
मिट्टी के खिलौने से खेलने का
सफर खत्म होकर कब ससुराल का खिलौना बन गए
कभी बिखरे होते थे खिलौने उस माँ के आँगन में
आज बस ससुराल के आँगन में खुद बिखर कर रह गए
सीमेट लेती थी माँ उस आँचल में जब मुश्किल में होते थे
आज मुश्किल से गुजरना भी एक मजाक लगता है
कभी इन्तजार होता था पापा के आने का
आज पापा इन्तजार करते है अपनी गुड़िया के आने का
हर बार मिलकर भी अधूरी रह जाती है दस्ता
कभी गुड़िया का टूटना भी एक दास्ताँ होता था
बस कहते है इस ससुराल को तुझे संभालना
कोई ये क्यों नहीं कहता बेटा तुझे हमें संभालना
सही कहते है सब असली जिंदगी तो मायके की थी
जो पसंद नहीं होता था तुरंत बोल देते थे आज ना जाने
कितने जज़्बातो को दबाकर लखुश हो रहे है!