
दिनाँक_19_05_2026
विषय_पत्थर
स्वरचित
पत्थर हूँ मैं मुझमें भी नमी हैं दर्द मुझे भी होता है पर सब समझते मुझमे ये कमी है l
छेनी हथौड़े की मार जब पडी दर्द मुझे भी होता पर उफ्फ भी नहीं करता मेरा दर्द मुझमे दबा है l
मेरा रूप बदल बदल मुरत बनाई जाती कल तक पैरों में पड़ा था अब पूजा रचाई जाती है l
कोई ठोकर मारता कोई शीश झुकाता कोई राह की बाधा कहता तो कोई महल बनाता है l
धीरज रख सब सहता सब जरूरत के हिसाब से उपयोग करते जरूरत ना हो तो कीचड़ में उछालते है l
काजल मनीष जैन
राजस्थान