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मुलाक़ात

बड़ी मुश्किल से फुर्सत के कुछ लम्हे चुराऊंगा मैं,

भीड़ से निकलकर, पहले घर की तरफ आऊंगा मैं।

​बाहर के शोर ने तो बस मेरा नाम पुकारा है,

अंदर जो सन्नाटा है, उसे गले लगाऊंगा मैं।

​कितना बदला हूँ, और कितना बाकी हूँ अब तक,

हिसाब पुराना है, बैठ कर सुलझाऊंगा मैं।

​मिलूँगा खुद से... तो बताऊंगा मैं।

थक गया हूँ चेहरों की नुमाइश करते-करते,

अब सादगी ओढ़कर, आईने से नज़र मिलाऊंगा मैं।

​ज़माने की शिकायतों का बोझ बहुत ढो लिया,

अब अपनी कमियों को भी, थोड़ा सहलाऊंगा मैं।

​मिलूँगा खुद से... तो बताऊंगा मैं।

✍🏻 -कलश

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