी अकुलाहट है|

कैसा यह संदेह अनुजा,

क्या विनाश की आहट है?

हे कौशल्या सत्य कहो,

तनय राम कभी तेरा था?

तू माता भरत की हो,

राम सदा से मेरा था |

फिर अचानक क्या विपदा आयी,

कैकेयी ने बदली चाल |

मुख लाल नेत्र थे क्रोधित

भूली राम थे उनके लाल ||


अधीर हो भरत जननी,

कोपभवन की हो गई,

विष प्रवाह था बह चला,

अंधभ्रान्त हो वहीं सो गई |

फटे वस्त्र लिपटे तन पर,

भू को जा लगे केश,

मुख़ क्षोभ से ज्वलित था,

धर लिया दुर्गा का सा वेश |

महीपत दशरथ भागे आए,

विधि का लेखा आगे आए,

कोपांगन कैकेयी सोई,

लोचन भर भर के रोईं |

दशरथ का हृदय था क्षोभित,

प्रिया रानी क्यों कर थी क्रोधित |

बोले,प्रिये क्यों ये विद्वेष,

अंततोगत्वा क्या उद्देश्य?

क्यों मुख मोड़े लेटी हो,

कैकेय की तुम बेटी हो |

मोती मणिक्य तुम्हारे आगे,

वैधव्य रूप तुमपर ना साज़े |

सब रानियों से प्यारी हो,

प्रजा अवध की भी दुलारी हो |

क्रोध से क्यों यह आंखें लाल?

वस्त्र फटे केश लिपटे,

हो क्यों बेहाल?

तब रानी ने करवट फेरी,

काल स्वयं व्यथा से थी घिरी,

बोली नृप से यह कैसा न्याय,

क्या मेरे भरत का नहीं उपाय?


मैंने तो किया सर्वस्व त्याग,

सोचा जग गए मेरे भाग्य,

पर हा! हुआ मुझ पर अन्याय,

समझ ना सकी प्रिय से अभिप्राय |

राजा मुझको हुआ है शोक,

क्यों लेते मुझे प्रतिशोध?

क्या राम ही सर्वश्रेष्ठ है?

माना कि वह ज्येष्ठ है |

पर मेरे भरत का क्या है दोष?

क्यों अनुज को राजा बनने पर रोक?


हो विवश मुझे यह सब करना था,

कोपभवन को धरना था |


तब राजा का हृदय था कांपा

क्या यह सब है विधि का लेखा?


क्या अब आगे आया श्राप,

श्रवण पर जब किया था प्रतिघात |

तब महिपत ने सब स्मृत किया,

जो अब तक था विस्मृत हुआ |

राजा तब निद्रा से जागे,

राजमहल की ओर थे भागे |

राम राज्याभिषेक का शोर था,

उन्माद प्रसाद चहूंओर था |

अवध पताकाओं से सज रही,

सब ओर दूदूँभी थी बज रही |

लक्ष्मण शत्रुघ्न थे सब हर्षित हुए,

भरत थे ननिहाल गए |

कौशल्या, सुमित्रा संग भातीं थीं,

चार बहुएँ भी शोभा पाती थीं |

केवल एक नारी रोतीं थीं,

कैकेयी, कोपभवन मे सोती थीं ||

  • -पदमा राय

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