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हिसाब

एक रात इक बात लिखूँगा,

तमाम उम्र का सारा हिसाब लिखूँगा।

​जो कह न सका कभी महफ़िल में मैं,

वो अनकहा सा कोई ख़्वाब लिखूँगा।

​मेरे लफ़्ज़ों में होगी ज़िक्र तेरी वफ़ा का,

और अपनी खामोशियों का जवाब लिखूँगा।

​पन्ने गवाह होंगे मेरे हर उस दर्द के,

जो छुपा रखा है, वो बेहिसाब लिखूँगा।

​कलम रुकेगी नहीं उस रात ज़रा भी,

मैं अपनी ज़िंदगी की खुली किताब लिखूँगा।

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