
दिनाँक_29_05_2026
विषय_लाल_सूरज_का_काल
जब होती सूर्यास्त की बेला उसे कहते,लाल सूरज का काल
तपता सूरज दिन भर धरती को तपाता हों जाता लालम लाल l
हर चढ़ान के बाद उतार आता,बतलाता लाल सूरज का काल l
आग उगलता सूरज अब अस्त हो रहा,जो आएगा फिर कल l
दिन भर का थका हुआ वो अब ठहर गया,धरती का वो भाल l
ठंडी हवा बही पंछी चहके तपन से मुक्त,हर ज़र्रे ने गाया गान l
पहाड़ों के पीछे छुपने लगी ये लाली,बढ़ने लगी रात ये काली l
ये अंत नहीं आगाज है नयी शुरुआत का चमकेगें फिर कल l
तपती धरती को मिलता आराम जब खूबसूरत होती हर शाम l
ढलते सूरज का यह दृश्य है बेमिसाल,जिसका नहीं बखान l
धरती का जर्रा जर्रा मुस्कुराया,जब आया लाल सूरज का काल l
अंधेरे को चीर कल फिर उगेगा,हो जाएगा सूरज लालम लाल l
शाम होते ही बिदाई की बेला आयी ,सृष्टि ने केसा रचा जाल l
अपना अपना कर्म सब करते रहते क्या चांद सूरज आकाश l
नयी उम्मीद के साथ सब आते जाते रहते ना करते मलाल l
ढलता सूरज सिखाता जो आया वो जाएगा,चाहे दिन या रात l
दिन ढलेगा होगी रात,हों सुख या दुख करेंगे नयी शुरूआत l
संघर्षों की अग्नि में तपकर फिर चमकेगे जग में होगा नाम l
आँधी बारिश हो या हों तूफान तुम छोड़ना ना अपना काम l
आँखों में थोड़ा चुभोगे थोड़ा तपोगे ना रुकना,करते जाना काम l
बनाना अपनी जगह दुनिया मे,चाहे कोई दे कितने भी इल्ज़ाम
परवाह ना करना बातों की बढ़ते जाना,होगा तुम्हारा भी नाम l
काजल मनीष जैन
राजस्थान