
01
कभी शोला कभी शबनम ,कभी अंगार होती है।
कभी पाषाण सी निष्ठुर सुमन सुकुमार होती है।
बदलता वक्त जब -जब है, बदलती है अदाएं यह,
कभी यह ज़िन्दगी कश्ती,कभी पतवार होती है।।
02
साँसों की बंसी को स्वरों से सजाना चाहिए।
ज़िंदगी की ग़ज़ल को गुनगुनाना चाहिए।
रोने से भरती नहीं हैं,दर्द की ये घाटियां
मुस्कानो के नित नए शिखर बनाना चाहिए।।
डॉ रागिनी स्वर्णकार,इंदौर
