
दिया बुझाने का कोई फायदा नहीं,
जब रात ही भीतर उतर आई हो।
साये भी अब साथ छोड़ने लगे हैं,
जब मन में ही गहरी तन्हाई हो।
बाहर की हवाओं से क्या लड़ना,
जब आग सुलगती हो सीने में।
मिट्टी का घरौंदा तो बना लिया,
पर हुनर न आया यहाँ जीने में।
तुम तेल और बाती को क्यों कोसते हो,
अंधेरा तो दृष्टि का दोष भी है।
मंजिलें तो पुकारती हैं सदा,
मगर राहों में सोया हुआ होश भी है।
मत बुझाओ इसे, जलने दो अभी,
शायद कोई मुसाफिर राह पा जाए।
तुम्हारे हिस्से की थोड़ी सी लौ,
किसी और का जीवन महका जाए।
कलश