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एक अनकही #1

​मनकापुर का वह लड़का, जिसे लोग अब सिर्फ एक 'साया' कहते थे, हर रोज़ शाम की पैसेंजर ट्रेन पकड़कर अयोध्या आता। उसके पास पहनने को ढंग के कपड़े नहीं थे, पर उसकी मुट्ठी में हमेशा एक मुरझाया हुआ कनैल का फूल होता था—वही फूल जो वैदेही को बेहद पसंद था।

​वैदेही, जिसकी शादी एक बहुत बड़े घराने में हुई थी, अब उस शहर की सबसे 'सम्मानित' बहू थी। वह रोज़ अपनी नक्काशीदार खिड़की से सरयू की ओर देखती, पर उसकी आँखों में वह चमक मर चुकी थी जो कभी मनकापुर की सादगी देखकर जागा करती थी।

​वो रात और वो आखिरी मुलाक़ात

​कहते हैं कि एक रात जब अयोध्या की सड़कों पर सन्नाटा था, राघव ने हिम्मत जुटाकर वैदेही के महल जैसी कोठी के पीछे वाले दरवाज़े पर दस्तक दी। वैदेही बाहर आई। उसके माथे पर महँगा सिंदूर था और गले में भारी ज़ेवर, जो उसे किसी कैदी की बेड़ियों की तरह लग रहे थे।

​राघव ने कांपते हाथों से वो फूल उसकी तरफ बढ़ाया और बस इतना कहा, "वैदेही, मनकापुर में आज भी तुम्हारी यादों की फसल लहलहाती है। बस एक बार कह दो कि तुम खुश हो, मैं लौट जाऊँगा।"

​वैदेही ने फूल नहीं पकड़ा। उसने पत्थर की तरह ठंडी आवाज़ में कहा, "राघव, मनकापुर अब मेरे नक्शे में नहीं आता। और यहाँ खुशियाँ नहीं, सिर्फ 'मर्यादा' होती है। तुम चले जाओ, वरना मेरी लाश भी यहाँ के घाटों को मयस्सर नहीं होगी।"

​राघव वापस मुड़ गया। वह रोया नहीं, क्योंकि कुछ जख्म इतने गहरे होते हैं कि खून की जगह ख़ामोशी बहने लगती है। वह सीधे सरयू के उस किनारे पहुँचा जहाँ लाशें जलती हैं। उसने वह फूल जलती हुई एक लावारिस चिता में डाल दिया और बोला, "आज मेरा प्यार भी मुकम्मल हो गया, कम से कम जल तो साथ ही रहे हैं।"

​अगले दिन मनकापुर जाने वाली ट्रेन में एक लाश मिली। उसकी जेब में कोई ज़हर नहीं था, कोई खत नहीं था। बस एक रेल का टिकट था— अयोध्या से मनकापुर तक का, जो कभी इस्तेमाल ही नहीं हुआ।

(कहानी कैसी लगी?)

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