
जिस बेवफ़ा की लिक्खी कहानी है इन दिनों
उसकी जफा का आँख में पानी है इन दिनों
कोई भी हक़ वो प्यार का करते नहीं अदा
रस्मे- वफ़ा मुझे ही निभानी है इन दिनों
जाने- बहारां जब से वो मेरे क़रीब है
महकी है रुत फ़िज़ा भी सुहानी है इन दिनों
ख़ुशबू से तर बतर तेरी सांसे हैं जो मेरी
महकी उन्हीं से मेरी जवानी है इन दिनों
मेरा महकता खिलता हुआ देख कर शबाब
चंदा की चांदनी भी दिवानी है इन दिनों
हमदम है हमनवा है मेरा ग़म शनास है
होठों पे जिसका नाम जुबानी है इन दिनों
जिसकी मै ज़िंदगी थी शरीके- हयात थी
दूर उसने मुझसे जाने की ठानी है इन दिनों
ऐ यार आओ प्यास को अपनी बुझा लें हम
दरिया में इक अजब सी रवानी है इनदिनों
उसकी हरिक ग़ज़ल का जो ऊला हूँ "नाज़" मैं
तो वो ग़ज़ल का मिसरा ए सानी है इन दिनों
ममता गुप्ता "नाज़"