शीर्षक — : विरह
मेरी भी सुन लो…
तुम्हें आना होगा मेरे साथ,
क्योंकि थक गई हूँ पीछे भाग-भाग के,
अब एक ठहराव की ज़रूरत है माधव।
तुम्हारी पदचापों को
अपने हृदय में समेटते-समेटते।
अब एक ऐसा ठहराव चाहिए
जहाँ तुम हो,
और प्रतीक्षा न हो।
जो हमने महसूस किया,
जो हर पल साँसों में जिया—
अब तुम्हारी बारी है माधव।
जो तड़प हमने ओढ़ी
हर साँझ, हर रात्रि—
अब वही अग्नि
तुम्हारे अंतस में भी जले।
जो वियोग हमने सहा,
तुम्हारे बिना,
तुम्हारे नाम को जपते हुए—
अब जब मुड़कर देखोगे,
तो पाओगे
प्रतीक्षा का मरुस्थल,
जहाँ मेरे आँसुओं के
निशान तक शेष न होंगे।
क्योंकि प्रेम केवल मिलन नहीं होता माधव,
प्रेम तो वह मौन है
जो दूरी में भी बोलता है।
प्रेम वह पीड़ा है
जो राधा को राधा बनाती है
और कृष्ण को भी
कभी-कभी अपूर्ण छोड़ देती है।
मैंने तुम्हें पाया
विरह में,
तुम्हें जिया
अनुपस्थिति में।
अब तुम जानो
कि राधा का प्रेम
पाने की नहीं,
समर्पण की साधना है।
अब तुम्हारी बारी है माधव—
राधा को
अपने वियोग में
पहचानने की।
क्योंकि थक गई हूँ पीछे भाग-भाग के,
अब एक ठहराव की ज़रूरत है माधव।
रंजीता भारती श्री
#दिनांक :२०/०१/२०२६