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आत्मसंवाद

मन ने जीवन से पूछा —

यह अनवरत गति किसकी है, बतला दो,

और किस भय से हम हर पल

खुद से ही भाग जाते हैं, समझा दो?

जीवन ने ठहर कर उत्तर दिया —

अब रुकना गुण नहीं, दोष कहा जाता है,

जो ठहर जाए क्षण भर भी,

वह समय में असमर्थ समझा जाता है।

मन ने फिर प्रश्न किया —

सत्य सुनते ही जन क्यों विचलित हो उठते हैं?

विवेक ने शांत स्वर में कहा —

क्योंकि सत्य उत्तर नहीं,

वह प्रश्न बनकर भीतर खड़े हो उठते हैं।

मन ने पूछा —

स्वप्न हर बार टूटकर

नींद में ही क्यों छोड़ जाते हैं?

अनुभव बोला —

ताकि मन जाने—

जागना आँखों का नहीं,

चेतना का कार्य कहलाता है।

मन ने धीमे स्वर में कहा —

इतनी भीड़ में भी यह एकांत

क्यों साथ नहीं छोड़ता?

आत्मा ने उत्तर दिया —

क्योंकि स्वयं से सामना

संसार की सबसे उपेक्षित यात्रा होता।

अंत में मन मौन हुआ,

शब्द स्वयं पिघलकर सो गए।

तब मौन ने कहा —

जहाँ प्रश्न थक जाते हैं,

वहीं से समझ जन्म लेती है—

और समझ, उत्तर से बड़ी हो जाती है।

— बनारसी

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