
गीत
सृष्टि का हूॅं मैं सहारा
मैं नहीं मरुस्थल हूॅं प्रिय, मैं हूॅं बहती सरित धारा।
मैं नहीं परछाई हूॅं प्रिय, मैं तो धूप, रश्मि पसारा।।
तुम तो सागर में लहर हूॅं,
अपनी बाॅंहें मैं फैलाऊॅं,
तुम हो पर्वत मैं पवन हूॅं,
साॅंसों में बन प्राण समाऊॅं।
मैं नहीं कोरी निशा प्रिय,
मैं हूॅं भोर का नव उजियारा।
मैं नहीं मरुस्थल हूॅं प्रिय...
तुम गगन बनाकर के छाये,
मैं रही बनकर धरा,
सारी ऋतुऍं ओढ़ लीं प्रिय,
मुझ में क्यों पतझड़ भरा
मैं नहीं दायित्व हूॅं प्रिय,
मैंनें ही यह जग सॅंवारा।
मैं नहीं मरुस्थल हूॅं प्रिय...
मैं कविता मैं कथा हूॅं,
गीत मैं, हूॅं चौपाई- छंद,
मेरे जनने पर जगत में,
आज भी क्यूॅं द्वंद-फंद?
मैं नहीं छुई-मुई प्रिय,
सृष्टि का हूॅं मैं सहारा।
मैं नहीं मरुस्थल हूॅं प्रिय....
मैं हूॅं समिधा धृत, सुगंधि,
मैं हूॅं पावन सा हवन
रूप मैं ईश्वर का हूॅं प्रिय,
जननी, जीवन स्तवन
मैं नहीं जुगनू प्रिय,
चंदा, सूरज, मैं सितारा।
मैं नहीं मरुस्थल हूॅं प्रिय...
मैं हूॅं ममता की बदरिया,
करुणा की बरसात मैं,
रिश्तों नातों की धुरी मैं,
पर्व मैं नवरात हूॅं ।
मैं नहीं बोझा प्रिय,
मैंने स्वयं को सृष्टि पे वारा
मैं नहीं मरुस्थल हूॅं प्रिय, मैं हूॅं बहती सरित धारा।
मैं नहीं परछाई हूॅं प्रिय, मैं तो धूप, रश्मि पसारा।।