आज मैं आपसे शिक्षा के उस पक्ष पर बात करना चाहता हूँ, जो अंकों में नहीं मापा जा सकता प्रयास
कहा जाता है कि रूस की शिक्षा प्रणाली में यदि कोई छात्र परीक्षा में खाली उत्तर पुस्तिका भी जमा करता है, तो उसे शून्य नहीं बल्कि न्यूनतम अंक दिए जाते हैं। इसका कारण बहुत गहरा है—क्योंकि जो व्यक्ति प्रयास कर रहा है, वह कभी शून्य नहीं होता।
सोचिए, एक छात्र का कक्षा तक पहुँचना ही अपने आप में संघर्ष है—
कभी आर्थिक तंगी,
कभी सामाजिक दबाव,
कभी संसाधनों की कमी,
तो कभी आत्मविश्वास की लड़ाई।
अगर वह उत्तर न लिख सका, तो क्या उसका पूरा संघर्ष शून्य हो जाना चाहिए?
नहीं।
शून्य अंक केवल काग़ज़ पर नहीं लगते—वे मन पर लगते हैं।
वे सपनों को चोट पहुँचाते हैं।
हम शिक्षा को केवल परीक्षा और परिणाम तक सीमित नहीं मानते।
हम उस प्रयास को महत्व देते हैं, जो एक बच्चा विपरीत परिस्थितियों में भी करता है।
हम मानते हैं—
शिक्षा का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं,
बल्कि हौसला देना है।
शिक्षक का धर्म गिराना नहीं,
बल्कि बार-बार खड़ा करना है।
जो प्रयास करता है, वह कभी शून्य नहीं होता।
आइए, हम सब मिलकर ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाएँ
जो बच्चों से यह कहे—
“तुम असफल नहीं हो,
बस इस बार सफल नहीं हो पाए।
फिर से कोशिश करो—हम तुम्हारे साथ हैं।”