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एक अनकही #2

शहर की भीड़भाड़ से दूर, पुराने रेलवे क्वार्टर के आखिरी छोर पर एक छोटा सा घर था, जिसकी बालकनी में हर शाम एक बूढ़ी लालटेन जलती थी। वहां रहने वाले प्रोफेसर साहब और उनकी खामोशी, पूरे मोहल्ले में मशहूर थी।

​प्रोफेसर साहब के पास किताबों का ढेर था, लेकिन उनके पास बात करने के लिए शब्द कम पड़ गए थे। उनकी पत्नी, सुमति, को गुजरे दस साल हो चुके थे, लेकिन घर के हर कोने में उनकी मौजूदगी आज भी महसूस होती थी। डाइनिंग टेबल पर आज भी दो प्लेटें सजती थीं, और शाम की चाय हमेशा दो कप में बनती थी।

​एक दिन, घर की पुरानी अलमारी साफ करते वक्त प्रोफेसर साहब के हाथ एक मखमली डायरी लगी। पन्नों के बीच एक लिफाफा दबा हुआ था—हल्का पीला पड़ चुका, जिस पर सुमति की लिखावट में उनका नाम लिखा था।

​उनकी उंगलियां कांपने लगीं। उन्होंने लिफाफा खोला। अंदर एक अधूरा पत्र था:

​"सुनिए, शायद मैं ये कभी कह न पाऊं, पर उस रोज जब हम बारिश में भीगे थे और आपने अपनी छतरी मेरी तरफ झुका दी थी... तब मुझे लगा था कि दुनिया के सारे शब्द फीके हैं। मैं अक्सर सोचती थी कि आपको बताऊं कि आपकी खामोशी में भी मुझे संगीत सुनाई देता है, पर..."

​बस, कहानी वहीं रुक गई थी। सुमति ने अपनी पूरी जिंदगी प्रोफेसर साहब के साथ बिता दी, लेकिन वह 'पर' के आगे की बात कभी नहीं कह पाईं। शायद उन्हें लगा कि वक्त बहुत है, या शायद उन्हें लगा कि प्रोफेसर साहब उनकी आंखों से सब समझ जाते हैं।

​मौन का जवाब

​प्रोफेसर साहब ने उस अधूरे खत को सीने से लगा लिया। उनकी आंखों से एक आंसू टपक कर उस पीले कागज पर गिर गया। उन्हें एहसास हुआ कि जिसे वह 'खामोश मोहब्बत' समझते थे, वह दरअसल 'अनकही' रह गई बातों का बोझ था।

​उन्होंने पेन उठाया और उसी खत के नीचे एक लाइन लिखी:

​"सुमति, तुमने कहा नहीं और मैंने कभी पूछा नहीं। हम दोनों ही इस मुगालते में रहे कि मोहब्बत सिर्फ महसूस करने की चीज है, कहने की नहीं। काश, एक बार हमने शब्द बांटे होते।"

​आज भी उस घर की बालकनी में लालटेन जलती है। मोहल्ले के लोग कहते हैं कि प्रोफेसर साहब अब घंटों खुद से बातें करते हैं। असल में, वह खुद से नहीं, बल्कि उन अनकही बातों से बात करते हैं जो वक्त की धूल में कहीं खो गई थीं।

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