एक जवाबी ख़त लिखते हैं—ऐसा, जैसे वो कभी कह नहीं पाया…
अनकहा जवाब(2)
तुम्हारा ख़त मिला…
और सच कहूँ, पढ़ते-पढ़ते
कई बार रुका मैं—
क्योंकि हर लफ़्ज़ में
अपना ही नाम लिखा पाया।
तुम सही थे…
हम सच में साथ नहीं चल पाए।
पर ये भी सच है—
कि मैंने कोशिश ही नहीं की
तुम्हें समझने की,
जितनी तुमने मुझे समझने में लगा दी।
तुमने जो मोहब्बत दी,
वो कम नहीं थी…
बस मैं ही उसे संभाल नहीं पाया।
तुम्हारी हर कोशिश,
हर इंतज़ार…
आज याद आता है,
तो एहसास होता है—
मैंने क्या खो दिया।
तुम कहते हो ना,
कि मैं खुश रहूँ…
शायद रह भी जाऊँ कभी—
पर तुम्हारे जैसा सुकून
कहीं नहीं मिलेगा।
तुम दूर जा रहे हो,
और मैं रोक भी नहीं सकता…
क्योंकि अब हक़ नहीं रहा मेरा,
और शायद हिम्मत भी नहीं।
बस एक बात कहना चाहता हूँ—
अगर कभी मेरी खामोशी ने
तुम्हें चोट पहुँचाई हो,
तो माफ़ कर देना…
मैंने मोहब्बत की थी,
पर उसे निभाना नहीं सीखा।
और आज…
जब तुम जा रहे हो,
तो समझ आया—
कि कुछ लोग ज़िंदगी में
सिर्फ मिलने के लिए नहीं,
बल्कि सिखाने के लिए आते हैं।
तुम्हारी दुआओं में मैं रहूँ या ना रहूँ,
पर तुम मेरी हर दुआ में हमेशा रहोगे।
— वो, जो तुम्हें खो चुका है