
कोई अपना होता है
उसका एक सपना होता है
हम उसको, पूरा करना चाहते है
जो हमको संग- संग कर देता है
रात घनी अंधेरी होती है
और उसका इक, पर्दा होता है
फिर, कमी खुशबूदार हो जाती है
फिर सुबह-सवेरा होता है
हम, फिर दफ्तर जाते है
उन्हीं, सपनों में खो जाते है
फिर कोई लौटकर जाता है
और हम फिर, अकेले हो जाते है
हम फिर एक, नया बोझ उठाते है
हमे, फिर एक नया, सपना आता है
और हम, फिर से खो जाते है
फिर, नए गीतों को गाते है
सुनने को खबर लगाते है
खबरें भी उनकी चलती है
जो लोग सफल हो जाते हैं
हमको फिर, याद कोई, अपना आता है
उसकी नजरों का, सपना आता है
और हम फिर उसको, पूरा करने में लग जाते है
फिर इक, ख्बावों की हमको, अवाज सुनाई देती है
जो, हमको तन्हाई देती है
फिर से हम, अगर और लेकिन में खो जाते है
फिर सबकुछ होता रहता है
बस सपनें-अपनें मर जाते है
जीवन एक, खाई दिखाई देता है
जिसमें हम अपना-सपना खो देते है
जिंदगी अपनी उपहार किसी को देते है
और, मरते दम तक भी हम, मर नहीं पाते है
चूकि पूरी जिंदगी ही मर कर जीते है
हम जिनके सपनें अधूरे रहते है
हम जीते नहीं है बस जिंदा रहते है....
- विवेक राहुल