अब आठवीं की परिक्षाएं पुरा एक महिना चली. फिर परिक्षा खतम होने के बाद फिर छुट्टियां लग गई, तो मेने छुट्टियों में खेतों में काम किया और नौवीं कक्षा में प्रवेश फिस इकट्ठा की ताकि माता- पिता को स्कूल फिस ज्यादा भारी ना पडे. तीन महीने मेने खेतों में काम किया फिर नौवीं कक्षा के Admission की तैयारी करने में लग गए. जो गांव में स्कूल थी वह आठवीं कक्षा तक ही थी. नौवीं कक्षा के लिए दुसरे शहर जाना पडता था. और शहर गांव से बारह कि. मी दुर था. और स्कूल भी सुबह सात बजे से शुरू होती थी. तो मुझे शहर में स्थित छात्रावास में भर्ती करवा दिया. गया क्योंकि मैं गर्मी के दिनों में तो स्कूल जा सकता हूं लेकिन सर्दी और बरसात में स्कूल नहीं जा पाऊंगा और परेशानी होगी. इससे अच्छा दीपक को कसरावद छात्रावास में भर्ती करवा दो. तो मेरे बडे भाई ने मेरा प्रवेश कसरावद छात्रावास में करवा दिया. फिर जब चाचा- चाची को पता चला कि दीपक को पडने के लिए छात्रावास में प्रवेश दिलाया गया है. तो चाचा- चाची ने भी अपने बच्चों को छात्रावास में भर्ती करवा दिया. ताकि मैं पढाई करके आगे ना निकल जाऊं फिर चाचा- चाची ने अपने बच्चों को छात्रावास में भर्ती करवाने के बाद इंतजार करने लगे कि दीपक जिस दिन छात्रावास में रहने जाए उसी दिन तुम भी जाना. फिर छात्रावास में भर्ती कराने के कुछ दिन बाद मेरे बडे भाई ने मुझे छात्रावास में जाने के लिए बोल दिया कि अब मैं छात्रावास में चला जाऊं और उसी दिन फिर चाचा- चाची ने भी अपने लडकों को तैयार कर दिया फिर हम सब घर से अलग- अलग बाहर निकलें और बस में में चढते वक्त एक साथ हो गये. और छात्रावास में इकट्ठे पहुंचे. फिर छात्रावास में जब सभी दुसरे बच्चें भी रहने आ गए थे. तो छात्रावास के इनचार्ज ने सभी बच्चों को इकट्ठा करके छात्रावास के नियम कनुन अच्छे से समझा दिए. कि आप यहां पढाई करने आए हैं. पढाई करना है. बाहर बेवजह घूमना- फिरना नहीं है. काम हो बिमार हो तो जा भी सकते हो लेकिन अपने से सीनियर या फिर साथ वाले को बताकर बाहर जाना है. हर महीने आपको अपने पर्सनल जरुरत का सामान मिलेगा. जैसे कि कपडे धोने और नहाने का साबुन, तेल, कांच, कंघी, बिस्तर, अलमारी मच्छरदानी, पेन, पेंसिल, काॅपी. सुबह से नास्ता, दोपहर को खाना फिर शाम को खाना खाकर पढाई करना है. और बाहर बेवजह घूमना- फिरना नहीं है. और घर भी बार- बार नहीं जाना है. और अगर कोई बच्चा ऐसा करता है तो फिर मैं उसे छात्रावास से भगा दुंगा और फिर कभी भी वापस नहीं रखुगां. इतना बोलकर सबको अपने- अपने कमरों में भेज दिया. छात्रावास में हमारे गांव के दो तीन लडकें पहले से ही रह रहे थे. वै लडके हमसे सीनियर थे. तो सीनियर लडकों ने जुनियर बच्चों का छात्रावास में वेलकम किया. सीनियर लडकों ने वेलकम के लिए अपने रुम्स में छोटी सी पार्टी की सीनियर लडकों के कमरे जुनियर लडकों से अलग थे. हम गांव से छः लडके गये थे. चार चाचा के लडके थे. एक में और एक और लडका था जो गांव का ही था. वह लडका भी चाचा के लडकों का ही साथ देता था. मुझे परेशान करने में. अब छात्रावास में पहले दिन तो सीनियर ने पार्टी के दिन सभी जुनियर बच्चों से नाम और गांव के नाम पुछे फिर सभी बच्चों को अपने- अपने कमरों में भेज दिया. मुझे तो उस रात माता- पिता और भाई- बहनों के बीना कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. मुझे तो उस दिन रातभर नींद भी नहीं आयी. फिर सुबह होते ही चाय का रास्ता देखने लगा तो एक लडके ने बताया कि छात्रावास में चाय नही मिलती है. तो फिर थोडी देर यहां- वहां टहलते रहा फिर थोडी देर बाद नाश्ते के लिए बुलाया गया तो सभी लडके एक लाइन से थालियां लेकर बैठ गए, फिर सभी बच्चें नाश्ता करके नहाने चलें गए. कुछ बच्चे नहा रहें थे. कुछ बच्चे स्कूल के लिए तैयार हो रहें थे. पानी भी ठंडा था. फिर नहाने के बाद तैयार हुआ और स्कूल चला गया. फिर स्कूल से दस बजे वापस छात्रावास में आया तो छात्रावास में खाना दिया गया. फिर खाना खाकर वापस स्कूल चला गया. फिर बारह बजे छुट्टी हो गई तो वापस छात्रावास में आ गया. फिर एक जगह गुमसुम होकर बैठ गया तो साथ में रहने वाले लडके मुझे समझाने लगे कि हम भी जब पहले दिन छात्रावास में रहने आएं थे तो हमें भी अच्छा नहीं लगता था. घर वालों की बहुत याद आती थी. पर फिर धीरे- धीरे आदत हो गई, तुझे भी आदत हो जायेगी. फिर मैं वापस बिस्तर पर जाकर सोचने लग गया. मैं कभी अकेला रहा नहीं था. वैसे तो कोई भी अकेला नहीं रहा होता है. लेकिन पढाई लिखाई के लिए आपको अकेला रहना ही पडता है. फिर चाचा के लडके भी थे. लेकिन उन्हें चाचीयों ने सीखा पढाकर छात्रावास में भेजा गया था. कि दीपक को पढाई करने मत देना उसका पढाई से हमेशा ध्यान भटकाते रहना है. गांव से हम छात्रावास में सोमवार के दिन गये थे. और आज शनिवार था. और मेरे पास पैसे भी खतम होने को आ गए थे. घर से बीस रुपए दिए थे. पुरे हफ्ते के और मुझे चाय पीने की आदत थी तो मैं चाय पी लिया करता था. तो पैसे खतम होने को आ गए थे. आज मेरे पास सिर्फ पांच रुपए बचे थे. तो मैंने घर जाने की सोची तो मेंने चाचा के लडकों से यह बात बताई तो मैं तो घर जाने की सोच रहा था. चाचा के लडकों ने तो पुरी प्लानिंग ही तैयार कर रखी थी. की स्कूल के बाद घर जाना है. और ऐसा ही हुआ भी पर अब उन्हें घर जाने का जरीया मिल गया. कि अगर कल को छात्रावास के इंचार्ज को पता चला कि सामेडा वाले घर भागकर गये है. तो छात्रावास का इंचार्ज हमें कुछ नहीं बोलेगा. और अगर कुछ बोलेगा भी तो हम दीपक का नाम ले लेंगे कि दीपक को अच्छा नहीं लग रहा था तो यह हमें घर चलने के लिए बोल रहा था. तो हम इसे घर लेकर आ गए यह सोचकर चाचा के लडके मुझे भी घर ले आए. फिर शनिवार को घर पर रहें फिर रविवार को दिनभर रातभर घर पर रहें और सोमवार को वापस छात्रावास में जाना था. छात्रावास का इंचार्ज छात्रावास में नहीं रहता था. वै छात्रावास से बाहर रहते थे. उन्होंने बच्चों की देखरेख के लिए अपने साले को रखा हुआ था. जो काॅलेज की पढाई कर रहा था और साथ ही सरकारी नौकरी की तैयारी भी कर रहा था. तो उसे हमारी देखरेख के लिए रखा हुआ था. तो वै बच्चों पर ज्यादा ध्यान देते नहीं थें कि कोन पढाई कर रहा है. कोन घुम रहा है. कोन कितने बच्चे छात्रावास में उपस्थित हे. कितने बच्चे अनुपस्थित है. और हम सब सोमवार को सुबह- सुबह स्कूल जाते वक्त अपना सामान छात्रावास में रखकर स्कूल चले गए. ना हमारे घर आने पर किसी को पता चला. ना हमारे छात्रावास में जाने पर किसी को पता चला. हम छः के छः कब छात्रावास से घर चले गए और कब छात्रावास में वापस आ गए किसी को कुछ भी पता ही नहीं चला. पता सिर्फ उन्हें था जिनके बाजु में हमारा बिस्तर था. सिर्फ उन्हें हमारे बारे में पता था. और उन्हें भी चाचा के लडके यह बोलकर आये थे कि दीपक को छात्रावास में अच्छा नहीं लग रहा है तो हम सब उसको घर घुमाने फिराने ले जा रहे हैं. अगर कोई हमारे बारे में पुछे तो बहाने बना देना. अभी तो इंचार्ज छात्रावास में रहता ही नहीं था. और उनका साला था वह कभी लडकों की उपस्थिति अनुपस्थिति देखता नहीं था. तो अब चाचा के लडकों ने यह नियम बना लिया था. हर शनिवार का लडकों को मेरे नाम से बोलते और मुझे भी साथ लेकर आते थे. ना खुद पढाई करते थे. और ना मुझे पढाई करने देते थे. और यह बात तो चाचा- चाची ने अपने बच्चों को पहले ही सीखा पढा रखा है. कि दीपक को पढाई लिखाई नहीं करने देना है. खैर यह चालाकियां चाचा के लडके छात्रावास के लडकों से कब तक छुपा कर रख सकते थे. और वै लडके भी सीनियर और दुसरे लडकों को कब तक हमारे बारे में झुट बोला सकते थे. फिर एक दिन हमारे बारे में साथ में रहने वाले लडकों ने सीनियर लडकों को बता दिया कि हम छः के छः हर शनिवार को घर चले जाते हैं. और सोमवार को वापस छात्रावास में आ जाते हैं. फिर जब सीनियर लडकों को पता चला तो हम सभी छः लडकों को बुलाया और डांट फटकार लगाई की अगर तुम ऐसे घर जाया करोगे तो दुसरे लडके भी छात्रावास से भागने लग जाएंगे और अगर छात्रावास में अच्छा नहीं लगता है तो भर्ती ही क्युं हुएं. घर से ही स्कूल आया करते. तुम सब ऐसी हरकतें करोगे तो तुम्हें देखकर दुसरे लडके भी ऐसा ही करेंगे. फिर छात्रावास में रहने का क्या मतलब निकलता है. अब जो सीनियर हमें समझा रहे थे उनमें से कुछ लडके हमारे गांव के ही थे. हम छः में से पांच तो सीनियर लडकों की बातों को चुपचाप ध्यान से सुन रहे थे. पर मेरे चाचा का एक लडका सीनियर लडकों की बातों पर रियेक्ट करने लगा. और उन लडकों की बातों पर रियेक्ट करने लगा जो हमारे ही गांव के ही थे. उन लडकों से उलझ गया. अब वै लडके भी चाचा के लडके को ज्यादा कुछ बोल नहीं पायें. क्योंकि वै लडके गांव के ही थे और अगर वै कुछ बोलते तो गांव में माता- पिता के लडाई- झगडे हो जातें उन लडकों ने चाचा के लडके को तो कुछ नहीं बोला पर दुसरे सीनियर लडकों को भडका दिया कि अब तुम इसकी रेगिग लो अब दुसरे लडकों को बोलने के लिए बोल दिया तो दुसरे लडकों ने फिर हम पांचों से तों कुछ नहीं कहा लेकिन फिर उसी को सारे सीनियर लडकों ने लताड लगाई, फिर चाचा के लडके ने इंचार्ज के साले को जाकर बता दिया कि सीनियर लडके हमारी रेगिंग लेते हैं. फिर इंचार्ज को बुलाया गया फिर इंचार्ज को बताया गया कि सीनियर लडके हमारी रेगिंग लेते हैं तो इंचार्ज ने सीनियर लडकों को डांट फटकार लगाई की तुम लोग ऐसा क्युं कर रहे हो तो सीनियर लडकों ने इंचार्ज को बताया कि हम इनकी रेगिंग नहीं ले रहें थे sir यह लोग हर शनिवार बीना किसी को बताएं घर चले जाते हैं. तो हम सिर्फ इन्है समझा रहे थे कि अगर तुम ऐसा करोगे तो दुसरे लडके भी घर भागकर जाने लग जाएंगे. तो यह लडका ज्यादा होशियार बन रहा है. और कह रहा है कि हां हम घर जाते हैं और आगे भी जाते रहेंगे. तुम क्या कर लोगे. तो चाचा के लडके ने कहा कि sir मेने ऐसा नहीं कहा. फिर इंचार्ज ने दुसरे लडकों से पुछा कि यह लोग शनिवार और रविवार यहां रहते हैं. तो लडकों ने मना कर दिया. की नहीं रहते हैं. फिर इंचार्ज ने हम सभी को डांट फटकार लगाई की तुम छात्रावास में रहने आये हो पढाई लिखाई करने आये हो की घर भागकर जाने के लिए आये हो. चलो इस बात की तुम सबको सजा जरूर मिलेगी. क्योंकि तुम सब ने छात्रावास के नियम तोडे है. इंचार्ज ने सीनियर लडकों की तरफ देखकर कहा कि कल रविवार है तो कल सुबह इन छहों से पुरे सोचालयों की और पानी की टंकी की सफाई करवाना है. चलो अभी सब अपने- अपने कमरों में जाओ और पढाई करों. कल सुबह तुम छहों को यहीं काम करना है. मेरे बीना पुछे सोचालयों की साफ- सफाई करना शुरू कर देना. ठीक है. अब अगली सुबह सभी लडकों ने हमारी हंसी उडाई और सीनियर लडकों ने तो चाचा के लडके के सामने टोंट मारकर जोर जोर से चिल्लाना भी शुरू कर दिया मिम्स बनाते हुए हमारे कमरों की तरफ आये और बोलते की एसीड लो, फिनाइल की बाॅटल लो लेट- बाथ साफ सफाई करने के पावडर लो खुशबुदार फिनाइल लो. अब हम पांच को तो सीनियर लडकों की बातों पर हंसी आये. लेकिन जो चाचा का लडका उलझ गया था वह सीनियर लडकों की नोटकीं से बहुत Irritate होने लगा. जब चाचा का लडका सीनियर लडकों से Irritate हो तो सीनियर लडके उसे और चिढाने लगें. अब हम पांच तो सोचालय की तरफ पहुंच गए. और साफ सफाई करना शुरू कर दिया. पर उन सीनियर लडकों में से एक लडका मेरी मोसी का लडका था तो उसने मुझे सफाई करने के लिए मना कर दिया. और इन पांचों से अलग कर दिया और बाकी लडकों को सफाई करने दिया. फिर थोडी देर बाद मुझे फिर से इनके पास भेज दिया. पानी की टंकी कि सफाई करने के लिए ताकि जब इंचार्ज सभी बच्चों से हमारे बारे में पुछे तो सभी बच्चे बोल सकें कि इन छहों ने पुरे सोचालयो और पानी की टंकी की सफाई की है. हमनें इंन्है सफाई करते देखा है. फिर सभी जगहों की सफाई होने के बाद छात्रावास इंचार्ज के साले को रिपोर्ट कर दिया कि हमने सभी जगहों की अच्छे से सफाई कर दी है. फिर इंचार्ज के साले ने कहा कि अब जाओ आराम करों शाम को sir आयेंगे वहीं बताएंगे कि अब क्या करना है. फिर शाम को इंचार्ज sir आये और हमें बुलाया गया और पुछा कि सोचालय की सफाई करके कैसा लगा. तो हमने कहा कि बहुत गन्दा तो इंचार्ज sir ने कहा कि अब दोबारा से बीना किसी को बताएं घर भागकर जाओगे. तो हमने ना में सिर हिला दिया. फिर भी इंचार्ज sir को हम छहों पर विश्वास नहीं हो रहा था. कि यह छहों छात्रावास में टीक पायेंगे. तो इंचार्ज sir ने सीनियर लडकों को बोल दिया कि इनपर नजर रखना और अपने साले को भी बोल दिया कि हर शाम बच्चों की उपस्थिति अनुपस्थिति एक रजिस्टर में दर्ज की जाय. पर फिर हम छः ने घर आना- जाना बंद कर दिया. यह हुआ क्युं क्योंकि यह पांचों मुझे पढाई नहीं करने देते थे. और मेरा बहाना बनाकर घर ले आते थे. इसलिए भगवान ने चाचा के लडकों के कारनामों को सबके सामने उजागर कर दिया था. ताकि मैं अच्छे से पढाई कर पाऊं. और अब जब छात्रावास में ही रहते तो. चाचा के लडकों ने अपनी मांओं को बता दिया कि छात्रावास में अब ऐसे नियम बना दिए हैं तो अब हम दीपक को पढाई करने से भटका नहीं सकते हैं. तो अब हम क्या करें. फिर चाचीयो ने कहा कि स्कूल के बाद दीपक को शहर में घुमाने- फिराने ले जाया करों. और जब भी वह पडने बैठे तो उससे बातें करते रहना इससे वह पढाई में ध्यान नहीं लगा पाएगा. अब छात्रावास इंचार्ज ने हमारा घर आना- जाना तो बंद कर दिया था. तो अब चाचा के लडकों ने शाम के समय टहलने के बहाने शहर में घुमना फिरना शुरू कर दिया. और शहर में घुम फिरकर रात के आठ नौ बजे तक चले आना. क्योंकि छात्रावास में शाम छः बजे हमें खाना मिल जाता था. फिर छः बजे से बाहर जाते थे तो रात के आठ नौ बजे छात्रावास में वापस आते थे. पर इस बार चाचा के लडकों ने मुझे बाहर ले जाने के लिए यह काम निरन्तर नहीं किया. चाचा के लडके देख लेते की मैं पढाई पर ज्यादा ही फोकस करने लगा हुं. तो तुरंत सभी मेरे पास आ जाएंगे और यहां वहां की बातें करने लग जाएंगे. फिर थोडी देर तक बातचीत करने के बाद खुद सो जाएंगे. और हम सबको भी सोने के लिए बोल देंगे. और अगर कोई लडका पढना चाहें तो लाइट बंद कर दिया करते यह कहकर कि हमें रोशनी से परेशानी होती है। हमें निंद नहीं आती है। तों अब तुम लोग भी सो जाओ