
गाँव की सुबह: प्रकृति का जादुई आलिंगन

सुबह के ठीक 5:30 बजे मोबाइल का अलार्म बजा, लेकिन नींद खुलने से पहले ही पक्षियों की चहचहाहट कानों में मिश्री घोल चुकी थी। जैसे ही आंखें खुलीं, एक अजीब-सी ताजगी का अनुभव हुआ। गाँव की सुबह सच में जादुई होती है! ठंडी हवा के झोंकों में घुली माटी की सौंधी खुशबू मन को शांति से भर देती है।
मैं रोज की तरह टहलने के लिए गाँव की नदी पर बने ब्रिज की ओर बढ़ा। रास्ते में हरियाली से लहराते खेत, ओस की बूंदों से नहाई घास, और हवा में झूमती सरसों की पीली चादर मन को अपार सुकून दे रही थी। दूर कहीं एक चरवाहा अपनी बांसुरी की मीठी तान छेड़ रहा था, और वह संगीत इस शांत सुबह को और भी स्वप्निल बना रहा था।

ब्रिज पर पहुंचते ही मेरी नज़र नदी पर पड़ी। पानी एकदम शांत था, मानो किसी दर्पण की तरह, और जैसे ही सूरज की पहली किरणों ने इसकी सतह को छुआ, वह सुनहरे रंग में तब्दील हो गया। ऐसा लगा जैसे नदी ने सोने की चादर ओढ़ ली हो।
क्षितिज पर उगते हुए सूरज का दृश्य इतना मोहक था कि लगा, जैसे प्रकृति ने अपने सारे रंग समेटकर एक अद्भुत चित्र उकेर दिया हो। पेड़ों की परछाइयाँ नदी में इस तरह झलक रही थीं, मानो दो दुनियाएँ आपस में घुल-मिल रही हों। हवा में ठंडक थी, लेकिन उसमें एक अनकही ऊष्मा भी थी—प्रकृति की गोद में बिताए गए हर क्षण की ऊष्मा। मगर यह शांति क्षणिक थी। धीरे-धीरे गाँव जागने लगा।
ब्रिज पर लोगों की चहल-पहल बढ़ने लगी। किसान हल लेकर खेतों की ओर बढ़ने लगे। गोधूलि में लिपटे गोधन अपने चरवाहों के साथ निकल पड़े। जीवन अपनी रफ्तार पकड़ने लगा। लेकिन इस सुबह की ताजगी, यह सौंदर्य, यह शांति—यह सब मेरे भीतर एक ऊर्जा बनकर संचित हो चुका था, जो मुझे पूरे दिन नई प्रेरणा देता रहेगा।
परीक्षा केंद्र पर जिम्मेदारी: एक रहस्यमयी भेंट
आज मेरी बोर्ड परीक्षा की ड्यूटी थी। सुबह जल्दी ही तैयार होकर परीक्षा केंद्र पहुँचा। चारों ओर परीक्षा का गंभीर माहौल था। बच्चे अपने अनुक्रमांक देखकर कक्षाओं में जा रहे थे। शिक्षक-शिक्षिकाएँ समय से पहले पहुँच चुके थे। मेरी ड्यूटी रिलीवर में लगी थी, जहाँ मुझे प्रश्न-पत्रों और कॉपियों के वितरण की जिम्मेदारी निभानी थी।
मैं अपनी ड्यूटी निभाने में व्यस्त था कि अचानक द्विवेदी जी ने मुझे बुलाया। वे परीक्षा कक्ष में निगरानी कर रहे थे। उनकी आँखों में गहरी पैठ थी, जैसे वे किसी अनजानी दुनिया को देख रहे हों। उन्होंने मुस्कुराकर पूछा, “प्रशांत, सब ठीक चल रहा है?”
“हाँ, पंडित जी, सब बढ़िया है,” मैंने जवाब दिया।
वह मेरी ओर देख मुस्कुराए और उंगलियों पर कुछ गणना करने लगे। उनकी गहरी आँखों में एक रहस्य था। फिर बोले, “तुम्हारी राशि कन्या है ना?”
मैंने आश्चर्य से सिर हिलाया, “हाँ, पर आपको कैसे पता?”
उन्होंने रहस्यमयी अंदाज में कहा, “अभी तुम्हारा समय बहुत शुभ चल रहा है। संपत्ति और वाहन खरीदने का योग है।“ मैं चौंक गया। हाल ही में मैंने एक वाहन खरीदा था और ज़मीन की रजिस्ट्री भी करवाई थी। यह बात उन्हें कैसे पता चली?“ वाहन और संपत्ति तो मैंने ले ली, पर आगे क्या?” मैंने उत्सुकता से पूछा।
पंडित जी ने फिर उंगलियों पर कुछ गणना की, फिर मेरी ओर देखा। उनके चेहरे पर हल्की चिंता झलकी, “जनवरी से कुछ परेशानियाँ बढ़ी हैं तुम्हारी, है ना?”
यह सुनते ही मेरे मन में हलचल मच गई। सच में, पिछले कुछ महीनों से कई परेशानियाँ चल रही थीं, लेकिन यह बात उन्होंने कैसे भांप ली?
मैंने घबराकर पूछा, “ तो ये सब कब तक चलेगा?”
उन्होंने मेरी चिंता भांप ली और शांत स्वर में बोले, “ अप्रैल-मई के बाद समय फिर से अनुकूल हो जाएगा।“
उनकी बातों ने मुझे बेचैन कर दिया। परीक्षा समाप्त होते ही मैं अगले दिन की छुट्टी लेकर घर आ गया।
पंडित जी की बातें मेरे दिमाग में घूमती रहीं। क्या वाकई किस्मत के सितारे हमारा भविष्य तय करते हैं? क्या सच में कुछ बदलाव आने वाला था? इस रहस्यमयी भविष्यवाणी ने मेरे मन में कौतुहल जगा दिया था। मैं सोच में डूबा था—क्या सच में अप्रैल-मई के बाद सब बदल जाएगा? वक्त ही इस सवाल का जवाब दे सकता था…
शहर की यात्रा: एक फैसला जो सब कुछ बदल गया
अगले दिन मुझे भोपाल जाना था, जहाँ मेरी पत्नी प्रिया पहले ही पहुँच चुकी थी। हम दोनों का साथ जाने का विचार था, लेकिन परिस्थितियों ने हमें अलग-अलग भेज दिया। बड़ा मामा भी साथ जा रहे थे, और बाइक पर तीन लोग नहीं जा सकते थे, इसलिए प्रिया को मैंने पहले ही बस से भेज दिया था। उसने सोचा था कि माँ और बहन से मिलकर कुछ सुकून मिलेगा, लेकिन उसे नहीं पता था कि यह यात्रा उसके जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा बनने वाली थी।
मंगलवार था, एकादशी का दिन। सुबह-सुबह माँ ने आशीर्वाद दिया, “ग्यारस माता सब ठीक करेगी।”
पर मेरे मन में द्विवेदी जी की भविष्यवाणी गूँज रही थी—क्या सच में कुछ अनहोनी होने वाली थी? मामा के साथ कागजात समेटकर मैं निकल पड़ा, भोपाल की ओर।
कोर्ट रूम की साँसें: फैसला जो रुला गया
हम अदालत पहुँचे। वहाँ प्रिया पहले से अपनी माँ और बहन के साथ मौजूद थी। हमारी 14 साल की बेटी, मानसी, जो डाउन सिंड्रोम से पीड़ित थी, अपनी माँ के पास बैठी थी, अनजान इस बात से कि यहाँ उसकी पूरी दुनिया बदलने वाली थी। केस पिछले छह साल से चल रहा था। प्रिया का भाई महेन्द्र जेल में था, और हम सभी पर धारा 304(B) के तहत मुकदमा था—दहेज हत्या का आरोप।
वकील साहब ने हमें भरोसा दिलाया, “चिंता मत कीजिए, आप निर्दोष हैं। यह साफ है कि आप बस फँसाए गए हैं।” फिर भी, प्रिया की आँखों में चिंता थी। उसने धीरे से मेरा हाथ पकड़ा, “कुछ गलत तो नहीं होगा?” मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “ईश्वर पर भरोसा रखो, जब हम निर्दोष हैं, तो हमें डरने की जरूरत नहीं।”
पर भीतर से मैं खुद भी डरा हुआ था।
फैसले की घड़ी
समय जैसे ठहर गया था। दोपहर से शाम हो गई, और अंततः कोर्ट रूम का दरवाज़ा खुला। दो पुलिसकर्मी हथकड़ी में जकड़े महेन्द्र को लेकर आए। वकील साहब भी आ गए। हम सभी कटघरे में खड़े थे।
जज मैडम ने फैसला सुनाना शुरू किया। साँसें थम गईं।

“तुम सभी को धारा 498 एवं 34 में बरी किया जाता है…”🙂
एक क्षण के लिए राहत की साँस ली, लेकिन अगले ही पल…
“…तथा धारा 304(B) के अंतर्गत दोषी मानते हुए 10-10 वर्ष के सश्रम कारावास और 1000 रुपये जुर्माना की सजा सुनाई जाती है!”🥺
कोर्ट रूम में सन्नाटा छा। प्रिया के चेहरे से रक्त उतर गया, उसकी आँखों में भय और असहायता का मिश्रण था। अवनी ने मेरी ओर देखा, उसकी आँखों में विश्वासघात की पीड़ा थी।
मुझे कुछ समझ नहीं आया। क्या हुआ? क्या सच में? मैं दोषी…? वकील साहब ने आगे बढ़कर पूछा, “मैडम, पांचों को?” जज ने कड़वी सच्चाई दोहराई, “हाँ, पांचों को।”
“पंडित जी की वो बातें… क्या सच में आने वाले अंधेरे की आहट थीं?”