
"मौन की धरा पर
शोर कई धरे हैं,
काबू में हैं कुछ...
कई काबू से परे हैं।
धरे हैं सामने पड़े कुछ
कुछ शालीन मन में धरे है,
मन चिंतन करे कई का...
कई चिंतन-मनन से परे हैं।
करें क्षण-क्षण तंग कुछ
कर-कर तंग कई मूर्छित धरे हैं,
माने मन कुछ की कभी...
कई मन से अभी भी परे हैं।
मौन की धरा पर
शोर कई धरे हैं,
काबू में हैं कुछ...
कई काबू से परे हैं।"
Moon 🙂