स्त्री
VanyA Vaidehi Vani
वो अब सिर्फ एक ललना नहीं,
प्रज्वलित क्रांति का उद्घोष है।
जिसे जग ने उपेक्षित अंन्चिन्हा रखा ,
उसके अंतर्मन में इसका रोष है।
स्त्री जो मौन रहे तो समझ लेना,
उसके भीतर युद्ध प्रचंड पलता है।
स्त्री जब अपनी पर उतर आए,
तो समय भी घुटनों बल चलता है।