मर्यादाओं के रेशम ओढ़े मैंने जीवन काट लिया,
सबकी थाली भरते-भरते अपने हिस्से छाँट लिया।
जिनको अर्पित स्वप्न किए थे वे ही मुझसे दूर हुए,
राजमहल की चाह न थी फिर क्यों सपने चूर हुए?
पीड़ा के इस शोक तटों पर कब तक दीप जलाऊँ।
कितने गीत लिखूँ मैं तुम पर कितना तुमको गाऊँ।
संघर्षों की पर्णकुटी में मैंने अपनी रातें सींती हैं,
आशाओं के सूने द्वारे चुपके से आरती की है।
वन-वन भटकी सीता वचन निभाने की खातिर,
अपने ही मन के स्वर्ण हिरण को त्याग के आखिर।
अश्रु धार को थामे कब तक स्वयं को ही समझाऊँ।
कितने गीत लिखूँ मैं तुम पर कितना तुमको गाऊँ।
तन के बंधन में रुक्मिणी थी मन की राधा रोती थी,
शक्ति-प्रदर्शन की दुनिया में मेरी प्रीति ही खोती थी।
जहाँ सुदर्शन की जय बोली वहीं बांसुरी चुप थी,
भीतर की कोमल स्त्री हर दिन अपनी ही दोषी थी।
टूटे सपनों के कण चुनकर कब तक हार बनाऊँ।
कितने गीत लिखूँ मैं तुम पर कितना तुमको गाऊँ।
अपने अंतर्मन के रण में मैंने सौ-सौ युद्ध लड़े हैं,
यशोधरा की पीड़ा जैसे मेरे भी स्वर अड़े पड़े हैं।
सबको बुद्ध बनाने में ही खुद को खोता आया हूं
त्याग-दीप बन जलते-जलते राख सा होता आया हूँ।
जीवन के इस रंगमंच पर कब तक रूप सजाऊँ।
कितने गीत लिखूँ मैं तुम पर कितना तुमको गाऊँ।
✍️ राजू धाकड़ सरल