जब छात्रावास इंचार्ज ने हम छहों पर घर जाने की पाबंदी लगा दी तब चाचा के लडकों ने अपनी मांओं को यह बात बता दी. तो चाचीयों ने अपने बच्चों को तरकिब बताई की अगर छात्रावास इंचार्ज घर नहीं आने दें तो तुम सब खाना खाने के बाद टहलने के बहाने दीपक को बाहर घुमाने फिराने ले जाया करों. और दो तीन घंटे बाद छात्रावास में वापस लेकर आना. फिर थोडी देर पढाई करने देना और कमरे की लाइट बंद करके सो जाना. अब चाचा के लडकों ने ऐसा ही करना शुरू कर दिया. स्कूल से छात्रावास में वापस आने पर शाम का खाना खाने के बाद चाचा के लडके बोलते की चल दीपक हम थोडा घुम फिर कर आतें हैं. थोडा खाना पचाने के लिए. चलकर आतें हैं. और मैं भी उन्हें ना नहीं बोल पाता था. और चाचा के लडकों के साथ छात्रावास से बाहर घूमने निकल जाता था. छात्रावास से बाहर थोडी बहुत देर बाहर घूमने में कोई मनाही नहीं थी. इसलिए चाचा के लडके मुझे भी अपने साथ बाहर लेकर जाते थे. पर चाचा के लडके थोडी देर के बजाय दो तीन घंटे तक शहर में जो भी देखने लायक चीजें थीं. उन्हें देखने में गंवाते थे. फिर घुम फिरकर वापस छात्रावास में आतें और थोडी देर के लिए किताबें उठाकर देख लेते. वह भी इसलिए कि छात्रावास के इंचार्ज ने राउंड लगाना शुरू कर दिया था. और वह भी सिर्फ हम छहों को देखने के लिए. कि यह छः के छः छात्रावास में ही है या घर भागकर चलें गये है. और अगर छात्रावास में ही है तो फिर पढाई- लिखाई में ध्यान हे भी या नहीं जब छात्रावास इंचार्ज हमें पढाई करते देख लेते तो इंचार्ज sir को हम पर भरोसा आ जाता की चलों पढाई कर रहे हैं. जब इंचार्ज हमें देखकर छात्रावास से चलें जातें तो यह पांचों यहां वहां की बातें करने लग जाते. ना खुद पढाई करते थे. और ना ही दुसरो को करने देते थे. और मुझे पढाई से रोकने के लिए तो स्पेशल गये थे. मेने सोच लिया था कि अगर मैं इनके साथ रहा तो यह पांचों मुझे पढाई बिल्कुल भी नहीं करने देंगे. और ऐसा ही पुरे साल हुआं भी फिर परीक्षाएं आ गई छहों ने पेपर दिए. और परीणाम सबका फेल आया. और जब सबका परिणाम फेल आया तो छात्रावास इंचार्ज ने हम छहों को छात्रावास से बाहर निकाल दिया. और अब जब मेरे घर माता- पिता और भाई को पता चला कि मैं फेल हो गया हुं तो मां ने कहा कि अब सब इसकी पढाई लिखाई बंद करों. और खेतों में हमारे साथ काम पर चलों. बहुत पढाई- लिखाई कर ली सोचा था कि पढ लिख जायेगा तो कहीं छांव में कुर्सी पर बेठकर नोकरी करेगा. धुप बरसात से बच जायेगा. पर नहीं जो हमने किया यह भी वहीं करना चाहता है. तो फिर ठीक है वहीं करों और मरो. सोचा था कि पढ लिख जायेगा तो सरकारी नौकरी लग जायेगा तो हम भी चार लोगों में शान से और सीना ठोककर कहेंगे कि हमारा लडका सरकारी नौकरी में हैं. हमारा लडका है. इस सपुत ने तो हमें कहीं का नहीं छोडा. जब मां ने इतनी सारी बातें मुझे बोली तो दिमाग में गुस्सा चढ गया. मन ही मन भगवान से प्रार्थना की कि भगवान मुझे बस एक मौका चाहिए में कभी आपको भी यह बोलने का मौका नहीं दुंगा कि बेटा तुझे फिर से फेल हो गया. और ना कभी माता- पिता को यह बोलने दुंगा. तो भगवान ने माता- पिता से मुझे दुसरा मौका दिलवा दिया. और माता- पिता ने कहा कि यह तेरा आखरी मौका है अगर इस बार भी फेल हुआ तो फिर हमारे साथ खेतों में काम करना. तो मैंने माता- पिता को हामी भर दी. और दोबारा से मुझे स्कूल में भर्ती करवाया गया. उस साल मेरे माता- पिता और चाचा- चाचीयों की एक बात पर से लडाई- झगडे हो गये थे. तो मेरे माता- पिता, चाचा- चाचीयों से बातचीत बंद हो गई थी लेकिन हम बच्चें बात करते थे. वह भी सिर्फ स्कूल में. गांव में या घर पर नहीं करते थे. अब जब चाचा- चाची को पता चला कि दीपक को फिर से स्कूल में बिठा दिया है तो चाचीयों ने भी अपने बच्चों को स्कूल में फिर से भर्ती करवा दिया. अब पहले हम छात्रावास में रहते थे तो. हमें स्कूल जाने में परेशानी नहीं होती थी. लेकिन अब घर से दो किलोमीटर दूर चलकर रोड पर जातें थे. फिर बस आतीं थी. फिर उसमें बेठकर शहर जाते थे. और फिर चौराहे से एक किलोमीटर चलकर स्कूल में पहुंचते थे. अब तीन महीने तक ऐसा किया फिर चाचा चाची गांव से बाहर कमाने चले गए. तो अपने बच्चों को मेरे एक चाचा का मकान कसरावद में ही था. पहले मेरे एक चाचा की नोंकरी कसरावद में ही थी. फिर चाचा का ट्रांसफर दुसरे गांव में हो गया तो वै उस गांव में चलें गए. पर उनका मकान खाली पडा था. तो चाचा के लडके तो वहां रहने चले गए. और अब मैं मोहल्ले से स्कूल जाने में अकेला रह गया. और मैं चाचा के लडकों के साथ चाचा के घर में रह नहीं सकता था. क्योंकि माता- पिता और चाचा- चाची की लडाई झगडे हो गये थे. तो बातचीत बंद थी. और मेरे घरवाले भी बाहर गांव काम करने गए थे. घर पर मैं और पापा थे. तो अब मोहल्ले में अकेला रहने की वजह से अकेले स्कूल जाने में मेरा भी मन नहीं लगता था. तो कभी स्कूल जाता था. और कभी नहीं जाता था. ऐसे करते- करते मेरा स्कूल में अटेंडेंस स्कोर कम हो गया. और स्कूल से एक चिट्ठी मेरे घर आयी जिसमें लिखा था कि आपका बच्चा पुरे महिने स्कूल नहीं आया है. इसका कारण बताईए. फिर मैंने यह बात पापा को बता दि तो पापा ने कहा कि चल मैं तेरी स्कूल में चलता हूं तेरे हेडमास्टर से बात करता हूं. फिर पापा मेरे साथ स्कूल में गये और हेडमास्टर से बात की लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. फिर पापा वापस घर आ गए. फिर मैंने परीक्षा दी तो मैं पास हो गया था. लेकिन थर्ड डिवीजन से पास हुआ था. फिर मैं दसवीं कक्षा में चला गया. फिर तीन महीनों बाद दसवीं कक्षा में प्रवेश लिया तो. दसवीं कक्षा में ट्युशन लग गया था. ट्युशन में चाचा के लडके भी जाते थे. मेरा पढाई में ध्यान ज्यादा लगने लगा था. तो चाचा के लडके मेरा ध्यान ही रखते थे कि दीपक का पढाई में ध्यान ज्यादा लग रहा है कि कम लग रहा है. चाचा के लडके मुझे नोटिस कर लिया करते थे. क्योंकि स्कूल में उनके साथ ही रहता था. अब हमारे घरवाले भी काम करके वापस आ गए थे. अब जब में दसवीं कक्षा में पढाई में ध्यान ज्यादा लगाने लगा तो मेरी जानकारी चाचा के लडके अपनी मांओं को आकर बता दिया करते थे. फिर मेरी चाचीयां कोई नतीजा तीकडम तैयार करतीं ताकि मेरा पढाई करने में मन नहीं लगे. पढाई से मेरा ध्यान हटाने के लिए चाचीयां अपने घर पर कोई ना कोई भगवान के नाम पर अनुष्ठान करवा दिया करतीं थीं. जिसमें उनके बच्चे प्रसाद के रूप में स्कूल जातें समय नाश्ता लेकर जाते और मुझे खिलाते क्योंकि उस नाश्ते में चाचीयां तांत्रिको से कोई टोटके करवा दिया करतीं थीं. ताकि जब मैं नाश्ता करु तो मेरे ऊपर टोटके का असर हो जाय और मेरा पढाई करने में मन कम लगें. यानी कि में फेल हो जाऊं और उनके बच्चे पास हो जाएं. लेकिन मेरे साथ हमेशा स्प्रीट गाइड रहती है. मुझे ना तो कोई कुछ खिला सकता है. ना कोई मुझे हानी पहुंचा सकता है. अगर मैं अपनी मर्जी से कोई चीज किसी से लेकर खां भी लु तो उस चीज का असर सिर्फ मेरे शरीर पर होता था. मेरे दिमाग को या मन को वश में नहीं कर सकता था. सिर्फ शरीर पर असर होता था. और शरीर पर भी Kiss तरह से जैसे कि मुझे सर्दी लग गई, हल्का बुखार आ गया पैर दर्द सिर दर्द बस इतना ही इससे ज्यादा कुछ नहीं. जब चाचीयों ने देखा कि मेरे ऊपर उनके टोटके ने कोई असर नहीं दिखाया तो चाचीयों को मुझ पर और ज्यादा गुस्सा आये कि सब लोगों पर टोटके का असर हो जाता है. पर दीपक पर असर क्युं नहीं होता है. तो चाचीयां जब देखें कि मेरे ऊपर टोटके का असर नहीं हुआ और मैं फिर भी दुगुनी तेजी से पढाई करने में मन लगाता तो चाचीयां तांत्रिको से लडाई- झगडे करतीं की हमसे पैसे ले लिए. और काम नहीं किया हमारा. अगर तांत्रिको के टोटके फेल होंगे तो समाज में उनका नाम भी खराब होगा. फिर उन्हें भी डर लगता कि अगर हमारे टोटके ने असर नहीं दिखाया तो फिर हमारी दुकान बंद हो जाएगी. फिर तांत्रिक ज्यादा तेज असर करने वाला टोटका करते तो असर तो वह भी नहीं होता था पर तांत्रिक भी काली माता के नाम से टोटका करके देते थे. अब अगर उनका टोटका फेल हो गया तो फिर काली माता को बदनाम होना पडेगा. इस वजह से दुसरी बार मेरे ऊपर टोटके का असर हो जाता था. तो मैं सिर्फ बीमार पडता था. अब बीमार भी होता था तो पढाई से कुछ समय के लिए ध्यान तो भटक ही जाता था. पर मैे कभी हार नहीं मानता था. भले ही कम नंबरों से पास हुआ लेकिन चाचीयों को अपने मनसुबो में सफल नहीं होने दिया. और दसवीं की परीक्षा में मोहल्ले में सिर्फ अकेला ही पास हुआ. बाकी सब फेल हो गए. हम छः के अलावा दुसरे बच्चें भी दसवीं कक्षा में पडते थे. और ट्युशन टीचर ने भी शाबाशी दी की बीस बच्चों में से केवल दो बच्चे पास हुए एक में था और एक मेरे ही गांव का दूसरी cast का लडका था. बस हम दो ही लडके पास हुए बाकी चाचा के लडके सबके सब फेल हो गए. जब फेल हो गए तो फिर उन्होंने स्कूल भी छोड ही दिया. और गुजरात चले गए. फिर मैं भी अपनी स्कूल की छुट्टियों में अपनी दीदी के घर सुरत घुमने फिरने चला गया. जब दीदी के घर गया तो जीजाजी ने थोडा सुरत शहर में घुमाया- फिराया फिर मुझे घुमना- फिरना अच्छा नहीं लगता था. तो जीजाजी ने मुझे एक कंपनी में नौकरी दिलवा दि. कंपनी में काम करता रहा. फिर तीन महीनों बाद में वापस घर आ गया. तो अब मैं ग्यारहवीं कक्षा में था. अब ग्यारहवी में विषय लेना था. पर दसवीं के विषयों में मेरे नंबर बहुत कम थें. गणीत में भी कम थें और विज्ञान में भी कम थें. पर उसी स्कूल से मेरे बडे भाई ने भी गणित विषय से पढाई की थी. तो मेरे बडे भाई के नेचर बिहेवियर को ध्यान में रखते हुए मुझे बायलोजी विषय में प्रवेश दे दिया गया. फिर ग्यारहवी में भोतीक शास्त्र और रसायन शास्त्र और जीव विज्ञान जैसे विषय देखने को मिलें. जीव विज्ञान तो समझ आ जाए लेकिन भोतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र दिमाग के ऊपर से निकल जाय. पर अब क्या कर सकते हैं. विषय ले तो लिया था. अब जैसे तैसे निकालना पडेगा. लेकिन फिर भईया ने मुझे ट्युशन लगवा दिया. कि नये विषय है दीपक को जल्दी समझ नहीं आयेंगे. तो भईया ने मुझे भोतिक शास्त्र और रसायन शास्त्र विषय की ट्युशन लगवा दिया. फिर जब मैं दो विषयों की जिन शिक्षकों के पास ट्युशन जाता था. मेरा बडा भाई उन शिक्षकों को अच्छे से पहचानता था. मेरे बडे भाई ने भी उन्हीं शिक्षकों के पास से ट्युशन ली थी. तो भईया ने दोनों शिक्षकों से बोल दिया था कि मेरा छोटा भाई है. थोडा आप देख लिजियेगा. जब दोनों शिक्षकों ने मेरा हाव भाव देखा तो दोनों शिक्षक समझ गये कि बहुत सीधा- साधा बच्चा है. पर पढाई करने में ध्यान हैं. जब दोनों शिक्षकों कि कक्षा में, मेरा पढाई करने में ध्यान अच्छा है. तो फिर आपसे जलने वाले भी तैयार हो जाते हैं. आपको नुकसान पहुंचाने वाले भी तैयार हो जाते हैं. और जलने वाले आपकों उस व्यक्ति की नजरों में गिरा देते हैं जो आपको पसंद करता है. या जो आपकी मदद करता है. तो अब ट्युशन क्लास में कुछ बच्चे थे जो जिनको मुझसे जलन होने लगी थी. की में पढाई करने में अच्छा प्रदर्शन कैसे कर रहा हूं. और ट्युशन टीचर की नजर में अच्छा कैसे कर पा रहा हूं. तो मेरे अच्छे प्रदर्शन को धुमिल करना जरूरी है. ट्युशन टीचर की नजरों से मुझे उतारना जरूरी है. तो लडकों ने मुझे कहा कि मैं पिछे बैठने लग जाऊं उनके साथ तो मुझे लडकों की बातों में षडयंत्र जैसा कुछ लगा नहीं तो मैं पीछे जाकर बैठ गया. जब ट्युशन टीचर क्लास में पढाने आये तो मुझे पिछे बैठा देख थोडा सोच में पड गये. पर बच्चों के सामने जाहिर नहीं होने दिया. ट्युशन टीचर जैसे रोज पढाते थे. वैसे ही आज भी पढाकर चले गए. मुझसे जलने वाले लडकों ने सोचा था कि ट्युशन टीचर मुझे पिछे बैठा देखकर आगे बैठने के लिए बोलेगें. पर टीचर ने ऐसा कुछ नहीं किया और जैसे रोज साधारण तरीके से पढाई करवाते हैं. वैसे ही आज भी पढाई करवाकर चलें गये. यह सारा माजरा देखकर लडकों का दिमाग घुम गया. कि ट्युशन टीचर ने कोई रियेक्शन क्युं नहीं दिया. फिर अगले दिन भी लडकों ने मुझे अपने साथ ही बिठाया यह सोचकर कि टीचर आज कुछ ना कुछ तो बोलेंगे ही सही पर आज भी sir साधारण रुप में पढाते रहे. तो जब sir पढा रहे थे तो लडकों ने आपस में बात की और कहा कि यार sir की आवाज सुनाई नहीं देती है. सब मिलकर sir को बोलों की थोडा जोर लगाकर पढाएं. फिर पिछे बेठने वाले आठ- दस लडकों ने sir को बोला कि sir आपकी आवाज हमें सुनाई नहीं दे रही है. उन लडकों ने अपने इस षडयंत्र में मुझे भी शामिल कर लिया था. जब लडकों ने sir से ऊंची आवाज में पढाने के लिए बोला तो sir ने पिछे देखा तो sir की एक नजर मेरी तरफ भी गई, तो मेने हल्का सा मुस्कुरा दिया. तो ट्यूशन टीचर समझ गये की लडके मुझे फसा रहें हैं और sir की नजरों में गलत साबित करना चाहते हैं. और फिर गुरु तों गुरु होता है. उनके पास हर साल नये बच्चें पढने आते हैं. अनुभव हो चुका था. sir को कि कौन बच्चा पढाई करने आता है और कौन बच्चा टाइम पास करने आता है. और कौन बच्चा दुसरे बच्चों को परेशान करने आता है. ट्युशन टीचर ने लडकों की बातों को समझते हुए कहां ट्युशन टीचर का लडका भी हमारे साथ पडता था. उसका नाम अभिषेक था. तो ट्युशन टीचर ने अभिषेक को कहा कि तुम कल मार्केट से एक स्पीकर लें आना. ठीक है. आज पढ लो कल से हम एक स्पीकर की व्यवस्था कर लेंगे. फिर अगले दिन स्पीकर पिछे रख दिया गया उन लडकों में मै भी था. अब sir स्पीकर में बोले तो स्पीकर की आवाज हम आठ- दस लडकों के कान फोडे तो हम आठ- दस लडकें इधर- उधर खिसके तो ट्युशन टीचर आठ- दस लडकों की हरकतों को देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहे थे. फिर दो चार दिन जाने के बाद लडकों ने स्पीकर से पढने के लिए मना कर दिया. कि sir स्पीकर में आवाज गूंजती है. स्पीकर को हटा दिजिए और आप साधारण तरीके से ही पढाएं हम आपकी आवाज पर ही पुरा ध्यान लगाएंगे. तो sir हस पढें. sir ने कहा कि ठीक है. फिर मैं जब ग्यारहवी कक्षा में था तो मेरे गांव का एक लडका इंदौर में पाॅलिटेक्निक डिप्लोमा की पढाई कर रहा था. तो वह छुट्टीयों में गांव आया था. तो वह मेरे घर ऐसे ही टहलते हुए आ गया तो वह मेरे भाई से बातचीत करने लगा तो भईया ने उससे पूछा कि तुम क्या कर रहे हो. तो उसने फिर भईया को अपने कोर्स के बारे में जानकारी दी. तो भईया ने कहा कि इस कोर्स को कोन- कोन कर सकता है. Kiss उम्र का क्या एजुकेशन होना चाहिए. तो लडके ने बताया कि इस कोर्स में दसवीं कक्षा पास होना चाहिए. बाकी उम्र की कोई पाबंदी नहीं है. तो भईया ने कहा कि मेरा दीपक फार्म भर सकता है. क्या तों लडकें ने कहा कि हां भर सकता है. पर पहले इस कोर्स की परीक्षा पास करना पडेगी. उसके बाद ही इस कोर्स में प्रवेश मिलेगा. तो भईया ने पुछा कि इस कोर्स की परीक्षा कब होगी तो लडके ने उसी महिने में तारीख थी. तो भईया ने उससे तारीख पता कर लिया. फिर फिक्स तारिख पर खरगोन जाकर पाॅलिटेक्निक का फार्म ले आएं. और घर से भरकर वापस सबमिट कर दिया फिर परीक्षा के लिए किताबें भी खरीद लाए ताकि मैं परीक्षा की में पढाई कर सकुं फिर ग्यारहवी की परीक्षा और पाॅलिटेक्निक डिप्लोमा कोर्स की परीक्षा की तैयारी साथ में करने लगा. फिर ग्यारहवी की परीक्षा को थोडा समय था और डिप्लोमा की परीक्षा नजदीक थी. तो मैं डिप्लोमा की परीक्षा की तैयारी पर ज्यादा ध्यान लगा रहा था. फिर एक महीने की तैयारी के बाद परीक्षा का प्रवेश पत्र आया. फिर सब तैयारी के बाद परीक्षा देने के लिए खरगोन लेकर गये. फिर मैं परीक्षा सेंटर पर अंदर कमरे में चला गया और भाई बाहर इंतजार करने लगे. फिर परीक्षा हाल में पेपर लेने वाले sir ने बारशीट भरने के नियम बताए और फिर आधे घंटे के बाद पेपर शुरू हो गया. फिर मैंने भी सभी सवालों के जवाब पेंसिल से काले कर दिए और जब पेपर का समय खतम हो गया तो परीक्षा हाल से बाहर आ गया. फिर भईया ने पूछा कि कैसा गया पेपर तो मैंने बताया कि पेपर अच्छा गया. फिर हम दोनों भाई घर वापस आ गए. फिर मैं ग्यारहवीं की परीक्षा की तैयारी में व्यस्त हो गया. फिर ग्यारहवी की परीक्षा शुरू हो गई, फिर मैंने ग्यारहवीं की परीक्षा के सारे पेपर दे दिए. और अब दोनों परीक्षाओं के परिणामों का इंतजार करने लगा. फिर पालिटेक्निक परीक्षा का परिणाम आ गया. तो मुझे एक सो बीस में से सांहठ नंबर मिलें थे. और गांव से पालिटेक्निक की परीक्षा भी सात- आठ लडकों ने दीं थीं. उन आठ लडकों में से केवल में अकेला ही पास हुआ. फिर जब मैं पास हो गया है. तो भईया ने उस लडके को फोन लगाकर बताया कि दीपक इतने नंबरों से पास हो गया है. अब आगे की प्रक्रिया क्या करना है. तो लडके ने बताया कि अब कम्प्युटर पर जाकर कालेज का सिलेक्शन कर अप्लाय कर दिजिए.