
परिवार केवल एक शब्द ही नहीं है, या केवल कुछ लोगों के सामंजस्य को अथवा एक घर में रहने भर को परिवार नहीं कहते हैं। परिवार एक ऐसा आधार है, जिसका जीवन में अत्यंत महत्व है।
आज के समय में परिवार का स्वरूप बदलता दिखाई दे रहा है— शहरों में अलग, गांवों में अलग। कुछ परिवार ऐसे भी हैं जो शहरी जीवनशैली को अपनाकर अपने रिश्तों की आत्मीयता को धीरे-धीरे सीमित करते जा रहे हैं।
शहरों में अधिकतर घर ऐसे देखने को मिलते हैं, जहाँ परिवार के सदस्यों के बीच मेलजोल और संवाद कम होता जा रहा है। व्यस्त जीवन, कामकाज और व्यक्तिगत आवश्यकताओं के कारण लोग एक ही छत के नीचे रहकर भी दूरियों का अनुभव करते हैं। बड़े त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों या किसी दुर्घटना के अवसर पर ही सभी सदस्य एकत्रित होकर आपस में संवाद करते हैं, और वही समय उनके लिए सबसे अनमोल बन जाता है।
वहीं गांवों में आज भी परिवार का वास्तविक स्वरूप अधिकतर जीवित है। यहाँ परिवार के सभी सदस्य साथ रहते हैं, एक-दूसरे के सुख-दुख में सहभागी बनते हैं, और हर कार्य को मिलजुल कर संपन्न करते हैं। समय-समय पर वे न केवल अपने परिवार, बल्कि पड़ोसियों और समाज के अन्य लोगों के भी काम आते हैं। दूसरों के सुख-दुख में शामिल होकर मानवता और अपनत्व का परिचय देते हैं।
गांवों की यही विशेषता उन्हें सामाजिक रूप से अधिक समृद्ध बनाती है, जहाँ रिश्तों की गर्माहट, सहयोग और संस्कार आज भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। जबकि शहरों में आधुनिकता की दौड़ में यह परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
परिवार का वास्तविक अर्थ केवल साथ रहना नहीं, बल्कि साथ निभाना, समझना, सहयोग करना और एक-दूसरे के जीवन में भावनात्मक सहारा बनना है। जहाँ प्रेम, सम्मान, त्याग और विश्वास होता है, वहीं सच्चे परिवार की नींव मजबूत होती है।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता के साथ-साथ पारिवारिक मूल्यों को भी संजोकर रखें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी परिवार के वास्तविक महत्व को समझ सकें और समाज में प्रेम, एकता तथा सहयोग की भावना बनी रहे। वही पर कुछ परिवार में ऐसे लोग आ जाते है जो आपसी मतभेद पैदा कर प्रेम, विश्वास की नींव को कमजोर कर देते है और जो सुख शान्ति रहती हैं उसे भी खत्म कर देते है आपसी स्नेह खत्म, सहयोग खत्म, अटूट संबंधों में खटास शुरू हो जाती है तब ऐसे समय पर शील, क्षमा, संतोष,विरह की जगह क्रोध,लोभ,अंहकार, अहिंसा ले लेता है और आज के समाज के अधिकतर परिवारों में यही स्थिति चल रही है। वास्तविकता तो यह है कि परिवार का मतलब जो हर पल, हर क्षण, हर स्थिति में कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा हो और दुख सुख बांटे, सहयोग करे, जिसका साथ मानो स्वर्ग की अनुभूति कराए उसे परिवार कहते हैं।
जहाँ अपनापन हो, निस्वार्थ प्रेम हो और एक-दूसरे के प्रति समर्पण हो—वही सच्चा परिवार कहलाता है।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता के साथ-साथ पारिवारिक मूल्यों को भी संजोकर रखें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ परिवार के वास्तविक महत्व को समझ सकें और समाज में प्रेम, एकता, सहयोग तथा संस्कारों की ज्योति सदैव प्रज्वलित रहे।
इंजीनियर राजन सोनी अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश