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भाग 8 सफलता की ओर कदम

पहली नियुक्ति और भविष्य की राह

शादी के कुछ महीने बाद ही, 12 अक्तूबर 2009 को मुझे संविदा शिक्षक वर्ग-3 के रूप में राजगढ़ जिले के एक प्राथमिक विद्यालय में पहली नौकरी मिली। यह मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था। मात्र 2200 रुपये मासिक वेतन के साथ यह मेरी पहली बड़ी सफलता थी। सीहोर जिले में मेरा निवास था, जबकि मेरी नौकरी राजगढ़ जिले में। रोज़ का सफर और काम का दबाव, दोनों ही चुनौती पूर्ण थे।

लेकिन यह वह मुकाम था, जिसने मुझे अपने भविष्य को लेकर पहली बार आश्वस्त किया। मुझे एहसास हुआ कि मेरी मेहनत रंग ला रही है और मैंने अपने जीवन के संघर्षों में एक बड़ा कदम पार कर लिया है।

इस नौकरी ने मुझे न केवल आर्थिक रूप से बल्कि भावनात्मक रूप से भी मजबूत बनाया। मैंने महसूस किया कि सही दिशा में निरंतर प्रयास करने से असंभव भी संभव हो सकता है। मेरे परिवार और पत्नी का साथ मेरे लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत बना।

यह कहानी न केवल मेरे जीवन के उतार-चढ़ाव को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि संघर्ष और ईमानदारी से भरा जीवन कैसे एक साधारण इंसान को सफलता की ओर ले जा सकता है।

शुरुआत और चुनौतियाँ

भाग 8 सफलता की ओर कदम

मेरी रुचि के अनुसार ही मुझे मेरा कार्य मिल चुका था—एक शिक्षक के रूप में मेरी पहली नियुक्ति एक प्राथमिक विद्यालय में हुई, जहाँ 100% छात्र मेवाती (मुस्लिम) समुदाय से आते थे। विद्यालय की कुल छात्र संख्या 102 थी, लेकिन मुश्किल से 10-15 बच्चे रोजाना स्कूल आते थे।

ये बच्चे अपनी कक्षा की मूलभूत दक्षताओं से कोसों दूर थे। अभिभावक केवल सरकारी सुविधाओं के लालच में बच्चों का नामांकन करवा देते थे, पर वास्तव में शिक्षा को लेकर उनका कोई उत्साह नहीं था। इसका एक बड़ा कारण था सरकारी शिक्षकों और स्कूलों पर विश्वास की कमी। इसके साथ ही, मुस्लिम समुदाय के अधिकांश अभिभावक मदरसा की शिक्षा को ही प्राथमिकता देते थे। हालात कठिन थे, और गाँव वालों का सहयोग भी न के बराबर था। फिर भी मुझे विश्वास था कि समय के साथ मैं बदलाव ला पाऊँगा।

विद्यालय में हम दो शिक्षक थे। जब मैं पहली बार स्कूल पहुँचा, तो मुझे देखकर 5-10 बच्चे किसी तरह स्कूल आ जाते थे। वे दोपहर तक रुकते, फिर मध्यान्ह भोजन के बाद घर चले जाते। इसके बाद का समय मैं अकेले ही स्कूल में बैठा रहता था। मेरे सीनियर शिक्षक अक्सर प्रबंधकीय कार्यों में व्यस्त रहते थे—कभी संकुल केंद्र की मीटिंग, कभी दस्तावेज तैयार करना। शुरू में, स्कूल में इस तरह खाली बैठना मुझे भीतर से खाए जा रहा था। ऐसा लगता था मानो मैं केवल शासन की सेवा के नाम पर तनख्वाह ले रहा हूँ, लेकिन जिस काम के लिए मुझे नियुक्त किया गया था, वह तो हो ही नहीं रहा था।

पहला प्रयास और असफलता

अगले दिन, मैंने सख्ती से निर्णय लिया। मैंने लंच के बाद किसी भी बच्चे को घर जाने नहीं दिया और स्कूल की छुट्टी केवल समय पर ही की। लेकिन इसका उल्टा परिणाम निकला—अगले दिन वे बच्चे भी स्कूल नहीं आए जो पहले आ रहे थे। अब मैंने गाँव के अभिभावकों से संपर्क किया और पूछा कि उनके बच्चे लंच के बाद स्कूल क्यों नहीं आते। उन्होंने बड़े ही सीधे तरीके से जवाब दिया, “सर, बच्चे दोपहर बाद मदरसा जाते हैं। आप तो बस दो बजे तक पढ़ा दो, हमें कौन-सी नौकरी लगवानी है।“

मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि मदरसा की शिक्षा के साथ-साथ यह शिक्षा भी महत्वपूर्ण है, पर उनका जवाब साफ था। “अगर आप चार बजे तक स्कूल लगाएंगे, तो हमारे बच्चे नहीं आएंगे। हमें अपने धर्म की शिक्षा भी देनी है। आपकी नौकरी तो चल ही रही है, बच्चे आएं या न आएं।“

मैंने यह बात अपने सीनियर शिक्षक से साझा की, तो उन्होंने हँसते हुए कहा, “प्रशांत, यहाँ तो ऐसा ही चलता है।“ मैंने पूछा, “लेकिन सर, जब कोई निरीक्षण करने आएगा, तब क्या करेंगे?” उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “यह बात सब जानते हैं कि ये लोग पढ़ना ही नहीं चाहते।“

नई रणनीति: शिक्षा की बुनियाद मजबूत करना

मेरे निजी विद्यालय के संचालन के अनुभव ने मुझे यह सिखाया है कि शायद ही कोई माता-पिता ऐसे होंगे, जो अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा से वंचित रखना चाहते हों। हर माता-पिता का सपना होता है कि उनके बच्चों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा मिले और वे एक उज्ज्वल भविष्य की ओर अग्रसर हों। लेकिन जब आर्थिक रूप से कमजोर माता-पिता अपने बच्चों को इस उम्मीद के साथ विद्यालय भेजते हैं कि वे वहां उच्च गुणवत्ता की शिक्षा पाएंगे, तब उनकी अपेक्षाएँ उस समय टूटने लगती हैं, जब शिक्षा के नाम पर केवल खाना पूर्ति होती है और शिक्षक अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय केवल वेतन लेने तक सीमित रह जाते हैं। इस स्थिति में धीरे-धीरे उन अभिभावकों का शिक्षा व्यवस्था से विश्वास उठने लगता है। जब उन्हें यह अहसास होता है कि उनके बच्चों को सही मार्गदर्शन और शिक्षा नहीं मिल रही है, तो वे इस सोच में पड़ जाते हैं कि क्या बच्चों को रोजगार की दिशा में लगाना अधिक फायदेमंद होगा। इस निराशा में, कई बार वे बच्चों को छोटी उम्र से ही किसी कार्य में लगा देते हैं ताकि कम से कम वे अपनी आजीविका कमा सकें और भविष्य में उन्हें रोजी-रोटी के लिए संघर्ष न करना पड़े। संविधान का अनुच्छेद 23 और 24 हमारे देश में शोषण और बाल श्रम पर रोक लगाने के अधिकार देते हैं, लेकिन क्या यह कानून अकेला पर्याप्त है?

जब माता-पिता के पास अपने बच्चों को अच्छे विद्यालय में दाखिला दिलाने की आर्थिक क्षमता नहीं होती, और जब वे सरकारी या सस्ती शिक्षा व्यवस्था से निराश हो जाते हैं, तो अपने बच्चों के भविष्य के लिए वे उन्हें किसी कौशल या काम में लगा देते हैं। उनका यह निर्णय अपने बच्चों के भविष्य की सुरक्षा के लिए होता है, क्योंकि हर माता-पिता के लिए अपने बच्चों का भविष्य सबसे बड़ा प्रश्न होता है। यहाँ आवश्यकता है कि हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी हो जो न केवल गुणवत्ता पूर्ण हो बल्कि सभी तक समान रूप से पहुँचे, ताकि कोई भी माता-पिता इस असमंजस में न पड़ें कि उनके बच्चे पढ़ाई से वंचित रहें या मजबूरी में काम में लग जाए।

शिक्षा का उद्देश्य केवल साक्षरता देना नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना है। अगर हम इस उद्देश्य को वास्तविकता में बदल सकें, तो देश के हर बच्चे के लिए एक उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकेंगे।

“अंधेरे इतने गहरे थे कि रास्ता दिखना बंद हो गया था… लेकिन क्या एक चिंगारी पूरी जिंदगी रोशन कर सकती है?”

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