
बस ये जो रिश्ते बन रहे है आजकल,
कुछ दिनों में ही खुदबखुद जाते है ढल,
वो पहले जैसा लगाव हो जाता है कम
जो बहुत बाते है करता वही पड़ जाता है नम,
जैसे वो आरम्भ वाली प्यास हो जाती है खत्म,
फिर बेसुरे होने लगते है धीरे धीरे उसके सारे नज़्म,
फिर क्या सारी बातें एक दिन हो जाती है गुल,
क्यों मिटा ये रिश्ता इसका भेद नहीं पाता है खुल,
फिर किसी और की तलाश हो जाती है शुरू,
पता नहीं कौन होते है ऐसे वाले रिश्ते के गुरू,
मत बनाओ ऐसे रिश्ते जिसका कोई मान नहीं,
क्यों जुड़ना चाहते हो एक दूसरे से जब आपस में पहचान नहीं,
राजन आज का ये डिजिटल युग है,
ऊपर से चल रहा इस समय कलियुग है।।
✍️इंजीनियर राजन सोनी
स्वरचित